The Mysterious Bell – Chapter 1215
"यह तो वही है," मैंने कहा। "जो आपने बाईस साल संभाली थी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। "तूने इसे देखा कहाँ?"
"माँ की संदूकची से निकली थी," मैंने कहा। "काजल ने दिखाई थी। और उस रात यह गायब भी हो गई थी।"
पापा की आँखों में कुछ हिला।
"गायब नहीं हुई थी, बेटा," उन्होंने कहा। "मैंने उठा ली थी। मैंने सोचा कि जिस दिन इसकी ज़रूरत पड़ेगी, उस दिन साथ होगी। और आज…" उन्होंने मेरे हाथ की तरफ़ देखा, जहाँ मैंने ताला निकाला था। "…आज लगता है वो दिन आ गया।"
मैंने चाबी ताले के छेद में डाली।
नहीं गई।
मैंने पलटकर डाली। ज़ोर लगाया। अंदर तक दबाया। मगर वो चाबी घूमी नहीं। वो छेद में गई भी नहीं, आधी रास्ते में अटक गई, जैसे ताले का मुँह बंद कर लिया गया हो।
मैंने बाहर निकाली। फिर डाली। फिर निकाली।
मेरी उँगलियाँ ठंडी हो रही थीं और मेरी साँस फट रही थी।
"नहीं बैठ रही," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैं किसी को नहीं दिखाना चाहता था।
पापा ने चाबी मेरे हाथ से ली और खुद कोशिश की। उनके हाथ काँप रहे थे। चाबी फिर अटकी, फिर निकली। पापा ने एक बार माथा पकड़ा, फिर सीधे खड़े रह गए, जैसे अंदर ही अंदर कुछ टूट गया हो।
"मेरे पास यही थी," उन्होंने कहा। "बाईस साल। बाईस साल यह चाबी मेरी हथेली में रही और आज काम नहीं आई।"
"पापा, रुकिए।" मैंने उनका हाथ थामा। "हर ताले की अपनी चाबी होती है। और हर कुंडी के अपने दाँते। ज़रूरी नहीं कि यह ताला वही हो जिसका यह चाबी है।"
मगर मेरे भीतर एक आवाज़ कह रही थी — फिर किसका ताला है यह? और यह मेरी जेब में क्यों आया?
तभी उस्ताद अली बक्श आए।
वो धीरे चलते हैं, बहुत धीरे, जैसे हर कदम सोचकर रखते हों। उनके हाथ में लाठी थी, कान पर पेंसिल, और मोटे चश्मे के पीछे वो आँखें जो सत्तर साल में बहुत कुछ देख चुकी हैं।
"दिखाओ," उन्होंने कहा।
मैंने ताला उनकी हथेली पर रख दिया।
उस्ताद ने उसे उठाया। हथेली में तोला, जैसे कोई हलवाई बादाम तोल रहा हो। फिर उँगली से उसकी पीठ की दरार पर हाथ फेरा। फिर उसे अपने कान के पास ले गए और एक बार हिलाया।
मैंने सुना — ताले के अंदर कुछ खिसका। बहुत हल्का। जैसे सूखी पत्ती किसी कटोरे में घूम जाए।
उस्ताद ने उसे मेरे हाथ में वापस रखा और देर तक कुछ नहीं बोले। फिर उन्होंने लाठी पत्थर पर टिकाई और दोनों हाथ उस पर रखकर मेरी तरफ़ देखा।
"यह ताला नहीं है, बेटा," उन्होंने कहा।
"तो क्या है, उस्ताद?"
"यह याद का ताला है।"
मैंने ताले की तरफ़ देखा। फिर उस्ताद की तरफ़।
"आप कह रहे हैं कि यह चीज़ किसी की याद है?"
"मैं कह रहा हूँ," उन्होंने धीरे से कहा, "कि पुराने बाज़ार में एक आदमी था — मंसूर। ताले बनाता था। और उसकी एक बात थी। वो कहता था कि दो तरह के ताले होते हैं। एक वो जो चीज़ें बंद करते हैं। और दूसरे वो जो बातें बंद करते हैं। पहले वाले चाबी से खुलते हैं। दूसरे वाले…" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "…दूसरे वाले किसी चाबी से नहीं खुलते।"
"तो कैसे खुलते हैं?"
उस्ताद ने लंबी साँस ली।
"दो आदमी साथ बैठें, तब।"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा, कमीज़ से पोंछा, फिर लगाया। उनकी आवाज़ अब भी धीमी थी, पर उसमें वो भारीपन था जो किसी बहुत पुरानी बात को याद करते वक़्त आता है।
"मंसूर ने एक बार जुड़वाँ ताले बनाए थे। दो ताले, एक जैसे। एक घर में रखा गया और एक दूसरे घर में। चार चाबियाँ बनीं — दो बड़ी, दो छोटी। और शर्त यह थी कि चाबियाँ दोनों आदमियों ने आपस में बदली थीं। मतलब — मेरे घर का ताला तुम्हारी चाबी से खुलेगा, और तुम्हारे घर का ताला मेरी चाबी से। अब बताओ, ऐसा ताला टूटेगा कैसे?"
मैं चुप था।
"यह ताला टूटता नहीं," उस्ताद ने मेरे हाथ में रखे ताले की तरफ़ देखते हुए कहा। "यह सिर्फ़ जुड़ता है। और जिस दिन दोनों आदमी सच बैठकर बात कर लें, उस दिन यह अपने आप, मुफ़्त में, बिना साँधे-साँधे खुल जाता है।"
"और जिस दिन टूटे?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर नहीं, पर डर से बड़ी कोई चीज़।
"जिस दिन टूटे," उन्होंने कहा, "उस दिन दोनों घरों का एक-एक कोना खाली हो जाता है। और वो कोना कभी भरता नहीं।"
रात की हवा एक झोंके में आई और पीपल की पत्तियाँ हिलीं, और उसी आवाज़ में मुझे फिर वो फुसफुसाहट सुनाई दी — तेरी सबसे प्यारी याद अब भी मेरे पास बंद है।
इस बार मैंने पलटकर नहीं देखा।
डॉक्टर इसरानी पास आए। उन्होंने ताले को छुआ और कहा, "रात में लोहा ठंडा होता है, यह तो सामान्य बात है।" मगर फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और अपनी आवाज़ धीमी कर दी। "अंकुश, तेरा चेहरा सामान्य नहीं है।"
"मैं ठीक हूँ, डॉक्टर साहब," मैंने कहा।
"तू ठीक नहीं है," उन्होंने कहा, और मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। "मगर आज रात तुझे ठीक होने की ज़रूरत भी नहीं है। आज रात तुझे सिर्फ़ सोने की ज़रूरत है। और सुबह मैं खुद तेरी माँ को देखने आऊँगा।"
शबनम आपा ने तभी केतली उठाई और आवाज़ तेज़ की, जैसे वो माहौल को तोड़ना चाहती हों।
"अब सब घर जाओ," उन्होंने कहा, "चाय पीकर, और बातें करके। कल सुबह चूल्हा जलेगा, चाय मिलेगी, और जो बात आज अधूरी रह गई, वो कल पूरी होगी।"
कप बँटने लगे। देखते ही देखते पीपल के नीचे हलचल हो गई — कोई कप लेकर खड़ा हो गया, कोई चबूतरी पर बैठ गया, कोई बच्चों को समेटने लगा।
दुबे अंकल ने रमा मैडम से कुछ कहा और दोनों धीरे-धीरे चल दिए। भोला भाई ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बिना कुछ बोले चला गया। नसीमा बाई ने साजिद को साथ लिया और जाते-जाते रुककर कहा, "बेटा, तेरे हाथ में जो भी है, वो तेरे साथ है। हम भी हैं।"
बबलू दूर खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा, कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया, फिर चुपचाप स्कूटर की तरफ़ बढ़ गया। जाते-जाते वो एक बार रुका और उसने इतना कहा, "कल मैं आऊँगा। और जो मुझे बोलना है, वो पूरा बोलूँगा।"
फिर वो चला गया।
पीपल के नीचे अब गिने-चुने लोग बचे थे। तीन लालटेनें जल रही थीं। जो सबसे आख़िर में जलाई गई थी, वो अब भी जल रही थी, पर उसकी लौ अब काँप रही थी, जैसे वो भी जानती हो कि रात का असली हिस्सा अभी शुरू हुआ है।
मैं चबूतरी के किनारे बैठ गया।
तभी मुझे लगा कि किसी ने मेरे बगल में चुपचाप कुछ रखा। मैंने पलटकर देखा।
टिंकू था। वो मेरी अगल-बगल में, उन्नीस तरह से, आधा मुड़ा हुआ बैठा था, घुटनों पर हाथ रखे, आँखें सामने, कुछ नहीं बोल रहा।
टिंकू बिना बोले नहीं बैठता। टिंकू का बोलना उसकी साँस जैसा है। मगर आज वो चुप था। बहुत चुप।
मुझे यह चुप्पी डरा गई।
"क्या हुआ, उस्ताद के उस्ताद?" मैंने कहा। "आज भाषण क्यों बंद?"
वो नहीं हँसा।
कुछ देर बाद उसने कहा, "उस्ताद, आपका हाथ अभी भी ठंडा है।"
मैं रुक गया।
"मैंने छुआ था," उसने कहा, आँखें अब भी सामने। "जब आप ताला लेकर बैठे थे। आपका हाथ ऐसा ठंडा था जैसे हमारे नाना का हाथ।"
"तेरे नाना का?"
"जब वो गए थे," टिंकू ने कहा, बहुत सादगी से, जैसे बच्चे बड़ी बात सादा कर देते हैं। "मैं छोटा था। पर याद है। हाथ ठंडा हो गया था। माँ कहती थी, ठंडा हाथ मतलब कोई अंदर से निकल रहा है।"
मुझे कुछ कहना चाहिए था। कोई मज़ाक। कुछ हल्का। मगर मैं कुछ नहीं बोल सका।
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
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