The Mysterious Bell – Chapter 1222
सुबह के चार बजने में अभी देर थी।
और गली ऐसी चुप थी जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो। पीपल का पेड़ अंधेरे में खड़ा था, पत्ते तक नहीं हिल रहे थे। नाली से आती बदबू भी आज कुछ अलग लग रही थी — जैसे उसमें काग़ज़ की जली गंध घुल गई हो।
मैं और पापा बिना बोले चल रहे थे।
पापा के हाथ में बही थी। मैंने उन्हें रोका नहीं। मैं जानता था कि वो बही अब उनके हाथ से नहीं छूटेगी। माँ की कॉपी, पापा की बही, दुकान की पुरानी रसीदें — ये चीज़ें हमारे घर में हमेशा से ऐसे रखी गई थीं जैसे कोई बीमार आदमी चुपचाप एक कोने में पड़ा हो। कोई उसकी तरफ़ देखता नहीं, पर वो सब देखता रहता है।
उस्ताद की दुकान आई।
शटर बंद था। पर उस शटर पर सफ़ेद कपड़ा बँधा था — वही कपड़ा जो उस्ताद ने मशीन पर डाला था। और हवा इतनी धीमी थी कि ताज्जुब हो, फिर भी वो कपड़ा हिल रहा था।
धीरे-धीरे।
जैसे कोई सोते हुए आदमी की छाती ऊपर-नीचे हो रही हो।
मैं एक पल के लिए रुक गया। मुझे लगा कि वो कपड़ा मुझसे कुछ कहना चाहता है। कह रहा है — अंकुश, आज मत जा। या कह रहा है — जा, पर लौटकर आना।
"अंकुश।" पापा ने धीरे से कहा।
"आ रहा हूँ, पापा।"
हम आगे बढ़े।
गली के मोड़ पर पप्पू भैया की दुकान की छत पर जो लालटेन जल रही थी, वो अब बुझ चुकी थी। सिर्फ़ काली धुआँधार लकीर आसमान में धीरे-धीरे फैल रही थी और गायब हो रही थी।
अस्पताल की इमारत दूर से ऐसी लग रही थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी चादर ओढ़कर बैठा हो। पीली दीवारें अंधेरे में भूरी दिख रही थीं। और पीछे की तरफ़, सीढ़ी के नीचे वाले रिकॉर्ड कमरे की छोटी खिड़की से —
धुआँ।
पतला, सफ़ेद, ऊपर उठता हुआ धुआँ।
रुक-रुककर, जैसे कोई साँस ले रहा हो।
मैंने पापा का हाथ पकड़ लिया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका मुँह खुला रह गया।
"जला रहे हैं," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "अभी भी। सुबह होने से पहले सब खत्म करना चाहते हैं।"
"तो हमें अभी करना होगा।"
हम दीवार के साथ-साथ आगे बढ़े। पीछे की तरफ़ की सूखी नाली में ओस जमी थी, पैर फिसल रहे थे। मैंने दीवार को हाथ से टेक दिया। ईंटें ठंडी थीं, जैसे बर्फ़ की हों।
और तभी सामने की तरफ़ से आवाज़ आई —
"चूहा! चूहा! अरे चूहा निकला!"
टिंकू की आवाज़।
इतनी ऊँची, इतनी तेज़, जैसे गली में आग लगी हो।
"अरे भागो भागो, बड़ा चूहा है! देखो, सीढ़ी के नीचे गया!"
गोलू की आवाज़ भी आई — "अरे कितना बड़ा है रे! रुक जा, रुक जा!"
मैं मुस्कुरा दिया। इतनी सुबह, इतने डर के बीच, मुस्कुराना मेरे लिए अजीब था। पर मैं मुस्कुरा दिया। टिंकू को उस्ताद नहीं कहते। मैं कहता हूँ, और आज उसने उस नाम का हक़ पूरा कर दिया।
खिड़की से अंदर का दृश्य दिखा।
दो आदमी थे। काली कमीज़, काली पैंट, सिर पर काला कपड़ा। एक के हाथ में काग़ज़ों की गठरी थी, दूसरा उसे जलाते हुए लोहे के बक्से में डाल रहा था। बक्से में आग तेज़ नहीं थी। बस धीरे-धीरे सुलग रही थी, और धुआँ बनकर सारा कमरा भर रहा था।
कमरे की हालत देखकर मेरा दिल धक् से रह गया।
रैक खाली कर दिए गए थे। फ़र्श पर काग़ज़ बिखरे थे — फटे, आधे जले, पैरों से कुचले हुए। कोने में लोहे की अलमारी खुली थी, जिसका दरवाज़ा टेढ़ा लटक रहा था, जैसे किसी ने ज़ोर से खींचकर तोड़ा हो। दीवार पर टँगा पुराना कैलेंडर झूल रहा था।
और उस कमरे में जो गंध थी — जला काग़ज़, गीली दीवार, पुरानी स्याही — वो गंध मेरे मुँह में आ गई। मुँह कड़वा हो गया।
टिंकू और गोलू का शोर तेज़ हुआ। दोनों गलियारे में दौड़ रहे थे, कोई पुराना डंडा लेकर फ़र्श पर पीट रहे थे।
अंदर के दोनों आदमियों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
"जाकर देख क्या है," एक ने कहा। आवाज़ रूखी थी, जल्दी में थी।
"तू देख," दूसरे ने कहा।
"अरे आग को तो सँभाल। मैं देख आता हूँ।"
एक आदमी दरवाज़े की तरफ़ गया। दूसरा झुककर जलती गठरी को बक्से में डालने लगा।
मैंने वो पल देखा और मैंने सोचा नहीं। मैंने सिर्फ़ किया।
मैं खिड़की पर चढ़ा। खिड़की बहुत ऊँची नहीं थी, पर मेरी कमर के बराबर थी और उसका शीशा पहले से टूटा था। मैंने दोनों हाथों से किनारा पकड़ा और खुद को अंदर खींच लिया।
और उसी वक़्त मेरी आँखों में धुआँ भर गया।
सब कुछ सफ़ेद हो गया।
मुझे लगा कि मैं अंधा हो गया हूँ। आँखें जलने लगीं, पानी बहने लगा। मैंने अपनी कमीज़ का कोना उठाकर मुँह पर रखा, पर तब तक मेरी साँस फँस चुकी थी। मैं खाँसा, फिर अपने होंठ भींचकर चुप हो गया, क्योंकि अगर मैं खाँसता तो वो आदमी पलट जाता।
मैंने आँखें आधी खोलीं।
दूसरा आदमी मुझसे चार कदम दूर था और मेरी तरफ़ पीठ किए हुआ था।
मैं आगे बढ़ा। धीरे। बहुत धीरे।
फ़र्श पर जो काग़ज़ पड़े थे, वो मेरे पैरों के नीचे चरमराते थे। मुझे लगा कि हर काग़ज़ एक आवाज़ है, जो कह रहा है — मुझे उठा ले। पर मैं सिर्फ़ एक चीज़ के लिए आया था। मैं वो सब नहीं उठा सकता था। और अगर मैं वो सब उठाने लगता तो पकड़ा जाता।
मैंने झुककर उसकी उँगलियों के नीचे से जलती गठरी खींच ली।
आग मेरी हथेली को चूम गई।
जलन ऐसी हुई कि मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। मैंने दाँत भींचे। मेरा हाथ काँपा, पर मैंने गठरी नहीं छोड़ी।
आदमी पलटा।
उसका चेहरा मैंने ठीक से नहीं देखा। बस काला कपड़ा देखा, और उसके हाथ में उठी हुई लोहे की छड़ देखी।
"अरे —"
मैंने उसका पूरा वाक्य नहीं सुना। मैंने अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया — मेरी तरफ़ आती छड़ को रोकने के लिए नहीं। मैंने आगे उसके हाथ के नीचे चलती मेज़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
उस मेज़ की दराज़ खुली थी।
मैंने उसमें हाथ डाला और जो पहली चीज़ हाथ आई, उसे उठा लिया। एक मोटा काग़ज़ों का बंडल — बहुत पुराना, रस्सी से बँधा हुआ, ऊपर से जला हुआ।
और फिर मैं खिड़की की तरफ़ भागा।
पीछे से आवाज़ आई — "ये साला — रुक जा!"
और मेरी कमीज़ का कॉलर पकड़ा गया।
मैंने खुद को झटका दिया। कॉलर फटा। मैं खिड़की के किनारे पर चढ़ा, और ठीक उसी वक़्त मैंने वो आवाज़ सुनी जो मेरी रीढ़ से सिर तक गई।
वो आवाज़ कमरे के पीछे से आई। बहुत शांत। बहुत धीमी। जैसे कोई अपने ही घर में बैठा हो और कोई उसे न सुन पाए।
"छोड़ दे। सातवाँ काग़ज़ कभी इस कमरे में आया ही नहीं। वो तो साहब के गले में लटकता है।"
मैं रुका नहीं।
मैं खिड़की से गिरा। मेरी पीठ ज़मीन से टकराई। दर्द ऐसा हुआ कि मेरा साँस टूट गया। पर मैं उठ खड़ा हुआ।
पापा दौड़कर आए। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा।
"अंकुश — तेरा हाथ —"
मैंने अपनी हथेली देखी। जल गई थी। त्वचा लाल थी और एक जगह छाला बन गया था।
"बाद में, पापा। बाद में। चलिए।"
हम उसी सूखी नाली से भागे।
मीरा दीवार के कोने पर खड़ी थी। उसने कैमरा बंद रखा हुआ था, जैसा तय हुआ था। उसके हाथ में एक छोटी कॉपी थी और पेंसिल। वो लिखे जा रही थी, बहुत तेज़, झुकी हुई।
मैं उसके पास रुका।
"क्या-क्या?"
"जो जो देखा," उसने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "दो आदमी। काले कपड़े। एक ने बक्से में गठरी डाली। तेरी कमीज़ फटी आवाज़। पीछे से आवाज़ — सातवाँ काग़ज़ यहाँ नहीं। और एक तीसरी आवाज़ नहीं थी, मैंने सुना। आवाज़ कमरे के पीछे से आई थी।"
मैं चौंका।
"तुमने सुना?"
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