The Mysterious Bell – Chapter 1219
"क्योंकि कल रात मैंने वो काग़ज़ अपनी आँखों से जलाया था," उसने कहा। "और उसकी राख मैंने नाली में धो दी थी। आज सुबह उठा, तो मुझे याद नहीं आया कि मैंने किसको बचाया था और किसको डराया था। बस इतना याद आया कि एक औरत थी, जो मेरी बीवी है, और वो कहती है कि मैं बदल गया हूँ।"
"तो?"
"तो आज पहली बार मुझे लगा कि वो सच कहती है।" उसने अपनी गर्दन पर हाथ रखा, जहाँ चेन हुआ करती थी। "अब मैं साहब का आदमी नहीं हूँ। और जो आदमी नहीं है, उसका कोई फ़ायदा भी नहीं रहता। इसलिए मैं तुम्हें बता रहा हूँ — क्योंकि मेरे पास खोने को कुछ नहीं बचा।"
टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर बबलू की तरफ़। फिर बोला।
"उस्ताद, अगर वो पन्ना उन्होंने मिटा दिया, तो?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने अपनी सूची वाली कॉपी उठाई और सात नंबर पर उँगली रखी।
"तो सातवाँ काग़ज़ किसी ऐसी जगह पर होगा जहाँ उन्हें भी पता नहीं," उसने कहा। "क्योंकि जो आदमी काग़ज़ मिटाने में इतना डरता है, वो अपने पास एक कॉपी ज़रूर रखता है। धमकी देने के लिए।"
उस्ताद अली बक्श कोने में बैठे थे। उन्होंने अपना चश्मा सीधा किया और बहुत धीरे बोले।
"रिकॉर्ड कमरे के पन्ने सिर्फ़ काग़ज़ नहीं होते, बेटा। वो इस गली के बूढ़ों के अंगूठे होते हैं। जिसने उन्हें मिटाया, उसने उन लोगों को मिटाया जो आज ज़िंदा नहीं हैं। ज़मीन का हिसाब मिटता है; अंगूठे का निशान नहीं मिटता।"
मैंने कुर्सी खींची और बैठ गया। मेरी टाँगें हल्की काँप रही थीं, और मुझे यह बात किसी से नहीं कहनी थी।
"मीरा," मैंने कहा। "मेरे पास अब एक ही तरीक़ा है।"
"बोल।"
"अभी रात हो चुकी है। अगर अब हम उस कमरे में गए, तो अंधेरे में सिर्फ़ उनकी शर्तें मिलेंगी। साहब के आदमी हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। और हम अगर रात में पकड़े गए, तो सुबह गली की कोई भी औरत हमारे लिए दरवाज़ा नहीं खोलेगी।"
बबलू ने कहा, "तो?"
"तो सुबह होते ही जाएँगे। जब गली जागेगी। जब स्कूल का गेट खुलेगा। जब चाय की गुमटी पर भीड़ होगी। ऐसी भीड़ जिसके बीच से कोई आदमी पकड़कर गायब नहीं हो सकता।"
मीरा ने कुछ सोचा। फिर बोली।
"रात में कमरे पर पहरा?"
"पहरा," मैंने कहा। "पर तुम्हारा नहीं। तुम्हारा काम कुछ और है।"
"क्या?"
"तुम्हारी कॉपी। जो अब तक हमें पता है, वो सब उस पर उतार दे। सुबह से पहले। अगर सुबह हम पकड़े भी गए, तो कोई एक काग़ज़ तो ऐसा हो जो बाहर जा सके।"
मीरा ने एक लंबी साँस ली। "ठीक है। पर एक बात साफ़ कर लो। सुबह मैं कैमरा लेकर चलूँगी।"
"मीरा —"
"सुन लो पहले।" उसने मेरी बात काटी, जो वो अक्सर करती है और जिसका मुझे अब गुस्सा नहीं आता। "मैं कैमरा लेकर तो चलूँगी, पर वो बंद रहेगा। जो कमरे में मिलेगा, वो खबर नहीं है। वो सच है। और सच का पहला गवाह कैमरा नहीं होता, आँखें होती हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखें थकी हुई थीं, पर वहीं वो बात थी जो मुझे उसमें अच्छी लगती है — ज़िद, जो खबर के लिए नहीं, सच के लिए होती है।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर अगर वहाँ कुछ ऐसा हुआ —"
"तो मैं भागूँगी नहीं," उसने कहा। "अगर भागना होता, तो पाँच साल पहले भाग जाती।"
कमरे में वापस चुप्पी आ गई। फिर बाहर गली में कोई गुज़रा, और चप्पलों की आवाज़ दूर तक गई।
मैं उठा और दरवाज़े के बाहर झाँका। गली में पीपल की लालटेन अब भी जल रही थी, बहुत धीमी, जैसे सुबह होने से पहले वो बुझने का इंतज़ार कर रही हो।
मैंने दरवाज़ा बंद किया।
"टिंकू।"
"हाँ उस्ताद।"
"तुम घर जाओ। माँ को बता दो कि आज रात मैं देर से आऊँगा।"
"मैं नहीं जाऊँगा।"
"टिंकू —"
"उस्ताद, आपने कहा था कि मैं अब बच्चा नहीं हूँ। तो फिर बच्चे की तरह घर क्यों भेज रहे हो?"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि बबलू बोल पड़ा।
"बच्चा ठीक कह रहा है।"
हम सबने उसकी तरफ़ देखा।
बबलू ने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मेज़ पर रखा। वो छोटा था, चारों तरफ़ से मुड़ा हुआ, जैसे किसी ने जल्दी में जेब में डाला हो।
"यह साहब के दफ़्तार की दराज़ से आया था," उसने कहा। "मुझे नहीं पता इसमें क्या है। मैंने पढ़ा नहीं।"
मैंने काग़ज़ खोला। उस पर सिर्फ़ तीन लाइनें थीं, नीली स्याही में, बहुत छोटे अक्षरों में।
'रिकॉर्ड कमरा — सुबह सात से पहले।
पन्ना निकालो, बाक़ी जला दो।
जो पहले आए, उसका नाम भी जला दो।'
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा।
"सात बजे?" मीरा ने कहा।
"सात बजे," मैंने कहा, "हमारे पहले।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। और उस सन्नाटे में मुझे अपनी ही साँस बहुत तेज़ सुनाई दी।
फिर मैंने कहा, "तो फिर सात का इंतज़ार नहीं। हम पाँच बजे निकलेंगे।"
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। तीन दस्तकें, बहुत धीमी, जैसे कोई बुज़ुर्ग आया हो।
हम सब चौंक गए।
टिंकू दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, पर मैंने उसका कंधा पकड़ लिया।
"मैं खोलूँगा।"
दरवाज़ा खोला, तो बाहर सुबह की हवा थी, और उस हवा में पापा खड़े थे। उनके हाथ में एक पुरानी बही थी, जिसकी जिल्द काली पड़ चुकी थी और जिसके कोने कुते हुए थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। सीधे अंदर आए, मेज़ के पास गए, बही रखी और बैठ गए।
"पापा?"
"बैठ जाओ," उन्होंने कहा।
यह वो आवाज़ थी जो मैंने पिछले कई दिनों में नहीं सुनी थी। उसमें डर नहीं था, थकान नहीं थी। उसमें बस एक चीज़ थी — तय। जैसे कोई आदमी पूरी ज़िंदगी किसी चीज़ से बचता रहे और फिर एक दिन सामने आकर खड़ा हो जाए।
मैंने बैठकर बही की तरफ़ देखा।
"यह?"
"यह मेरी नहीं है," पापा ने कहा। "यह उस आदमी की है जो रणवीर के दफ़्तार में पुराने हिसाब रखता था। जो अभी भी उसके साथ है, पर उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं आता।"
"वही जो अस्पताल वाली ज़मीन का सच जानता है?"
पापा ने सिर हिलाया।
"वही।"
मैंने बही खोली। पन्ने पीले थे, ब्याही हुई बहन के पुराने लिफ़ाफ़े जैसे। ऊपर की शीट पर सिर्फ़ साल लिखा था, और फिर नीचे तारीख़ों की कतारें, रकम, नाम, और हर नाम के आगे कोई शब्द नहीं — बस एक लकीर।
मैंने पन्ने उलटने शुरू किए। आधे पन्ने पर लिखाई खत्म हो गई थी और बीच से एक पन्ना फाड़ा हुआ था। फटा किनारा दाँतेदार था, जैसे किसी ने जल्दी में खींचकर निकाला हो।
मैंने अपनी जेब से वो भीगा काग़ज़ निकाला जो कल रात नल के नीचे मिला था। मैंने उसे बही के फटे किनारे पर रखा।
किनारे मिल गए।
एकदम मिल गए। दाँतेदार, तिरछे, कोई भी कोना अलग नहीं। जैसे दो हिस्से जो एक ही शरीर के हैं और बहुत दिनों बाद आपस में मिले हों।
मैंने साँस रोक ली।
टिंकू ने झाँका और बोला, "उस्ताद, यही है।"
मीरा ने अपनी कॉपी खोली और जल्दी से लिखने लगी।
पापा ने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा और बोले, "यह काग़ज़ इसी बही का है। यानी जो काग़ज़ नल के नीचे मिला, वो इसी आदमी ने गिराया।"
"वो गली में क्यों आया?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें कुछ कहने से पहले डरीं, फिर उन्होंने खुद को सँभाला।
"क्योंकि वो यह चेक करने आया था कि पुराने हिसाब की बही कहाँ है। और यह बही मेरे पास है। बाईस साल से।"
कमरे में फिर चुप्पी छा गई। सिर्फ़ मेज़ पर पड़ी बही के पन्ने हवा से हिल रहे थे, हल्की-हल्की, जैसे कोई बूढ़ा कराह रहा हो।
मैंने तीन बार गहरी साँस ली। फिर पूछा।
"पापा, यह बही आपको किसने दी?"
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