The Mysterious Bell – Chapter 1218
तभी बाहर से भाप और मसालों की गंध आई। शबनम आपा ने दरवाज़े पर थाली रखी — चार कुल्हड़ चाय, एक प्लेट समोसे, और एक छोटी कटोरी में हरी चटनी।
"तुम दोनों यहाँ काग़ज़ों की सभा कर रहे हो और चाय कोई और पीएगा?" उसने कहा।
"आपा, आपको किसने बोला?" मैंने कहा।
"किसी ने नहीं। मैंने खुद सोचा।" उसने थाली मेज़ पर रखी और मेरी तरफ़ देखा। "कल रात की बात के बाद मुझे नींद नहीं आई। सोचती रही — मैंने पंद्रह साल अपनी बहन से नहीं बोला, और आज वो मेरी ही गुमटी में चूल्हे के पास बैठी है। तो फिर यह डर किस बात का?"
"और रज़िया?" मीरा ने पूछा।
शबनम आपा ने एक कुल्हड़ उठाया। "वो सोई है। थकी थी। दोपहर में आएगी।" फिर वो थोड़ा झुकीं। "पर एक बात कह रखती हूँ, अंकुश। ताला ठंडा है तो ठंडा रहने दे। तुझे किसी औरत का नाम ढूँढना है, तो ढूँढ। पर जो नाम मिले, उसे गली में ढिंढोरा मत बजा देना। कुछ नाम ऐसे होते हैं कि बोलने से टूट जाते हैं।"
वो चली गईं।
मैंने चाय का कुल्हड़ उठाया। वह गरम था। और मेरा हाथ अभी भी ठंडा था।
दोपहर तक गली में खबर फैल गई। कैसे फैली, यह मुझे आज तक नहीं पता। शायद शबनम आपा ने कहा। शायद टिंकू ने।
तीन बजे चारों बच्चे मेरी दुकान पर खड़े थे। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और पीछे चिंटू, जो हमेशा पीछे ही खड़ा रहता है, जैसे उसे पता हो कि उसकी बारी अभी नहीं आई।
सानिया ने अपनी लाल कवर कॉपी खोली।
"उस्ताद, हमने एक दस्ता बनाया है," उसने कहा।
"क्या बनाया?"
"सच का दस्ता," गुड्डू ने कहा, बहुत गर्व से।
रफ़ीक़ ने अपना चश्मा ठीक किया, जिसका एक काँच पहले से गायब है। "नियम भी बनाए हैं।"
"दिखाओ," मैंने कहा।
सानिया ने कॉपी का पन्ना पलटा और पढ़ने लगी, "एक — जो देखें, वही बताएँ। दो — जो सुने, उसमें अपनी बात न मिलाएँ। तीन — किसी को पकड़े जाने पर पतंग ढूँढ़ने की बात कहें।"
"यह तीसरा नियम किसका है?" मैंने पूछा।
"मेरा," चिंटू ने कहा। "क्योंकि मैं पकड़ा जाता हूँ।"
टिंकू आगे आया। "उस्ताद, हम रणवीर के आदमियों पर नज़र रखेंगे। जो भी आए, जो भी बाहर जाए, हम गिनेंगे। आप बस काग़ज़ों का काम देखिए।"
मैंने उन सबको देखा। पाँच बच्चे, एक फटा बैग, एक कॉपी और बहुत सारा भरोसा।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है। दो से ज़्यादा दूर मत जाना। और अगर कोई गाड़ी रुके, तो भागकर आना। समझे?"
"समझे," सबने कहा। चिंटू ने सबसे ज़ोर से।
वो निकल गए। मैं दुकान के दरवाज़े पर खड़ा उन्हें देखता रहा, जब तक वो मोड़ से मुड़कर गायब नहीं हो गए।
तभी काजल का फोन आया।
"भैया, माँ की दवा दस दिन की बची है। डॉक्टर इसरानी ने कहा है कि नई खेप अब भी रुकी है।"
"पता है," मैंने कहा।
"और माँ ने आज सुबह तुम्हारा नाम नहीं लिया। पहली बार।"
मैं चुप हो गया।
"भैया?"
"सुन रहा हूँ," मैंने कहा। "काजल, तू माँ के पास रह। मैं आज शाम आऊँगा।"
"तुम हर बार यही कहते हो।"
"आज सच कह रहा हूँ।"
फोन कटा। मैंने ताला जेब से निकाला और उसे देखा। वो अब भी ठंडा था, पर इतना नहीं जितना सुबह था। या शायद मेरे हाथ ने ठंड का आदी होना शुरू कर दिया था।
शाम पाँच बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठा था। मीरा सामने, कॉपी खुली। उस्ताद आ गए थे और चुपचाप कोने में बैठे थे।
तभी सानिया दौड़ती हुई आई। साँस फूल रही थी, चेहरा लाल, और आँखों में वो डर और जीत जो बच्चों में एक साथ होती है।
"उस्ताद!" उसने दरवाज़े पर ही चिल्लाया। "उस्ताद!"
"साँस ले," मैंने कहा। "पहले साँस ले।"
उसने घुटनों पर हाथ रखे। दो बार गहरी साँस ली। फिर बोली।
"चंद्रेश की गाड़ी।"
"क्या हुआ उसकी गाड़ी को?"
"वो नए बाज़ार के मोड़ पर खड़ी थी। गुड्डू ने देखा। वो अंदर गया था। गाड़ी खुली थी — पिछला दरवाज़ा। और पिछली सीट पर एक सफ़ेद फाइल रखी थी।"
"सफ़ेद फाइल?"
"हाँ।" सानिया ने अपनी कॉपी से उँगली उठाई, जैसे कोई वकील सबूत दिखाता है। "उस पर नीला गोल निशान था। अस्पताल वाले काग़ज़ जैसा। और उसके ऊपर जले हुए पीले काग़ज़ का टुकड़ा चिपका था।"
मैं खड़ा हो गया।
"तूने ठीक देखा?"
"रफ़ीक़ ने भी देखा। चिंटू ने भी। चिंटू ने तो पढ़ने की कोशिश भी की, पर गाड़ी का शीशा बंद हो गया था।"
मीरा ने कलम रख दी। "अगर चंद्रेश के पास अस्पताल की फाइल है, तो वो उसे रणवीर तक पहुँचाएगा।"
"या शायद पहुँचा चुका है," उस्ताद ने कोने से कहा।
मैंने कॉपी में लिखी सूची की तरफ़ देखा। सात काग़ज़। और सातवाँ अभी तक नहीं मिला।
"यही सातवाँ है," मैंने कहा।
तभी बाहर गली में जूतों की भागती हुई आवाज़ आई, और बबलू पांडे दरवाज़े पर आ गया।
वो हाँफ रहा था। उसका सफ़ेद रूमाल सिर पर बँधा था और माथे पर पसीना था। उसकी चेन गायब थी, पानदान गायब था। सिर्फ़ वो था — घबराया हुआ, बिना गुरूर का बबलू।
"अंकुश!" उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैं अभी बिजलीघर से आ रहा हूँ।"
"क्या हुआ?"
"साहब ने अपने आदमी भेजे हैं," उसने कहा और दरवाज़े का चौखट पकड़ लिया, जैसे अब उसे गिरना नहीं है। "पुराने रिकॉर्ड कमरे में। उस कमरे में जो अस्पताल की सीढ़ी के नीचे है।"
"किसलिए?"
बबलू ने सीधे मेरी आँखों में देखा।
"अस्पताल वाला पन्ना गायब करने। वो पन्ना जिस पर तेरे दादा का और उस्ताद के भाई का नाम है। वो पन्ना जिस पर वो सात अंगूठे हैं। साहब कह रहे हैं कि जब तक पूर्णिमा की शाम आए, उस कमरे में उस पन्ने का नामो-निशान न बचे।"
मेरी जेब में ताला था। वो एक बार हिला, बहुत हल्का, जैसे सुबह की नींद से जागकर किसी ने करवट ली हो।
और उस्ताद अली बक्श कोने से उठे। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और बहुत शांत आवाज़ में कहा:
"तो अब देर नहीं करनी चाहिए।"
मैंने ताले को जेब में दबाया और कमरे की तरफ़ देखा। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, पसीना पोंछते हुए, मेरी ही तरह।
"टिंकू," मैंने कहा। "पाँच मिनट में तैयार हो जा। हम उस कमरे तक जा रहे हैं।"
"अकेले?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने अपना कैमरा उठा लिया था और मुँह से एक ही बात निकली:
"अकेले क्यों?"
बबलू ने अपने घुटनों पर हाथ रखे और धीरे से, बहुत धीरे, कहा, "और एक बात है, अंकुश। साहब ने उस कमरे में जाने से पहले यह भी कहा कि जो पहले उस पन्ने को छुए, वो यह गली दोबारा नहीं देखेगा।"
॥
बबलू की बात सुनकर कमरे में पहले तो कुछ सुनाई ही नहीं दिया। बस अपनी साँस सुनाई दी, और हाथ में पकड़े ताले की नब्ज़ जैसी हल्की टक-टक।
फिर मीरा ने अपना कैमरा नीचे रखा और बोली।
"यह गली दोबारा नहीं देखेगा?"
बबलू ने सिर हिलाया। उसका सफ़ेद रूमाल सिर पर से खिसककर कान पर आ गया था, और मैंने पहली बार देखा कि उसके कान के पीछे चोट का कोई पुराना निशान है। आदमी के पास चेन नहीं, पानदान नहीं, सिर्फ़ डर था। और डर के साथ एक चीज़ और थी, जो मुझे उसमें नई लगी — शर्म।
"साहब ने कहा," बबलू ने आवाज़ धीमी करके दोहराया, "जो उस पन्ने को पहले छुए, उसका रास्ता गली से बाहर निकल जाएगा। कहीं का नहीं रहेगा।"
मैंने ताले को हथेली में दबाया। वो हल्का ठंडा था, पर बर्फ़ जैसा नहीं। सुबह से कुछ नरम पड़ गया था, जैसे किसी बुज़ुर्ग का बुखार उतर रहा हो।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुमने मुझे यह बात क्यों बताई?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा, फिर दरवाज़े की चौखट से हाथ हटाया और सीधा खड़ा हो गया।
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