The Mysterious Bell – Chapter 1212
अंकुश ने सुना — जैसे घंटी ने एक बार, बहुत धीमी आवाज़ में, मेरे कान में कहा — “अब दो।”
फिर वो चुप हो गई।
रोशनी हिली। लालटेनें धीमी हुईं। और मैंने देखा कि उस्ताद अली बक्श ने अपनी गिरी हुई कैंची उठाते वक़्त एक बार मेरी तरफ़ देखा — जैसे कह रहे हों, बेटा, अब देखना, यहाँ से आगे का रास्ता सीधा नहीं है।
और रणवीर — रणवीर ने अपना एक कदम वापस लिया।
बस एक।
पहली बार।
मगर वो एक कदम सबने सुना।
॥
पापा रुके नहीं।
वो रणवीर से तीन कदम दूर आकर खड़े हो गए, और उनके हाथ में वो पीला काग़ज़ था — काँपता, फटा हुआ, जैसे उन्हीं की तरह बाईस साल की थकान उठाए हुए।
“यह काग़ज़ मैंने आज सुबह फाड़ा था,” पापा ने कहा।
सन्नाटा इतना गहरा था कि पीपल की पत्तियों की हलचल सुनाई दे रही थी।
“क्यों?” शबनम आपा ने पूछा। उनकी आवाज़ सबसे आगे से आई, आधी फटी हुई, आधी गुस्से में।
“क्योंकि मैं उसे अपने बेटे के हाथ में नहीं देना चाहता था।” पापा ने रणवीर की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। “मैं उसे जलाना चाहता था। पर फिर सोचा — जो चीज़ मैंने बाईस साल छिपाई, उसे जलाकर मैं खुद उसी आग में बैठ जाऊँगा। इसलिए फाड़ दिया। दो टुकड़े। जैसे मैंने खुद को दो हिस्सों में बाँट लिया — एक जो सच बोलेगा, एक जो अब भी डरता है।”
उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया, फिर रोक लिया।
“नहीं,” वो बोले, “पहले पूरी बात।”
वो भीड़ के सामने खड़े थे और मैं देख रहा था कि उनकी कमर पहले से ज़्यादा झुकी हुई थी — जैसे आज उन्होंने कोई बोझ उतारना तय किया हो, तभी कमर ने अपना काम छोड़ दिया हो।
“मैंने तुम्हारे काग़ज़ों पर अंगूठा लगाया था,” पापा ने रणवीर से कहा। “बाईस साल पहले। जब सुशीला अस्पताल में थी। तीन महीने बेड पर। डॉक्टर कह रहे थे — दवा महीने में एक हफ़्ते की तनख्वाह के बराबर। मेरी दुकान का हिसाब तब भी ठीक नहीं था। मैंने माँ के गहने बेचे, साइकिलें बेचीं, चाचा से उधार माँगा। फिर भी पूरा नहीं हुआ।”
उन्होंने रुककर साँस ली। मुझे लगा उनकी आवाज़ अब भी उसी अस्पताल की गंध में बोल रही है — दवा, कार्बोलिक, और तीन महीने की रातें।
“और तब तुम आए,” वो बोले, रणवीर की तरफ़ देखकर। “तुम तब भी सफ़ेद कुर्ते में आते थे। तुमने कहा — शंकर भाई, बस एक अंगूठा। बाक़ी इलाज का हिसाब तुम्हारा। मैंने कहा — भारद्वाज, मेरी दुकान की ज़मीन…”
पापा रुक गए। उनका गला सूख रहा था।
“तुमने कहा — दुकान नहीं, बस इलाज।”
“और फिर मैंने अंगूठा लगा दिया। उस काग़ज़ पर, जिसे मैंने पढ़ा भी नहीं था। मैंने उसे उँगली से नहीं छुआ, मैंने उसे आँख से पढ़ा नहीं, मैंने बस अपना अंगूठा उसपर दबा दिया — जैसे कोई गर्म तवे पर हाथ रख दे, क्योंकि ठंडा रहने का रास्ता नहीं था।”
भीड़ में से कोई बोला — “तो आपको पता ही नहीं था, शंकर भाई?”
“मुझे पता था कि कुछ गलत हो रहा है,” पापा ने उस आदमी की तरफ़ देखे बिना कहा, “मगर मैं यह भी जानता था कि अगर मैं उस काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगाऊँगा तो कल सुबह सुशीला की दवा बंद हो जाएगी। डर से बड़ा सच कोई नहीं होता। और उस रात मैं सिर्फ़ डर था। सिर्फ़ डर।”
मैंने अपनी जेब में घंटी को महसूस किया। वो अब भी ठंडी थी, पर एक अजीब तरह की। जैसे कोई बहुत दूर से सुन रहा हो।
“अंकुश को नहीं पता था,” पापा ने कहा। उन्होंने इस बार मेरी तरफ़ देखा। सीधे। “नहीं, उससे भी कम — उसे पता नहीं था, क्योंकि मैंने उसे कभी बताया ही नहीं। मैंने उसे यह भी नहीं बताया कि उसकी माँ की दवा कहाँ से आई। उसने मुझसे पूछा था — पापा, अस्पताल का हिसाब कैसे चला? और मैंने कहा — भगवान की दया से।”
उनकी आवाज़ टूटी।
“मैंने भगवान का नाम लिया था, बेटा,” वो मेरी तरफ़ देखकर बोले। “उस दिन। और आज सुबह मैंने तुम्हारे नाम वाला काग़ज़ फाड़ा — अपने बेटे का नाम पढ़कर, और सोचा कि अगर आज यह काग़ज़ गली में गया, तो लोग कहेंगे — शंकर यादव का बेटा भी उसी हिसाब का हिस्सा है।”
“पापा,” मैंने कहा। मगर आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ होंठ हिले।
“नहीं, सुन ले,” पापा ने कहा। “तू सुन ले। और सब भी सुन लें। मेरे बेटे का नाम उस काग़ज़ पर इसलिए था, क्योंकि उस काग़ज़ में लिखा था — दुकान सात, यादव, और आगे खाली जगह। रणवीर आज सुबह मुझे बुलाकर कह रहा था — शंकर भाई, अब बेटे का नाम भी उस जगह पर लिख दो। एक दुकान, एक अंगूठा, दो पीढ़ियाँ। बस।”
“मैंने कहा — नहीं। मैंने कहा — मेरा नाम जहाँ लिखा है, वहीं रहे। बेटे का नहीं लगेगा। और फिर मैंने खुद वो काग़ज़ फाड़ दिया। तुम्हारे दफ़्तार में, तुम्हारी मेज़ के सामने। तुमने मुझे रोका नहीं। तुमने बस मुस्कुराकर कहा — फाड़ो, शंकर भाई। काग़ज़ नहीं रहेगा तो भाईचारा बढ़ेगा। लेकिन मैं जानता था कि तुम ऐसा नहीं सोचते। तुम्हारे पास पहले से ही उस काग़ज़ की तीन कॉपियाँ थीं।”
रणवीर का चेहरा एक पल के लिए जम गया।
काजल जो अब तक शबनम आपा के पीछे खड़ी थी, आगे आई।
“पापा,” उसने कहा। “आपने रात में मुझे नहीं बताया?”
“तू माँ के पास थी,” पापा ने कहा। “और मैंने सोचा — जब भी बताऊँगा, सबके सामने बताऊँगा। तेरे सामने, तेरे भाई के सामने। किसी कोने में खड़े होकर चुपचाप नहीं।”
मैं उस वक़्त क्या सोच रहा था, मुझे नहीं पता। मुझे बस याद है — मैंने पापा के चश्मे की तरफ़ देखा। वो टेप वाला चश्मा। एक काँच चटका हुआ। और उसके पीछे पापा की आँखें — जो मैंने पहली बार बिना छुपी हुई देखीं।
पैंतीस साल के रणवीर भारद्वाज नहीं — मेरे पचपन साल के पापा। जिनकी कमर झुकी हुई थी, जिनके हाथ में पीला काग़ज़ था, और जिन्होंने आज पहली बार मेरी तरफ़ आँख उठाकर देखा — जैसे कह रहे हों, अब जो कहना है, कह दो।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर दूसरा। फिर मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
उनके हाथ की हड्डियाँ पतली थीं — इतनी पतली कि मुझे याद आया कि वो मुझे छोटा था तब भी उठाते थे। और मैंने उनका हाथ कभी नहीं देखा कि कितना हल्का हो गया है।
“पापा,” मैंने कहा। “आज के बाद कोई अंगूठा नहीं। कोई चुप्पी नहीं। कोई अकेला रास्ता नहीं।”
पापा ने मुझे देखा।
“मैं अब साथ चलूँगा,” मैंने कहा। “अकेले सब ठीक करने की ज़िद बाईस साल की थी। अब नहीं।”
पापा का हाथ मेरे हाथ में काँपा — फिर स्थिर हुआ। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया। और मुझे लगा कि उनका सिर मेरे सिर से टकराया — जैसे दो पहाड़, जो बाईस साल से अलग-अलग थे, अब एक ही रेखा पर आ गए हों।
शबनम आपा ने पहली ताली बजाई। वो भी एक — बस एक, जैसे देख रही हो कि कहीं यह ताली सही वक़्त पर बज रही है या नहीं। फिर उन्होंने केतली मेज़ पर रखी और आगे आईं।
“मेरी भी एक बात है,” उन्होंने कहा। “जो मैंने अब तक नहीं कही। मैंने काग़ज़ नहीं फाड़ा था — पर मैंने भी अपनी बहन से पंद्रह साल की चुप्पी सिर्फ़ ज़मीन के झगड़े में नहीं खींची थी। मैंने उसमें अपनी शर्म छिपाई थी। मैं बड़ी बहन हूँ। मुझे पहले बोलना था। मैंने नहीं बोला — क्योंकि मुझे डर था कि रज़िया मुझसे कहेगी, दीदी, तुमने माँ के आख़िरी वक़्त मुझे नहीं बुलाया। और वो सच था।”
रज़िया आपा ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पहले कुछ था, जो दो पल पहले नहीं था — जैसे कोई रखा हुआ पत्थर हट गया हो।
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