The Mysterious Bell – Chapter 1208
उसने रुककर भीड़ पर नज़र डाली।
“आज इस सभा में मेरे मुवक्किल के ख़िलाफ़ झूठी बातें बोली जा रही हैं। नाम लिए जा रहे हैं। इल्ज़ाम लगाए जा रहे हैं। यह बदनामी है, पटेल जी। साफ़ बदनामी।”
मैंने सुना — मेरे पीछे किसी ने लंबी साँस ली। वो साँस किशनलाल काका की थी।
अब पटेल ने काग़ज़ पढ़ा। उसने पहला पन्ना पढ़ा, फिर दूसरा। उसका चेहरा कुछ नहीं कह रहा था। पुराने सिपाही का चेहरा अक्सर कुछ नहीं कहता। वो बस काग़ज़ देखता है। और फिर वो काग़ज़ में जो नहीं लिखा होता, वो देखता है — आदमियों के चेहरे।
“ठीक है,” पटेल ने कहा और उसने काग़ज़ मोड़ा। “सभा खत्म कीजिए।”
शबनम आपा ने केतली नीचे रख दी। बिना आवाज़। बस नीचे।
“जितनी देर में मैं दो जीप बुला लेता हूँ,” पटेल ने कहा, “उतनी देर में सब घर में हो जाइए। तीन दिन की रोक है। और आज रात कुछ नहीं होगा। यह मेरी आख़िरी बात है।”
भीड़ में हलचल हुई।
आपको मालूम है, हलचल की भी आवाज़ होती है? जूते की रगड़, साड़ी का पल्लू, किसी का साँस अंदर खींचना। जब भीड़ डरती है, तो पहले वो पैरों से डरती है।
मैंने अपने हाथ की घंटी देखी। ठंडी। बिलकुल ठंडी। कुछ नहीं बोली।
पर इस बार…
इस बार पैर नहीं हिले।
एक आदमी भी नहीं हिला।
मैंने पहले सोचा, शायद सब सुन ही नहीं पाए। फिर मैंने देखा — भोला भाई का हाथ मज़बूती से नसीमा बाई की डोर के पास रखा था। रफ़ीक़ की अम्मी ने चिंटू को अपने पल्लू में लपेट रखा था। मीरा ने अपना कैमरा सीने से लगा लिया था, पर वो उठाने की तरह पकड़ा हुआ था, छिपाने की तरह नहीं।
और सबसे आगे, चबूतरी के कोने से, दुबे अंकल उठे।
उन्होंने अपनी नीली शर्ट के बटन ठीक किए, अपनी घिसी हुई छड़ी उठाई और एक कदम आगे रखा। फिर दूसरा। उनकी कमर झुकी हुई थी, पर वो झुककर भी दुबे अंकल ही थे।
“पटेल,” उन्होंने कहा।
“साहब,” पटेल ने कहा, और उसकी आवाज़ का ढंग बदल गया — यह ठेकेदार से बात करने वाला ढंग नहीं था, यह पुराने चौकीदार का अपने सिपाही से बात करने का ढंग था।
“मैं रिटायर हूँ,” दुबे अंकल ने कहा, “पच्चीस साल की नौकरी, और पिछले दस साल से मैं इस थाने के बाहर एक कुर्सी पर बैठता हूँ जो थाने की नहीं है। मेरी अपनी है।” उन्होंने चारों तरफ़ देखा। “आदमी अपनी चीज़ पर बैठकर कम झूठ बोलता है। यह आपको भी पता है।”
पटेल चुप रहा।
“मैं आज की सभा में शुरू से बैठा हूँ,” दुबे अंकल ने कहा। “मैंने अपनी आँखों से देखा है। यहाँ कोई किसी को खींचकर नहीं लाया। कोई नहीं रोया, कोई नहीं फँसाया गया। लोग अपने पैरों से आए हैं और अपने पैरों से बैठे हैं।” उन्होंने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिकाई। “और जो-जो यहाँ बोला गया, वो सब अपने मुँह से बोला गया। किसी ने किसी का मुँह नहीं छुआ।”
शबनम आपा ने उस पर अपनी नज़र डाली और उनका हाथ पकड़ लिया।
“एक बात और,” दुबे अंकल ने कहा और वो रणवीर की तरफ़ मुड़े। “जिस सभा में लोग अपने हिसाब के काग़ज़ फाड़कर जलाते हैं और अफवाहें बाँटते हैं, उसका काग़ज़ फिर भी मुझे मिलता है। और जिस सभा में लोग डरकर सच बोलते हैं, उसका काग़ज़ बिना मुहर का आता है।” उनकी आवाज़ धीमी हो गई। “यही फ़र्क़ है, पटेल। यही फ़र्क़ है।”
रमा मैडम एक छोटी सी मेज़ के पीछे खड़ी थीं, जिस पर स्कूल का पीला रजिस्टर रखा था। उन्होंने बाल पीछे किए और आगे आईं।
“पटेल जी,” उन्होंने कहा, “मैं स्कूल में पढ़ाती हूँ, गणित। मुझे तारीख़ों का हिसाब आता है, काग़ज़ों का नहीं। पर एक बात आपको साफ़ बता दूँ — यह जगह सार्वजनिक है। और सार्वजनिक जगह पर सच बोलना अपराध नहीं है। अपराध तो वो होता है, जो सच बोलने से पहले पूछता है कि काग़ज़ कहाँ है।”
किसी ने हँसा नहीं। पर कई लोगों ने सीना सीधा कर लिया।
अब रणवीर ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और उसने अपने हाथ पोंछे, जिन पर धूल नहीं थी।
“अच्छा,” उसने कहा। “ठीक है। सब बोल लो।” उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी जो कार्डों पर छपी होती है। वो सूखी थी, जैसे गरम तवे पर पानी की एक बूँद।
वो घूमा। उसने सबको एक-एक करके देखा।
“किशनलाल काका,” वो बोला।
किशनलाल काका ने सिर उठाया। उनके हाथ में अब भी भुने चने का लोटा था, जो उन्होंने आधा खाया था और आधा नहीं।
“आपकी दुकान का काग़ज़ छह साल से उलझा हुआ है न?” रणवीर ने कहा। “आपके बेटे की नौकरी की चिट्ठी मेरे दफ़्तार से ही निकलेगी। आपकी बेटी के घर से निकलेगी। आज आप एक काग़ज़ पर दस्तख़त कर दें, और यह सब एक हफ़्ते में साफ़ हो जाता है।” उसने मुस्कुराकर कहा, “बस एक दस्तख़त। आप आज क्या कर रहे हैं, काका?”
किशनलाल काका का लोटा झुका।
फिर रणवीर दूसरी तरफ़ मुड़ा।
“नसीमा बी।”
नसीमा बाई का हाथ साजिद के कंधे पर रखा था। साजिद का हाथ जेब में। दोनों हिले नहीं।
“आपकी दुकान की छत,” रणवीर ने कहा, “और आपके साजिद का हिसाब। मैंने कभी नहीं कहा कि मैं नहीं जानता। मैं सब जानता हूँ, बी। और जानने के बाद भी मैं कुछ नहीं बोला। यह मेरी नेकी है। या आदत?” उसने कंधे उठाए। “सोचिए।”
भोला भाई ने अपना मुँह साफ़ किया। गला साफ़ करने जैसी आवाज़ आई।
“भोला प्रसाद,” रणवीर ने कहा, “आपका बयान कल साढ़े नौ बजे थाने में जाएगा।”
“जाएगा,” भोला भाई ने कहा। उसकी आवाज़ काँपी, पर शब्द साफ़ थे।
रणवीर ने उसे दो पल देखा और फिर उसकी नज़र रेडियो वाले बूढ़े पर पड़ी, जो सबसे पीछे बेंच के कोने पर बैठा था, अपनी घिसी लाठी के सहारे।
“बाबा,” रणवीर ने कहा, “आपकी बेटी के बच्चे…”
“मेरी बेटी के बच्चे,” बूढ़े ने उसकी बात काटकर कहा, और उसकी आवाज़ लाठी की तरह सूखी थी, “बड़े हो गए हैं, साहब। जब आप मेरे पास पहली बार आए थे, तब उनका स्कूल बैग छोटा था।”
किसी ने हँसी रोक ली।
मैंने उस वक़्त अपनी घंटी पर हाथ रखा। वो ठंडी थी। पर मुझे लगा — बिलकुल हल्का-सा लगा — कि उसके अंदर कुछ हिला। सुई के सिरे जितना।
अब रणवीर सबसे बड़ी आवाज़ में नहीं, सबसे छोटी आवाज़ में बोला।
“सुनीता,” उसने कहा।
यह नाम किसी ने नहीं सुना था। सिवाय मेरे। मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
“सुनीता कोई नहीं है, साहब,” रमा मैडम ने कहा। “अब नहीं है।”
“सब कोई हैं,” रणवीर ने कहा। “सिर्फ़ नाम बदल जाते हैं।” वो एड़ी से पलटा और एक बार फिर पटेल की तरफ़। “पटेल जी, आप अपनी जीप बुलाइए।”
पटेल ने अपनी जेब से फोन निकाला।
तभी शबनम आपा बोलीं।
“पटेल जी,” उन्होंने कहा। और अब उनकी आवाज़ में वही पुरानी चिमटी थी — वो चिमटी जो गरम हो और किसी को पकड़ने के लिए उठी हो। “आप जीप बुलाइए। हमने कहा न, कोई नहीं रोक रहा। पर जाते वक़्त एक बात सुन लीजिए।”
“बोलिए,” पटेल ने कहा।
शबनम आपा ने अपना शॉल ठीक किया, फिर धीरे-धीरे सबको देखा — बाएँ से दाएँ, पीछे से आगे।
“आज इस गली में कोई अकेला खड़ा नहीं है,” उन्होंने कहा। “न कोई औरत, न कोई बूढ़ा, न कोई बच्चा। आज इन लालटेनों की लौ जितने लोग हैं, उतने हाथ हैं। और जो हाथ एक-दूसरे को पकड़कर खड़े हैं, उन्हें कोई नाम लेकर नहीं डरा सकता।”
और फिर वो हुआ।
मैं पूरी ज़िंदगी उसे भूल नहीं पाऊँगा। मैंने इससे पहले बहुत भीड़ें देखी थीं। मेले की भीड़, माता के मंदिर की भीड़, सिनेमा के बाहर की भीड़। पर वो भीड़ें चलती थीं। ये भीड़ खड़ी और हिलने लगी।
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