The Mysterious Bell – Chapter 1210
बहुत हल्की-सी। बस इतनी, जैसे किसी ने दूर से एक दीया जलाया हो।
और मेरे कान के पास, बहुत धीमे, बहुत दूर से, उसने एक ही बात कही।
॥
घंटी ने कहा — “दो नाम।”
बस दो शब्द। फिर वो ठंडी हो गई, जैसे किसी ने दीया बुझा दिया हो।
मैंने घंटी को मुट्ठी में दबाया और सामने देखा।
डॉक्टर निहाल इसरानी चबूतरी के अंधेरे कोने से निकलकर सीधे रणवीर के सामने खड़े थे। उनकी छड़ी का सिरा पत्थर पर टिका था और उनका चेहरा उस लालटेन की रोशनी में आधा पीला, आधा गहरा दिख रहा था।
“डॉक्टर साहब,” रणवीर ने कहा। उसकी आवाज़ अब मुलायम हो चुकी थी, जैसे कोई गिरी हुई चीज़ को पैर से नहीं, उँगली से उठाता है। “आपको मैंने कभी किसी बात में नहीं घसीटा। आप मेरे यहाँ…”
“मुझे पता है तुमने मुझे कहाँ-कहाँ रखा है,” डॉक्टर इसरानी ने कहा। “तीसरी मंज़िल, बगल का कमरा, खिड़की वाला। कहा था — रोशनी अच्छी आएगी। और मैंने कहा था — मुझे रोशनी की नहीं, मरीज़ों की ज़रूरत है।”
वो एक कदम आगे बढ़े। छड़ी फिर टक हुई।
“मैं पचास साल से इस अस्पताल में हूँ,” उन्होंने कहा। “इन पचास सालों में मैंने एक बात सीखी है — जो आदमी किसी की ज़मीन पर नज़र रखता है, वो पहले उस ज़मीन के काग़ज़ खोजता है। और जो आदमी काग़ज़ खोजता है, वो कभी उस ज़मीन पर खड़ा नहीं होता, जहाँ बच्चे खेल रहे हों।”
वो रुके। भीड़ में कोई हिला भी नहीं।
“आज मैं तुम्हें कुछ दिखाने ले चलूँगा,” उन्होंने कहा।
“कहाँ?” रणवीर ने पूछा।
“अपने अस्पताल में,” डॉक्टर ने कहा। “मेरी तिजोरी तक। मेरे साथ कोई चलेगा, क्योंकि मैं अकेले तिजोरी नहीं खोलता। ये मेरा नियम है — उस दिन से, जिस दिन से इस अस्पताल में मेरी बीवी नर्स थी और मैंने उससे कहा था कि हम दोनों कभी अकेले कुछ नहीं करेंगे।”
भीड़ धीरे-धीरे हटी। जैसे कोई पानी रास्ता बना रहा हो। पहले दुबे अंकल खड़े हुए। फिर शबनम आपा ने अपनी केतली उठाई और कप कपड़े में लपेट दिए। उस्ताद अली बक्श अपनी स्केल की तरह सीधी कमर लेकर उठे। मीरा ने कैमरा नीचे किया, पर्दा लगाया और पीछे आ गई।
मैं भी चला। घंटी मेरी मुट्ठी में थी — अब ठंडी नहीं, बस हल्की गरम, जैसे किसी ने उसे दूर से देखा हो।
टिंकू मेरी कमीज़ पकड़कर चला। पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पाँचों चुप, जैसे स्कूल में किसी ने उन्हें एक साथ खड़ा कर दिया हो।
अस्पताल का गेट खुला था। दो पहरेदार? आज कोई नहीं था। अँधेरे में नूर अस्पताल की पीली दीवार ऐसी दिख रही थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सहारा लेकर दीवार से टिका खड़ा हो।
डॉक्टर इसरानी पहले चढ़े — सीढ़ियाँ धीरे-धीरे, छड़ी की टिक-टिक के साथ। हम सब पीछे। कोई कुछ नहीं बोला। उनके कमरे में घुसते ही पुराने काग़ज़ की गंध आई — सीलन, कपूर और धूल।
उन्होंने दीवार पर टँगी अपनी बीवी की तस्वीर के नीचे से एक लकड़ी का पैनल सरकाया, और उसके पीछे से तिजोरी दिखी।
तीन चाबियाँ उनकी जेब से निकलीं। एक बड़ी, एक मध्यम, एक छोटी — पीतल की, जिसके छल्ले पर ज़र्द पड़ा रेशमी धागा बँधा था। मैंने देखा — उसी धागे का रंग बिल्कुल वैसा ही था, जैसा धागा रणवीर की उँगली पर कल बँधा था।
तिजोरी खुली। अंदर से एक मोटा, भूरे कपड़े में लिपटा बंडल निकला। डॉक्टर ने उसे अपनी मेज़ पर रखा, कपड़ा खोला — और उसके अंदर से एक दीद निकली।
पीली पड़ी जिल्द। कोने चूहे खा गए थे। ऊपर का पन्ना मोम जैसा, नीचे के पन्ने सुई-धागे से सिले हुए, किनारों से टूटे हुए। जिल्द पर नीली स्याही में सिर्फ़ दो शब्द बचे थे — “नूर” और उसके नीचे “दान”।
डॉक्टर ने चश्मा पहना। टेप वाला चश्मा। उन्होंने एक गहरी साँस ली, जैसे गोता लगाने से पहले।
“आज मैं इसे पढ़ूँगा,” उन्होंने कहा। “और मैं सिर्फ़ वही पढ़ूँगा जो लिखा है। अपनी तरफ़ से एक अक्षर नहीं जोड़ूँगा।”
उन्होंने पन्ना पलटा। स्याही कहीं हरी थी, कहीं नीली। लिखाई मोटी, टेढ़ी और बड़ी।
“यह ज़मीन,” डॉक्टर ने पढ़ा, उनकी आवाज़ कमरे में धीमी गूँजी, “शिवनारायण यादव, मिस्त्री, पुराना बाज़ार — और इलाही बक्श, मिस्त्री, पुराना बाज़ार — दोनों ने मिलकर, बराबर हिस्से से, इस बात पर दी है कि यहाँ इलाज होगा।”
कमरे में किसी ने साँस ली। पीछे खड़े उस्ताद अली बक्श की कैंची पकड़ने वाली उँगलियाँ वैसे ही हवा में रुक गईं, जैसे किसी ने उन्हें बीच में पकड़ लिया हो।
डॉक्टर पढ़ते रहे।
“शर्त यह है कि यह ज़मीन कभी बिकेगी नहीं, कभी गिरवी नहीं रखी जाएगी, और जिस दिन किसी ने इसे बेचने की कोशिश की, उस दिन इस अस्पताल का नाम मिट जाएगा और दोनों घरानों का नाम उसके साथ मिटेगा।”
वो रुके। पन्ना पलटा।
“और यहाँ,” उन्होंने कहा, “नीचे तीन लाइनें हैं। पहली — इलाज किसी से रोका न जाए, चाहे वो पैसा दे या न दे। दूसरी — जो चीज़ इस अस्पताल से जुड़े, वो किसी की जागीर नहीं, सबकी अमानत है।”
वो एक पल चुप रहे। उनका हाथ पन्ने पर टिका था।
“और तीसरी,” उन्होंने बहुत धीमे कहा, “तीसरी किसी औरत के हाथ की लिखाई में है। मेरी बीवी की।”
उन्होंने पन्ना उठाकर भीड़ की तरफ़ घुमाया। अधूरी रोशनी में हमें सिर्फ़ पेंसिल से लिखी पतली लाइन दिखी, बहुत छोटी-सी, किसी ने बाद में जोड़ी थी —
“दीवारें पीली रहेंगी।”
किसी ने हँसा नहीं। डॉक्टर इसरानी ने चश्मा उतारा और दो पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं। मैंने देखा — उनकी ठुड्डी हिली।
“मैंने यह काग़ज़ पाँच साल से नहीं खोला था,” उन्होंने कहा। “मैं डरता था। मुझे लगता था, इसे खोलूँगा तो मुझे याद आएगा कि मैं अकेला क्यों बैठा हूँ।”
फिर वो रणवीर की तरफ़ मुड़े।
“अब तुम्हारी बारी,” उन्होंने कहा। “जो पूछना हो, पूछो।”
और रणवीर ने… मुस्कुराया।
मेरी रीढ़ में ठंडी सुई सी चुभी।
वो मुस्कुराया — वैसी मुस्कान नहीं, जो गुस्से में आती है। वैसी भी नहीं, जो हार में आती है। वैसी, जैसे किसी ने ताश का एक पत्ता नीचे से खींच लिया हो और सामने वाले को दिखा रहा हो कि अभी खेल खत्म नहीं हुआ।
“डॉक्टर साहब,” उसने कहा, मुस्कुराते हुए, “आपने बहुत अच्छा पढ़ा। सच में। जितना अच्छा पढ़ा, उतना ही अफ़सोस हुआ।”
“क्यों?” डॉक्टर ने पूछा।
“क्योंकि भला आदमी वही पढ़ता है जो लिखा हो,” रणवीर ने कहा। “वकील वो पढ़ता है, जो लिखा न हो।”
और उसने उँगली उठाई — हल्की-सी। चंद्रेश आगे आ गया।
चंद्रेश सक्सेना ने अपना झुका हुआ चश्मा सीधा किया, काग़ज़ के ऊपर झुका, और अपने मीठे से लहज़े में बोला, जैसे किसी बच्चे को गुड़ की डली दे रहा हो।
“बेटा,” उसने डॉक्टर से कहा, “आपने इस दीद का सबसे सुंदर हिस्सा पढ़ा। पर आपने बीच का हिस्सा नहीं देखा।”
उसने उँगली पन्ने पर रखी।
“यहाँ — जहाँ तारीख़ लिखी जाती है — वह जगह खाली है। यहाँ — जहाँ दो गवाहों के हस्ताक्षर होते हैं — वह भी खाली है। यहाँ — जहाँ रजिस्ट्री का मोहर लगता है — वो भी नहीं है।”
वो उठा और भीड़ की तरफ़ देखकर मुस्कुराया।
“अब आप ही बताएँ,” उसने कहा, “एक काग़ज़, जिसमें तारीख़ नहीं, गवाह नहीं, मोहर नहीं — और सबसे बड़ी बात, जो किसी दफ़्तार के रजिस्टर में कहीं दर्ज ही नहीं — वो अदालत में क्या है?”
भीड़ में कोई बोला, “काग़ज़।”
“नहीं बेटा,” चंद्रेश ने मुस्कुराकर कहा, “वो एक कहानी है। पुरानी कहानी। बाबा-दादा के ज़माने की। जिसे कोई ज़माना अब पूछता भी नहीं।”
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