The Mysterious Bell – Chapter 1224
"दूसरा रणवीर के घर में," मैंने कहा।
उन्होंने सिर हिलाया।
"अब सुनो," उन्होंने कहा। "तेरे पास घंटी है, ताला है, छह काग़ज़ हैं, और एक खाली गठरी है। रणवीर के पास सातवाँ काग़ज़ है — ताबीज़ के अंदर सिला हुआ। और तुम दोनों के बीच में पूर्णिमा की शाम है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो एक बात याद रख। ताबीज़ खोलने के लिए औज़ार नहीं लगेगा।"
"तो क्या लगेगा?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैं अभी भी बच्चा हूँ। मुझे बुरा नहीं लगा।
"सच लगेगा," उन्होंने कहा। "ताबीज़ का धागा सुई से सिला है, पर उसके अंदर जो काग़ज़ है वो किसी की ज़ुबान से बंद है। जिस दिन वो अपनी ज़ुबान से अपना सच बोलेगा — ताबीज़ का धागा खुद खुलेगा।"
मैं चुप हो गया।
मैंने अपनी जली हथेली को देखा। फिर अपनी जेब में पड़े ताले को। फिर घंटी को।
"तो हमें रणवीर को अपना सच बुलवाना है," मैंने कहा।
"नहीं," उस्ताद ने कहा। "हमें उसे अपनी ज़ुबान से बोलने पर मजबूर करना है। और वो अपनी ज़ुबान से कभी सच नहीं बोलेगा।"
कमरे में फिर चुप्पी छा गई।
तभी मीरा बोली।
"तो हम उसकी ज़ुबान नहीं छुएँगे," उसने कहा। "हम उसके पीछे खड़े लोगों की ज़ुबान छुएँगे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो अपनी कॉपी खोल रही थी, और उसमें पन्ने पलट रही थी।
"अंकुश, देख। आज रात मेरी कॉपी में जो लिखा है — एक तीसरी आवाज़ कमरे के पीछे से आई। उसने कहा कि सातवाँ काग़ज़ साहब के गले में है। उस आवाज़ को पता था।"
"तो?"
"तो उस आवाज़ का आदमी हमारा नहीं है, पर रणवीर का भी नहीं हो सकता। क्योंकि रणवीर का आदमी यह नहीं कहेगा कि सातवाँ काग़ज़ कहाँ है। वो चुप रहेगा।"
मैं कुछ देर उसकी तरफ़ देखता रहा।
"तुम कह रही हो कि कल से हम रणवीर से नहीं। उसके आदमियों से लड़ेंगे?"
"मैं कह रही हूँ," उसने कहा, "कि कल से हम नहीं लड़ेंगे। कल से हम पूछेंगे। हर उस आदमी से जो रणवीर की परछाईं में खड़ा है।"
टिंकू ने अपनी मुट्ठी बनाई।
"और जो न बोले?"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराए।
"जो न बोले," उन्होंने कहा, "उसके पास भी कोई न कोई टूटा रिश्ता होगा। और टूटे रिश्ते वाला आदमी बहुत ज़्यादा देर चुप नहीं रह पाता। वो बोल पड़ता है। बस उसे सही वक़्त पर सही आदमी के सामने बैठाना पड़ता है।"
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने अपनी जेब से वो छोटी कॉपी निकाली जिसमें मैं अपने हिसाब लिखता हूँ। मैंने उसे खोला। उसके पहले पन्ने पर माँ का नाम लिखा था — सुशीला यादव।
उसके नीचे टिंकू का नाम, लक्ष्मी देवी का नाम।
अब मैंने उसके नीचे एक नई लाइन लिखी।
"पापा," मैंने कहा। "आपकी बही में मेरा नाम 'हिसाब बाक़ी' के साथ लिखा है।"
"हाँ।"
"तो आज से मेरी कॉपी में भी एक नाम लिखा जाएगा।"
"किसका?"
मैंने कलम उठाई। और मैंने लिखा —
"शंकर यादव — हिसाब बराबर।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
और फिर वो हँसे। बहुत धीरे से। पहली बार। बाईस साल में पहली बार मैंने अपने पापा को ऐसे हँसते देखा — जैसे किसी के गले से कोई पुरानी रस्सी खुल गई हो।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तू अभी से हिसाब बराबर कर रहा है? हमने तो अभी जीतना भी नहीं शुरू किया।"
"पापा," मैंने कहा, "मैंने आज एक गठरी उठाई, हाथ जलाया, कमीज़ फाड़ी, और पता चला कि जो चीज़ हम ढूँढ रहे थे वो एक ताबीज़ में सिली है। मेरे हिसाब से ये जीत ही है।"
उस्ताद ने टिंकू की तरफ़ देखा।
"देखा? इसका यही दिमाग़ है। हार में भी जीत ढूँढ लेता है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया।
और तभी, उसी वक़्त, मशीन की टिक-टिक रुक गई।
हम सबने उसकी तरफ़ देखा।
सुई ऊपर उठी रह गई थी। और उसके नीचे, कपड़े पर, एक नई लाइन सिल गई थी — नीले धागे से।
मैंने झुककर उसे पढ़ा।
उस पर लिखा था —
"अब घर जाओ।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनका चेहरा उतरा हुआ था।
"उस्ताद —"
"जानता हूँ," उन्होंने कहा और अपनी कुर्सी से उठे। "मशीन कह रही है। मशीन कभी झूठ नहीं बोलती।"
उन्होंने अपने हाथ से सुई को छुआ। फिर अपनी उँगली देखी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मुझे कुछ देर और रुकना पड़ेगा। तुम जाओ। घर जाओ। पापा के साथ। टिंकू भी जाएगा। मीरा, तू भी जा।"
"और आप?" मैंने पूछा।
"मैं वो करूँगा जो मशीन ने कहा। घर जाऊँगा। पर मेरा घर यही है।" उन्होंने दुकान की तरफ़ इशारा किया। "इस मशीन के साथ। जब यह चलती है, तब मैं घर में हूँ।"
मैं उन्हें रोकना चाहता था।
पर मैंने नहीं रोका।
क्योंकि मैंने उनकी आँखों में वो देखा जो मैं अब तक किसी में नहीं देख पाया था। वो डर नहीं था। वो पुरानी थकान नहीं थी। वो कुछ और था।
वो इंतज़ार था।
जैसे उस्ताद पचास साल से किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हों, और आज उन्हें लगा हो कि वो चीज़ आख़िरकार सामने आ रही है।
मैं उठा। मैंने अपनी जली हथेली पर रुमाल बाँधा। मैंने अपनी कॉपी जेब में रखी। मैंने ताला जेब में रखा — वो अब भी मेरी जेब में हल्का-सा हिल रहा था, जैसे साँस ले रहा हो।
और उसी वक़्त मेरे मन में एक बात आई।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा। अगर सातवाँ काग़ज़ ताबीज़ के अंदर सिला है — तो उसे रणवीर ने खुद वहाँ सिलवाया होगा?"
पापा ने सिर हिलाया।
"या किसी और ने।"
"किसी और ने क्यों सिलवाया होगा?"
पापा चुप रहे।
फिर उन्होंने धीरे से कहा — ऐसे जैसे बहुत पुरानी बात ज़ुबान से निकल रही हो, जिसे ज़ुबान भी मानने से डरती है —
"क्योंकि शायद वो काग़ज़ उसका नहीं था, अंकुश। शायद वो काग़ज़ उसके पास से किसी और ने लिया था, और उसने उसे ऐसी जगह छिपाया जहाँ कोई ढूँढने ही न जाए। अपने ही गले में।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मतलब —"
"मतलब," पापा ने कहा, "कि रणवीर वो ताबीज़ पहनता है, पर उसके अंदर क्या है — शायद वो खुद नहीं जानता।"
मैंने अपना सिर नीचे किया।
मेरी जली हथेली की जलन अब भी थी, पर उससे बड़ी एक और चीज़ मेरे अंदर चल रही थी — हल्की-सी, गरम-सी, जैसे कोई कमरे में चुपचाप दीया जलाकर चला गया हो।
मैंने अपनी घंटी को एक बार धीरे से हिलाया।
वो बजी नहीं।
पर उसके भीतर से एक आवाज़ आई, इतनी धीमी कि लगा सिर्फ़ मेरे कान ने सुनी — "अब तू अकेला नहीं जा रहा।"
मैंने सिर हिलाया। फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
दरवाज़े के बाहर, गली की तरफ़, सुबह की पहली किरण आ रही थी।
और उस किरण में, उस्ताद की दुकान की दीवार पर, जो सफ़ेद कपड़ा छोड़ दिया गया था, वो हवा में हल्का-सा हिल रहा था।
इस बार मुझे लगा कि वो कह रहा है — जा।
और मैं गया।
मैं गया, इस बात के बोझ के साथ कि सातवाँ काग़ज़ एक ताबीज़ के अंदर सिला है, और उसे खोलने के लिए सच बोलने पर मजबूर करना होगा उस आदमी को, जिसने अपनी ज़िंदगी में कभी सच नहीं बोला।
और एक बात जो मुझे अभी और परेशान कर रही थी, और जो मैंने सबको नहीं बताई —
वो कमरे में जो तीसरी आवाज़ थी, जिसने कहा कि सातवाँ काग़ज़ साहब के गले में लटकता है।
वो आवाज़ रणवीर की नहीं थी।
वो आवाज़ किसी ऐसे आदमी की थी जो उस कमरे में हमसे पहले से मौजूद था।
और उसे न सिर्फ़ ताबीज़ के बारे में पता था — उसे यह भी पता था कि हम उस काग़ज़ को ढूँढ रहे हैं।
यानी उस आदमी को हमारी योजना के बारे में पता था।
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