The Mysterious Bell1220 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1220

7 min read November 5, 2026

"उसी ने।" पापा ने कहा। "जब से अंगूठे वाली रात हुई, वो कुछ दिन अपनी छाया में रहा। मुझे देखता रहा। फिर एक दिन मेरे पास आया, चुपचाप बही मेज़ पर रखी और चला गया। कुछ नहीं बोला। बस जाते वक़्त इतना कहा कि यह मेरे पास नहीं रह सकती। मेरे हाथ काँपते हैं।"

"वो मुँह से क्यों नहीं बोलता?"

"क्योंकि जो बोलता है, वो काग़ज़ पर आ जाता है," उस्ताद ने उस कोने से कहा। वो उठे, मेज़ के पास आए, और बही की तरफ़ झुककर देखा। "और जो काग़ज़ पर आ जाता है, उसका नाम मिटाया जा सकता है। यह आदमी बाईस साल से खुद को मिटाए हुए है।"

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — थोड़ी सी शर्म, और उससे ज़्यादा पछतावा।

"उस्ताद, आप उसे जानते हैं?"

"जानता नहीं," उन्होंने कहा। "पहचानता हूँ। यह वही आदमी है जो पचास साल पहले मेरे भाई इलियास के पास आया था। जो बाज़ार में घूमकर कहता फिरता था कि मेरे बाप ने काग़ज़ बदला था। जिसने मेरे घर में आग लगवाई थी। आज वो अस्सी के पार है, और अब भी वही कर रहा है — नाम मिटा रहा है।"

मैंने बही उठाई। मैंने उसका आख़िरी पन्ना पलटा। वहाँ पर पेंसिल से कुछ लिखा था, बहुत हल्के अक्षरों में, जैसे किसी ने लिखकर मिटाने की कोशिश की हो।

'हिसाब बाक़ी'

और उसके नीचे, एक और शब्द —

'यादव'

मैंने उँगली उस शब्द पर रखी।

"पापा। यह मेरा नाम है।"

"नहीं," पापा ने कहा। "यह जगदीश यादव का नाम है। तेरे दादा का। और यह बही उन्हीं के हिसाब की है। यह वो आदमी बाईस साल से संभाले हुए है — जिसने दादा को अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर अंगूठा लगवाया था।"

कमरे में सब कुछ रुक गया। मुझे अपने हाथ की उँगली भी नहीं हिलती दिखी।

"तो यह आदमी दादा के ज़माने से साहब के साथ था?"

"साहब के बाप के साथ," पापा ने कहा। "यह उस खानदान की बही है जो गली के हर काग़ज़ पर अंगूठा लगवाता आया है। यह बही उस पूरे तंत्र का हिसाब है, अंकुश। इसमें हर नाम है — जो मर गए, जो ज़िंदा हैं, जो डर गए।"

मैंने बही बंद की। मेरे हाथ काँप रहे थे।

तभी जेब में ताला फिर से हिला। एक बार, दो बार, फिर हल्की खड़खड़, जैसे कोई बंद कमरे में आहिस्ते से कुंडी खटखटा रहा हो।

मैंने हाथ जेब पर रखा। ताला ठंडा था, पर जैसे सुबह से कम ठंडा। जैसे उसमें कोई साँस ले रहा हो।

मैंने घंटी उठाई। उसे कान के पास लाया, हिलाया, टन-टन बजाया, हथेली से रगड़ा।

घंटी चुप थी। बिल्कुल चुप। उसने आज कोई बात नहीं की। न कोई शब्द, न कोई फुसफुसाहट।

सिर्फ़ ठंडक थी। बस।

मीरा ने कहा, "कुछ बोली?"

"नहीं।"

"क्यों?"

"पता नहीं," मैंने कहा, "शायद वो अभी कुछ नहीं कहना चाहती। शायद बोलने का वक़्त अभी नहीं आया।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोले, "घंटी चुप है, क्योंकि यह सब सुनकर डर गई है। बोलना तभी ज़रूरी होता है, जब सामने वाला सुन सके।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो अब भी बैठे थे, और उनका चेहरा पीला पड़ रहा था।

"पापा, आप ठीक हैं?"

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उनकी आँखें बही पर थीं, जैसे वो बही उनके लिए कोई काग़ज़ नहीं, किसी का चेहरा हो।

फिर उन्होंने धीरे से कहा, "अंकुश। एक बात है जो मुझे तुझसे कहनी थी, पर कह नहीं पाया।"

"कहिए।"

"वो आदमी मुझसे मिलने आया था। उसी रात, जिस रात बही दी थी। उसने कहा कि तेरा बेटा बहुत जल्द उस काग़ज़ से टकराने वाला है, जिसके लिए मैंने बाईस साल चुप रहा। और उस दिन मुझे लगा था कि मैं उसे उससे बचा लूँगा। लेकिन नहीं बचा।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा।

"पापा, मुझे नहीं बचना है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"तो फिर सही सलामत लौट आना।"

कमरे में सन्नाटा छा गया, और उस सन्नाटे में फिर वही हल्की खड़खड़ आई — ताले के भीतर से।

तभी दरवाज़े पर फिर खटका हुआ। इस बार हम सब सकपका गए। क्योंकि रात के इस वक़्त और कौन आ सकता है?

टिंकू दौड़ा और दरवाज़ा खोला। बाहर सानिया खड़ी थी, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू के साथ। उसके हाथ में एक छोटी सफ़ेद लिफ़ाफ़े जैसी चीज़ थी।

"उस्ताद," वो हाँफ रही थी। "यह गली के मोड़ पर थी।"

"कहाँ?"

"खंभे के नीचे। पत्थर से दबी हुई।"

मैंने उसे खोला। उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, नीली स्याही में, बहुत काँपती लिखाई में।

'अब जो मिलेगा, वो पढ़के मिलेगा। आँख बंद करके नहीं।'

मीरा ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। उसने दो बार पढ़ा। फिर बोली।

"यह फेंकने वाला कोई बूढ़ा है। इतनी काँपती लिखाई सिर्फ़ उसी की हो सकती है जिसके हाथ पचास साल से काँप रहे हैं।"

मैंने काग़ज़ जेब में रखा।

"तो साफ़ है," मैंने कहा। "वो हमसे पहले उस कमरे में जाने वाले को चेतावनी दे रहा है। वो जानता है कि हम वहाँ जाने वाले हैं। और वो हमें बचाने की कोशिश कर रहा है।"

उस्ताद ने अपनी लाठी उठाई। "या वो हमें लड़खड़ा रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इस बात का है कि सुबह हमें क्या मिलता है।"

मैंने सबकी तरफ़ देखा। पापा बही पर झुके थे। मीरा अपनी कॉपी में लिख रही थी। टिंकू दरवाज़े पर सानिया के साथ खड़ा था। बबलू कोने में, अपना रूमाल हाथ में लपेटे हुए, मेरी तरफ़ देख रहा था।

मैंने कहा, "योजना बदलती है।"

मीरा ने अपनी कलम रोकी। "कैसे?"

"सात बजे का इंतज़ार नहीं। पाँच बजे छत के रास्ते से।"

"छत?"

"हाँ। सीढ़ी के नीचे वाला रिकॉर्ड कमरा बाहर से बंद है, पर उसके ऊपर वाला छज्जा खुला है। स्कूल के पीछे से उसकी छत तक पहुँचा जा सकता है। मैंने कल रात स्कूल की छत पर खड़े होकर देखा था।"

बबलू ने कहा, "अंकुश, साहब के आदमी रिकॉर्ड कमरे के सामने होंगे। तुम पीछे से गए तो वो पकड़ लेंगे।"

"इसीलिए बाहर हमें कोई चाहिए जो उनका ध्यान बाँट सके," मैंने कहा। "कुछ ऐसा जो उन्हें लगे कि हम सामने से आ रहे हैं।"

टिंकू ने कहा, "मैं करूँगा।"

"क्या?"

"मैं सुबह के गोलू को साथ लूँगा। हम सामने वाली गली में शोर करेंगे। जैसे कोई काग़ज़ छीनकर भागा जा रहा हो। साहब के आदमी वहाँ दौड़ेंगे, और आप पीछे से अंदर।"

मैं मुस्कुराया। "टिंकू।"

"हाँ?"

"तू बड़ा हो गया है।"

वो शरमाया। "बस उस्ताद, शोर करने में तो हम पहले से उस्ताद हैं।"

मीरा ने अपनी कॉपी बंद की। "एक बात पहले ही साफ़ कर देता हूँ। जो कमरे में मिलेगा, उसकी फोटो मैं लूँगी। नहीं, कैमरा बंद रहेगा — बात कर ली है। लेकिन जो काग़ज़ निकलेगा, उसकी नक़ल मैं लिखूँगी। हाथ से। कॉपी में। और वो कॉपी मेरे पास रहेगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि अगर सुबह वो काग़ज़ गायब हो गया, तो हमारे पास शब्द बचेंगे। और शब्द काग़ज़ से ज़्यादा ज़िंदा रहते हैं।"

उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा और एक बात कही जो मुझे अब तक याद है।

"बेटी, यही बात पचास साल पहले मेरे भाई ने कही थी। और उसी बात ने उसे गायब करवा दिया। सँभलकर।"

मीरा ने उनकी तरफ़ देखकर कहा, "उस्ताद, मैं पचास साल पहले वाली मीरा नहीं हूँ। और यह गली मुझे पता है।"

मैंने सबको बैठाया और योजना समझाई। पाँच बजे — मैं, मीरा, टिंकू, उस्ताद। बबलू बाहर रहेगा, ताकि कोई उसे देखकर न शक करे कि वो हमारे साथ है। सानिया और उसकी टोली स्कूल के गेट पर पहरा देंगे। पापा घर रहेंगे, माँ के पास।

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

"पापा, आप घर पर रहिए।"

"नहीं।"

"पापा —"

उन्होंने मेरी बात काटी। "मैं बाहर खड़ा रहूँगा। गली के मोड़ पर। जो पहले आए, मुझे मिलेगा पहले। बाईस साल से मैं पीछे रहा। अब नहीं।"

मैंने उनकी आँखों में देखा। वहाँ जो था, वो डर नहीं था। वो कुछ और था। वो किसी का हिसाब चुकाने की ज़िद थी।

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