The Mysterious Bell – Chapter 1225
और यह बात मेरे दिल में इस तरह बैठ गई, जैसे ठंडी हुई लोहे की कील चुपचाप टँक जाती है।
घर की तरफ़ चलते हुए मैंने पापा की तरफ़ नहीं देखा।
पर एक बार मैंने हल्के से अपनी कॉपी खोली और उसमें उस लाइन के नीचे, जहाँ "शंकर यादव — हिसाब बराबर" लिखा था, मैंने एक छोटा-सा सवाल जोड़ दिया।
"अंदर वाला कौन है?"
पेंसिल मेरे हाथ में रुक गई।
और तभी गली के मोड़ से एक आवाज़ आई।
कोई गा रहा था।
बहुत धीमी आवाज़ में, जैसे कोई बूढ़ा सुबह-सुबह टहलते हुए गुनगुना रहा हो।
मैंने सिर उठाया।
पर मोड़ पर कोई नहीं था।
सिर्फ़ धूल थी, और धूल में उभरता हुआ सूरज।
और धूल के ऊपर, पैरों के ताज़े निशान।
लकड़ी के जूतों के।
मेरे घर की तरफ़ जाते हुए।
फिर मुड़कर आते हुए।
फिर गायब।
मैंने अपनी जेब में ताला दबाया।
वो एक बार और हिला, जैसे किसी ने उसे दूर से देखा हो और अपनी उँगली हिलाई हो।
और फिर वो चुप हो गया।
मैं घर की तरफ़ बढ़ा। मेरे साथ पापा थे, पीछे टिंकू और मीरा थे।
और मेरे सामने, गली के आख़िर में, वो बंद दरवाज़ा इंतज़ार कर रहा था जिसे मैंने आज सुबह खोलने की नहीं, देखने की भी हिम्मत नहीं की थी।
पर आज शाम, या कल, या जिस भी घड़ी में वो खुलेगा —
उसके पीछे जो भी है, वो मेरा ही कोई होगा।
क्योंकि घंटी ने कहा था — जिसे तू रोज़ देखता है, वही है।
और मैं रोज़ बहुत चीज़ें देखता हूँ।
पर आज से पहले मैंने कभी उन्हें गिना नहीं था।
॥
घर पहुँचते-पहुँचते सूरज पूरा निकल आया था।
आँगन में माँ की बैसाखी टिकी थी, और उसके सहारे माँ दरवाज़े तक आई थीं। उनके हाथ में मेरी पुरानी शर्ट थी — वही नीली, जिसकी जेब फटी थी और जिसे उन्होंने बार-बार सिला था।
"कहाँ गए थे?"
मैंने जूते उतारे। जवाब सोचा, फिर छोड़ दिया।
"उस्ताद की दुकान।"
माँ ने मेरी आँखें देखीं, फिर जली हथेली देखी।
"अंकुश।"
"कुछ नहीं हुआ, माँ।"
"मैंने कुछ नहीं पूछा," वो बोलीं, "पर जब बेटा खुद से कहता है कि कुछ नहीं हुआ, तब सबसे ज़्यादा कुछ हुआ होता है।"
मैं हँसा। पर हँसी आधी ही निकली, आधी गले में अटक गई।
पापा पीछे खड़े थे, बही सीने से लगाए। माँ ने उनकी तरफ़ देखा, और पापा ने नज़रें चुरा लीं। इन दोनों के बीच जो बात आज सुबह बिना शब्दों में हो गई, वो मुझे किसी और वक़्त समझ आएगी — अभी मुझे अपनी जेब में पड़े उस बर्फ़ जैसे ठंडे ताले की फ़िक्र थी।
काजल ने चाय का गिलास मेरे हाथ में दिया। उसने कुछ पूछा नहीं। बस एक लंबी नज़र डाली — वो नज़र जो बहनें तब डालती हैं जब वो जानती हों कि भाई कुछ छिपा रहा है, पर अभी उससे झगड़ने का वक़्त नहीं है।
"दवा ले ली?" मैंने पूछा।
"मेरी दवा?" काजल ने कहा। "या तेरी?"
"तेरी तो मुझे नहीं पता," मैंने कहा, "पर मेरी कोई दवा नहीं है।"
"है," काजल ने कहा, "सच बोलने की। रोज़ की डोज़ छूट रही है तेरी।"
मैं चुप हो गया।
माँ मुस्कुराईं — वो हल्की-सी मुस्कान जो उनके चेहरे पर सिर्फ़ तब आती है जब वो अपने दोनों बच्चों को एक साथ भिड़ते देखती हैं।
फिर मैं अंदर गया, चारपाई पर बैठा, और जेब से ताला निकाला।
बर्फ़।
अभी भी बर्फ़।
सुबह हो गई थी, धूप आँगन में फैल रही थी, कमरे में गरमी थी — पर वो ताला मेरे हाथ में पत्थर की तरह ठंडा था। जैसे उसने धूप देखी ही न हो। जैसे उसके अंदर जो कुछ बंद है, वो इतना ठंडा है कि उसकी ठंडक बाहर तक रिस रही है।
मैंने उसे कान के पास लिया।
आवाज़ नहीं आई।
पर सन्नाटा भी नहीं था। ऐसा लगा जैसे अंदर कोई साँस रोककर बैठा है।
मैंने ताला वापस जेब में डाला और उठा।
उस्ताद की दुकान का शटर मैंने आज सुबह खुद उठाया था — उनका हाथ अभी काँपता था, इसलिए मैंने कहा था कि आज मैं उठा दूँगा। उन्होंने कुछ नहीं कहा था, बस कुर्सी पर बैठकर देखते रहे थे।
अब मुझे अपनी दुकान खोलनी थी।
मैं दुकान के सामने पहुँचा।
शटर पर कोयले से लिखा मेरा नाम अब भी था — अंकुश यादव, साइकिल मरम्मत, टूटा लाओ। नीचे किसी ने पेंसिल से जोड़ दिया था — और रोज़ आओ।
मैंने शटर उठाया।
अंदर अंधेरा था, और अंधेरे में वो गंध — ग्रीस, लोहे, पुराने रबर और पसीने की। मेरी गंध। जिससे मुझे लगता था कि मैं घर लौट आया हूँ।
पीछे के कमरे से दुकान की लाइट जलाई। पुराना बल्ब गुनगुनाया, फिर जल उठा।
मैंने अपनी मेज़ पर बैठकर जेब से ताला निकाला और सामने रख दिया।
उसी वक़्त शटर के नीचे से एक परछाईं आई।
"उस्ताद।"
टिंकू।
वो अंदर आया, स्कूल का बस्ता कंधे पर, आँखों में वो नींद जो आधी छूटी और आधी अटकी रह गई थी। उसने ताले को देखा, फिर मुझे देखा।
"तू स्कूल नहीं गया?"
"आज शाम की क्लास का फ़ॉर्म लेना है," उसने कहा, "मास्टर इरफ़ान ने कहा था। दोपहर तक का टाइम है।"
मैंने सिर हिलाया।
टिंकू ने स्कूल का बस्ता एक तरफ़ रखा, फिर ताला उठाया।
"ठंडा है अभी भी।"
"हाँ।"
"उस्ताद—"
"पता नहीं, टिंकू। पता नहीं क्या है ये।"
उसने मुझे देखा। फिर उसने ताला वापस मेज़ पर रखा और बड़े होशियार आदमी की तरह बैठ गया — वो बैठक जो वो कभी-कभी मुझसे कॉपी करता है।
"उस्ताद, ये ताला तेल से नहीं खुलेगा।"
"तो क्या करूँ?"
"तेरी नींद चाहिए," टिंकू ने कहा, "तू चार रात से सोया नहीं है ठीक से। पहले सो जा। फिर देख।"
मैं हँस पड़ा।
दो सेकंड के लिए। पूरे दो सेकंड। पिछले हफ़्ते में शायद यह पहली बार था कि मैं सच में हँसा था — वो हँसी जिसमें दाँत भी निकले और आवाज़ भी।
"तू डॉक्टर बनेगा या उस्ताद?"
"दोनों," टिंकू ने कहा, "डॉक्टर उस्ताद। एक ही दुकान में। तेरे लिए चाय, बीमारों के लिए दवा।"
"मेरा इलाज क्या होगा?"
"तू ठीक है," टिंकू ने कहा, "बस बहुत ज़्यादा सोचता है।"
उसने कहा और खुद अपनी बात पर हँसने लगा।
तभी शटर के बाहर चप्पलों की आवाज़ आई।
शबनम आपा।
हाथ में दो कुल्हड़ — भाप उठती हुई। उनके चेहरे पर वो भाव जो हर सुबह होता है — जैसे दुनिया की सारी बेवकूफ़ी उन्होंने रात भर में गिन ली हो और अब उसे सुबह-सुबह सुधारने निकली हों।
"चाय।"
"आपा, आपको कोई तकलीफ़—"
"तकलीफ़ की बात मत कर," उन्होंने कहा और कुल्हड़ मेज़ पर पटक दिया, "सुबह-सुबह ज़िंदगी का हिसाब मत कर। पहले चाय पियो। हिसाब चाय के बाद।"
मैंने कुल्हड़ उठाया। गरम था, हाथ जलने वाला गरम, और उस गरमी में मेरी जली हथेली की जलन कुछ देर के लिए भूल गई।
"आपा," टिंकू ने कहा, "उस्ताद का ताला खुल नहीं रहा।"
"ताला नहीं खुल रहा," शबनम आपा ने अपनी चाय पर फूँक मारी, "या उस्ताद खुल नहीं रहा?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?"
"मतलब," उन्होंने कहा, "कि तेरी हथेली जली है, तेरी आँखों में नींद नहीं है, तेरी दुकान में ग्राहक नहीं है, और तू सबसे पहले ताले की बात कर रहा है। ताले का क्या है — ताला तो बहाना है। असली चीज़ कुछ और है।"
मैं चुप हो गया।
"पर आज मैं तुझे कुछ नहीं कहूँगी," उन्होंने कहा और मेरे सामने वाली स्टूल खींचकर बैठ गईं, "क्योंकि आज सुबह मेरी बहन ने मेरे हाथ से चीनी का डिब्बा छीनकर कहा कि आपा, तुम बहुत मीठी चाय बनाती हो।"
वो मुस्कुराईं।
"पंद्रह साल बाद। मुझे मीठी चाय कहा।"
मैंने कुल्हड़ उनकी तरफ़ उठाया — चीयर्स की तरह।
"तो आज चीनी कम है।"
"आज चीनी है," उन्होंने कहा, "बस डाँट कम है।"
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