The Mysterious Bell – Chapter 1202
"बोलो," मैंने कहा।
"मैं गली का पहला आदमी था जिसने वो लाइन सुनी।" उसने अपना सिर नीचे किया। "और मैंने उसे आगे बढ़ाया। मैंने अपने बच्चों के सामने कहा — देखो, उस लड़के से दूर रहना। मेरे बेटे ने स्कूल में कहा, और फिर स्कूल से वो लाइन तीन सौ बच्चों तक चली गई।"
अब वो बूढ़ा, जिसकी छड़ी की आवाज़ रुक गई थी, अंधेरे में खड़ा था और सुन रहा था। मुझे पता नहीं वो कब लौटा। वो वहीं था, हमारे पीछे, दीवार की छाया में।
"भोला," रमेश भाई ने कहा, "तुमने कभी मुझसे नहीं कहा—"
"क्योंकि मैं तुमसे शर्मिंदा था," भोला ने कहा। "और मुझे पता था कि तुम भी वही करोगे जो मैंने किया — अपने बच्चे को दूर कर दोगे।"
अब दुबे अंकल आगे आए। उन्होंने अपनी नीली शर्ट के कॉलर को ठीक किया, जैसे वो अब भी वर्दी पहने हुए हों।
"मैं पच्चीस साल वर्दी में रहा," उन्होंने कहा। "और उस वर्दी ने मेरी ज़ुबान पर भी वर्दी पहना दी थी। जब गली में ये बात फैली, तब मैं रिटायर हो चुका था। मेरे पास कोई हुक्म नहीं था। मुझे किसी को डराने की ज़रूरत नहीं थी। फिर भी मैं चुप रहा।"
उन्होंने अपना सिर उठाया।
"क्योंकि मुझे आदत थी। मुझे काग़ज़ का डर था, मुहर का डर था, ऊपर से आने वाले आदेश का डर था। और जब तुम मेरे पास आए थे, अंकुश, तब मैंने तुम्हें सिर्फ़ एक शब्द सिखाया — मुहर। काश मैं उस दिन तुम्हें दूसरा शब्द भी सिखाता।"
"कौन सा शब्द, अंकल?" टिंकू ने पूछा।
दुबे अंकल ने उसकी तरफ़ देखा और हल्के से मुस्कुराए।
"ज़ुबान, बेटा," उन्होंने कहा। "जो मुहर से बड़ी होती है।"
उसके बाद डॉक्टर इसरानी आगे आए। उनका पुराना स्टेथोस्कोप उनके गले में लटका था और उनके हाथ में एक मोटा पुराना लिफ़ाफ़ा था।
"मैं डॉक्टर हूँ," उन्होंने कहा। "मैं लोगों से कहता हूँ कि वो मुझसे सच बोलें। पर मैं खुद काग़ज़ के डर से तीन साल तक सच नहीं बोल पाया।" उन्होंने लिफ़ाफ़ा उठाया। "ये अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ हैं। ये मेरे दराज़ में तीन साल बंद रहे। अगर मैंने इन्हें उस दिन खोल लिया होता जिस दिन ये पहली बार आए थे, तो शायद रणवीर को इतनी हिम्मत न होती।"
उन्होंने लिफ़ाफ़ा नीचे कपड़े पर रख दिया।
"मुझे माफ़ी नहीं माँगनी," उन्होंने कहा। "मुझे तुम सबसे सिर्फ़ इतना कहना है कि मैंने डर के आगे अपने मरीज़ों को नहीं, अपने काग़ज़ों को बचाया।"
अब रमा मैडम आगे आईं। वो अपने स्कूल के उसी पुराने खड़े कपड़े में थीं, जो उन्होंने अभी उतारा नहीं था। उनके हाथ में पीली जिल्द वाला रजिस्टर था, और वो अपनी बगल में उसे दबाए हुए थीं, जैसे वो कोई किताब नहीं, किसी की याद हो।
"आज मीरा ने मेरे सामने सच बोला," उन्होंने कहा। "मुझे पता था कि यह आसान नहीं होगा। पर मुझे यह भी पता है कि अब मेरा सच बोलने का वक़्त है।"
वो रुकीं।
"मैंने अपनी बेटी को चुप कराया था," उन्होंने कहा। "जब वो छोटी थी, तब उसने मुझे बताया था कि उसे स्कूल में कोई रोज़ डराता है। मैंने उसे डाँट दिया था — चुप कर, किसी को कुछ मत बता, स्कूल में बदनामी होगी।"
किसी ने पीछे से पानी का गिलास उन्हें दिया। उन्होंने एक घूँट लिया और आगे कहा।
"उस बच्ची ने उसके बाद कभी कुछ नहीं कहा। किसी से नहीं। मुझसे भी नहीं। और आज, जब वो अपने घर में रहती है, मुझे लगता है कि वो मेरी ही वजह से किसी से बात नहीं करती। मेरी सबसे बड़ी गलती यह नहीं थी कि मैंने एक बुरी खबर छापने दी। मेरी सबसे बड़ी गलती यह थी कि मैंने अपनी ही बेटी की ज़ुबान बंद कर दी।"
उन्होंने रजिस्टर को अपने सीने से लगाया।
"यह मेरा सच है," उन्होंने कहा।
रमा मैडम के बोलते वक़्त, दूर खड़े लोग धीरे-धीरे आगे आने लगे। कोई बैठ गया। कोई घुटनों पर। कोई ज़मीन पर कपड़ा बिछाकर बैठ गया। कोई दीवार के सहारे खड़ा रहा, पर अब वो पहले जैसे दूर नहीं थे।
बच्चे बीच में फुसफुसाने लगे।
"सानिया," चिंटू ने कहा, "ये सब बड़े लोग ऐसे क्यों बोल रहे हैं जैसे कोई परीक्षा दे रहे हों?"
"क्योंकि दे रहे हैं," सानिया ने कहा।
"तो पास कौन होगा?"
टिंकू ने उसकी तरफ़ देखा और अपनी नई कॉपी सीने से लगा ली।
"जो सच बोलेगा," उसने कहा।
और फिर शबनम आपा ने अपनी केतली उठाई।
"अब सब चाय पियो," उन्होंने कहा। "मैंने सात बजे की कही थी, और आठ बज गए। चाय ठंडी हो गई तो मैं दोबारा बना लूँगी, पर पहले तुम सब इसे पियो।"
रमेश भाई ने हल्की हँसी में कहा, "आपा, आपका सच सबसे बड़ा है।"
"हाँ," शबनम आपा ने कहा। "मेरा सच यह भी है कि मैंने आज चाय में चीनी कम डाली है।"
बच्चे हँस पड़े। और वो पहली आवाज़ थी जो उस शाम उस पीपल के नीचे खुलकर निकली थी। मैंने महसूस किया कि मेरे कंधे थोड़े ढीले हुए। शायद उस शाम पहली बार।
मैंने घंटी जेब में डाली, और वो थोड़ी गरम थी।
"तीन से तीन सौ," मैंने धीरे से कहा। "अब समझ आया।"
और जैसे ही मैंने यह कहा, मुझे लगा कि पीपल के नीचे हवा रुक गई।
मैंने पीछे देखा।
भीड़ के आख़िर में, एक लड़का खड़ा था। पच्चीस-छब्बीस साल का। हल्की सी दाढ़ी, फटी जीन्स, और गले में एक पुरानी चाबी। वो वही था जो पिछले हफ़्ते मेरे पास एक काग़ज़ लेकर आया था, जिस पर लिखा था कि उसका नाम दुकानों की सूची से हटा दिया जाए।
वो आगे आया।
उसके हाथ काँप रहे थे। वो अपने हाथों को जेब में डालने की कोशिश कर रहा था, पर वो जेब से बाहर आ जा रहे थे, जैसे उसे कुछ कहना था और उसका शरीर उसे रोक रहा था।
वो मेरे सामने आकर रुका।
"उस्ताद," उसने कहा। "मुझे कुछ कहना है।"
"बोल," मैंने कहा।
उसने एक बार पीछे देखा, फिर मेरी तरफ़।
"मैं साइकिल के पुर्ज़ों की दुकान चलाता हूँ," उसने कहा। "मेरी दुकान गली के कोने पर है, बीस साल से। मेरे पास दो बच्चे हैं, और मेरी दुकान पर हर महीने मुश्किल से बारह सौ रुपये बचते हैं।"
वो रुका।
"बोल," मैंने फिर कहा। "यहाँ सब सुन रहे हैं।"
"मैंने ही गली में अफवाह फैलाई थी।"
एक पल के लिए पीपल के नीचे कोई हवा नहीं थी।
वो आगे बोला, और उसकी आवाज़ टूट रही थी।
"वो बूढ़े ने जो एक लाइन कही थी, वो काफ़ी नहीं थी। एक लाइन से गली नहीं डरती। लोग सुनते हैं और भूल जाते हैं। पर मैंने उस लाइन को हर उस चाय की दुकान पर जाकर बोला जहाँ लोग बैठते हैं। मैंने कहा — उस लड़के के पास जाने वालों के घर में कुछ टूटता है, और उसकी घंटी में कुछ है जो किसी को नहीं दिखता।"
उसने अपना सिर झुका लिया।
"मैंने यह इसलिए नहीं किया कि मुझे तुमसे दुश्मनी थी। मैंने यह इसलिए किया क्योंकि मेरी दुकान के बाहर एक सफ़ेद गाड़ी आई थी। उसमें बैठे आदमी ने मुझे एक लिफ़ाफ़ा दिया था। उसमें तीन हज़ार रुपये थे और एक पर्ची थी — जिस पर लिखा था, 'जो लाइन तुमने सुनी है, वो हर उस आदमी को सुनाओ जो चाय पीने आए।'"
किसी ने साँस नहीं ली।
"तीन हज़ार," मैंने कहा।
"हाँ," उसने कहा। "और मैंने कह दिया। और मैंने यह भी कहा कि मैंने उस लड़के को अपनी आँखों से चीज़ें ठीक करते देखा है, और वो चीज़ें ठीक इसलिए होती हैं क्योंकि वो उनसे कुछ लेता है।"
वो मेरी तरफ़ देखकर रोने लगा।
"मुझे माफ़ कर दो, उस्ताद। मुझे उस दिन माफ़ कर दो जब तुम मेरी दुकान के सामने खड़े थे और मैंने तुम्हें देखकर अपना शटर गिरा दिया था।"
उस रात, तीन लालटेनों की रोशनी में, पूरी गली ने सुना।
और मैंने अपनी जेब में घंटी को ठंडा होते महसूस किया।
न गरम। न बजती।
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