The Mysterious Bell1205 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1205

7 min read November 5, 2026

“मुझे भी एक सच बोलना है,” उसने कहा, “और बोलूँगा, सबके सामने, खुले मैदान में। वरना मैं और नहीं सो पाऊँगा।”

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“मुझे भी एक सच बोलना है,” बबलू ने कहा था, “और बोलूँगा, सबके सामने, खुले मैदान में। वरना मैं और नहीं सो पाऊँगा।”

बात कहते वक़्त उसकी आवाज़ में जो ज़ोर आया था, वो अगले ही पल टूट गया।

क्योंकि कहने के बाद वो पीछे हट गया। एक कदम, दो कदम, तीन। जैसे किसी ने उसे गरम पानी में खड़ा कर दिया हो। उसने अपने दोनों हाथ सामने कर लिए, जैसे कह रहा हो — बस, इतना ही, अब मुझे छोड़ दो।

भीड़ ने वो हरकत देखी।

कोई बोला, “अब क्यों पीछे हट रहा है?”

कोई बोला, “बोलना था तो पीछे क्यों जा रहा है?”

बबलू ने अपना मुँह फेर लिया। उसके पास अब न सोने की चेन थी, न पानदान, न वो रौब जो उसके कंधों पर बैठा रहता था। सिर्फ़ एक मोटा आदमी था, पसीने में नहाया हुआ, जो अपनी ही कही बात से डर गया था।

मैं समझ गया। ये वो आदमी है जिसने ज़िंदगी भर सिर्फ़ दूसरों को डराया है। इसे यह नहीं सिखाया गया कि खुद डरने के बाद क्या करते हैं।

मैं उसकी तरफ़ बढ़ा।

“बबलू,” मैंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुने, “तू यहाँ से भागेगा, तो कल फिर वही होगा। तुझे फिर कोई साहब बुलाएगा, तू फिर चुप हो जाएगा। आज तेरे पास यही एक रात है। यहाँ से भागा तो ये रात भी नहीं लौटेगी।”

उसने मेरी तरफ़ देखा।

“मुझे डर लग रहा है, उस्ताद,” उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। “मैं पूरी ज़िंदगी लोगों को डराता रहा। आज पहली बार लग रहा है कि अगर मैंने अपना सच बोल दिया, तो मेरे पास कुछ नहीं बचेगा।”

“जो कुछ होगा,” मैंने कहा, “वो तेरा होगा। साहब का नहीं।”

वो एक पल चुप खड़ा रहा।

फिर उसने अपनी कमीज़ के पीछे हाथ किया, जैसे कुछ ढूँढ रहा हो। मुझे लगा कि फिर कोई काग़ज़ निकालेगा। पर उसने कुछ नहीं निकाला। उसने बस अपना मुँह पोंछा। शायद उसे अब समझ आ गया था कि आज रात काग़ज़ नहीं, आवाज़ चलेगी।

वो आगे आया।

पीपल के नीचे बनी रोशनी में उसका चेहरा दिखा। बत्तीस साल का कोई नहीं रहा था। एक छत्तीस साल का आदमी खड़ा था, जो बच्चों की रंगोली के किनारे खड़ा था, जिसके जूते गीली मिट्टी में धँसे हुए थे।

“मैं,” उसने शुरू किया, और फिर रुक गया। उसने अपना गला साफ़ किया। “मैं उस रात… उस रात बिजलीघर के पास था।”

भीड़ एक साथ चुप हो गई।

मैंने पीछे देखा। शबनम आपा के हाथ में जो केतली थी, वो उसी वक़्त आधी हवा में रुक गई। रफ़ीक़ की अम्मी की चारपाई पर बैठे बुज़ुर्ग पीछे झुक गए। उस्ताद ने अपना चश्मा उतार लिया, जैसे उसके बिना बेहतर सुनाई देगा।

“बिजलीघर के पास?” मैंने पूछा। “किस वक़्त?”

“रात के ग्यारह बजे थे,” बबलू ने कहा, “या सवा ग्यारह। मुझे साहब ने बुलाया था। कहा था कि कुछ काग़ज़ ले जाना है, बक्से में रखने हैं। मैं गया। मैं तो बस गया ही था, अंदर जाने की इजाज़त नहीं थी। मुझे बाहर रुकने को कहा गया था।”

“फिर?” मैंने कहा।

“फिर मैंने सुना,” उसने कहा। “बक्से में से आवाज़ आई। पर आवाज़ उसकी नहीं थी। और वो साहब उससे बात कर रहा था। जैसे… जैसे किसी को वहाँ बैठाकर बात कर रहा हो।”

मेरे हाथ में जो कॉपी थी, वो ढीली हो गई। मैंने उसे कसकर पकड़ लिया।

“कैसी आवाज़?” मैंने पूछा।

“धुएँ जैसी,” बबलू ने कहा, और ये कहते वक़्त उसकी आँखें अपने आप बंद हो गईं, “ठंडी, कुहासे जैसी। जब वो बोलती थी, हवा भी नहीं हिलती थी। मैंने कुछ शब्द पकड़े। और फिर साहब ने… साहब ने कहा — हाँ, अब बस एक और। एक और टूटन।”

भीड़ में हलचल मच गई।

कोई बोला, “कैसी बात कर रहा है ये?”

कोई बोला, “ये सब बहाने हैं, ऐसे ही तो लोगों को फँसाता था।”

“चुप!” मैंने आवाज़ उठाई। मेरी आवाज़ इतनी तेज़ निकली कि मैं खुद चौंक गया। “आज कोई आरोप नहीं। आज सिर्फ़ सच सुनना है। जो बोल रहा है, उसे बोलने दो।”

भीड़ फिर चुप हो गई।

पर बबलू ने एक बार भीड़ की तरफ़ देखकर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।

“मैं जानता हूँ,” उसने कहा, “तुम सब मुझे अच्छा आदमी नहीं मानते। मैं भी खुद को अच्छा नहीं मानता। मैंने बहुतों की दुकान पर अंगूठा लगवाया, बहुतों से धमकी में पैसे लिए। पर उस रात के बाद मैं सो नहीं पाया।” उसने अपना सिर उठाया। “बीस रातें हो गईं। मैं रोज़ रात दो बजे उठ जाता हूँ। मेरी बीवी कहती है कि मैं बदल गया हूँ। मैं बदला नहीं हूँ। मैं सिर्फ़ अब सच जानता हूँ, और सच जानने के बाद आदमी जैसा था वैसा नहीं रह पाता।”

काजल की आवाज़ मेरे पीछे से आई। वो पीछे खड़ी थी, डॉक्टर इसरानी के पास। मैंने उसे देखा नहीं, पर सुना कि उसने अपना हाथ मुँह पर रखा।

“उस रात के बाद,” बबलू ने कहा, “मैंने साहब की परछाईं में एक और साया देखा। मैंने सोचा, धूप का भ्रम होगा। फिर मैंने दुबारा देखा। साये का सिर थोड़ा झुका हुआ था, जबकि साहब सीधे खड़े थे। साया कभी-कभी पीछे हट जाता था, जबकि साहब आगे आ रहे थे। मैंने एक बार उनसे पूछा — साहब, उस बक्से में क्या है? उन्होंने मुझे ऐसे देखा… जैसे मैंने उनसे कुछ ऐसा पूछ लिया जो मुझे कभी पूछने का हक़ ही नहीं था। फिर वो मुस्कुराए और बोले — बबलू, तू अपना काम कर। मेरे बक्से उतने ही हैं जितने तेरे पाप हैं।”

किसी ने ऊँची साँस ली।

“और तुझे ये सब बोलने में इतनी रातें क्यों लगीं?” ये आवाज़ गुड्डू के पापा की थी। “तू उस रात ही क्यों नहीं बोला?”

बबलू ने सिर झुका लिया।

“क्योंकि उस रात मुझे सोने का चेक मिला था,” उसने कहा, “बीस हज़ार का। मैंने सोचा, बस, अब मैं तो बड़ा आदमी हूँ। सब कुछ हो जाएगा, मुझे क्या? पर उस रात के बाद जब मैं अपने कमरे में लेटता था, तो अंधेरे में वही धुआँ दिखता था। मैंने पंखा बंद कर दिया, बत्ती जला दी, चेन उतार दी, पान छोड़ दिया। पर वो धुआँ मेरे भीतर बैठ गया था।”

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“मैंने टिंकू को धमकाया था,” उसने कहा। मेरी छाती ज़ोर से धड़की। “परीक्षा वाले दिन। मैंने उससे कहा था कि बिजली काटने में उसका नाम आएगा। मैंने उसे छत पर जाने से मना किया था। पर वो नहीं माना, और मैं उसे… मैं उसे चुप कराने नहीं गया था। मैं उसे बचाने गया था। मैं उसे बता रहा था कि मत जाओ, वहाँ कुछ गड़बड़ है। पर मैं आवाज़ नरम नहीं कर पाया। मेरा गला ऐसा बन गया है कि सीधी बात भी धमकी जैसी लगती है।”

टिंकू सामने आया। बच्चों को अपने पीछे किए खड़ा था, काला एक काँच वाला चश्मा आज भी आँख पर। उसने बबलू की तरफ़ देखा, और फिर मेरी तरफ़। मैंने उसे कुछ नहीं कहा।

“अब मैं साहब के लिए कुछ नहीं करूँगा,” बबलू ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। “मुझे माफ़ी नहीं चाहिए, किसी से भी माफ़ी नहीं चाहिए। मैं सिर्फ़ ये चाहता हूँ कि आज से मुझे वो धुआँ न दिखे। मैं उस रात था, वहाँ मौजूद था, और मैंने कुछ नहीं किया। मरते दम तक यही मेरे साथ रहेगा। पर आज से मैं कम से कम वो आदमी नहीं रहूँगा, जो सब देखकर भी चुप रहा।”

चुप्पी।

एक लंबी, गहरी चुप्पी। वैसी चुप्पी जो पीपल के नीचे बैठे हर आदमी की साँस में घुस जाती है।

फिर मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया।

क्योंकि घंटी गरम होने लगी थी।

पहले हल्की, फिर तेज़। जैसे किसी ने उसे बाहर निकालकर देखने को कहा हो।

मैंने उसे जेब से निकाला। मेरे हाथ में आते ही वो अपने आप बजी।

नहीं, यह “टन-टन” नहीं थी।

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