The Mysterious Bell – Chapter 1201
"गली की धूल में भी चमकते थे। ऐसे जैसे वो उस दिन पहली बार पहने गए हों। और उसके हाथ में एक सफ़ेद काग़ज़ था, मोड़ा हुआ। उसने मेरी दुकान के शटर के नीचे से वो काग़ज़ सरका दिया और कहा — भैया, तुम्हें कोई पढ़ना नहीं है। तुम्हें बस एक लाइन बोलनी है।"
मेरे हाथ में जो काग़ज़ था, उस पर वही लिखा था।
एक लाइन बोल दो।
"कौन सी लाइन?" मैंने पूछा।
उसने अपना गला साफ़ किया। और फिर बोला, इतने धीरे कि पीपल की डालियों में बैठी कोई चिड़िया भी उससे ज़्यादा ज़ोर से बोल रही होगी —
"मैंने कहा था — उस लड़के के पास जो घंटी है, उससे घर में कुछ टूटता है।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया। ऐसे ठंडा हो गया जैसे कोई पानी का गिलास सीने पर रख दे।
"बस?" मैंने पूछा।
"बस।"
"और उसके बदले?"
उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटा मैला काग़ज़। उसने उसे नहीं खोला। बस हाथ में पकड़े रहा।
"तीन सौ रुपये," उसने कहा। "मेरी दुकान का किराया बाकी था। मैंने सोचा, एक लाइन है। किसी का घर नहीं टूट रहा, किसी की जान नहीं जा रही। बस एक लाइन है।"
"तीन सौ रुपये," मैंने दोहराया।
और मेरे हाथ में घंटी, जो अब तक गरम थी, एक बार फिर काँपी और उसने वही तीन शब्द कहे जो उसने पहले कहे थे —
तीन से तीन सौ।
मैंने घंटी को हथेली में कसकर बंद कर लिया।
अब मुझे समझ आया।
तीन सौ रुपये में खरीदी गई एक लाइन, और वो एक लाइन तीन सौ मुँह तक पहुँच गई। हर मुँह ने उसमें कुछ जोड़ा। कोई कहने लगा कि घंटी में काला जादू है। कोई कहने लगा कि उस लड़के के पास जाने वाले के घर में बीमारी आती है। कोई कहने लगा कि उसकी दुकान में बैठे हुए किसी की नज़र लग जाती है।
और एक दिन, वो लाइन, जो एक बूढ़े ने अपनी दुकान का किराया बचाने के लिए बोली थी, गली का सच बन गई।
मैंने उस बूढ़े की तरफ़ देखा।
"आपने उस लाइन को दोहराया?"
"मैंने एक बार कहा था।"
"और कितनी बार?"
वो चुप रहा।
"बूढ़े काका," मैंने कहा। "कितनी बार?"
"जब भी कोई मेरी दुकान पर रेडियो ठीक कराने आता," उसने कहा, "मैं उससे कह देता था — भाई, उस लड़के के पास मत जाना। उसके पास जो घंटी है, वो ठीक नहीं है। और मैं अपनी दुकान के पीछे वाले कमरे में जाकर उस लाइन को याद करता था, जैसे कोई रोज़ कोई पाठ याद करता हो।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो लाइन मेरी अपनी नहीं थी। वो मेरे मुँह में किसी और ने डाल दी थी, और मुझे लगा कि अगर मैं उसे बोलता रहूँगा, तो मेरी दुकान बची रहेगी।"
वो अपनी लाठी पर और झुक गया।
"और मेरी दुकान बची रही, अंकुश। आज भी मेरा शटर उठता है। पर पंद्रह दिन से मैं उसके नीचे खड़ा नहीं हो पाया। क्योंकि जब भी मैं शटर उठाता था, मुझे लगता था कि गली मेरी तरफ़ देख रही है और पूछ रही है — बूढ़े, वो लाइन तुमने कहाँ से लाई थी?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
पीपल से एक पत्ता गिरा। उसने हवा में एक चक्कर लगाया और एक लालटेन की लौ के पास से गुज़रकर ज़मीन पर आ गिरा।
"मैं तुम्हारे पास आया था," वो फिर बोला। "उस दिन, जब मेरी दुकान के नीचे वो काग़ज़ आया था। मैंने दरवाज़ा खोलकर देखा तो तुम दूर खड़े थे, बच्चों के साथ। मैंने सोचा — बोल दूँ? और फिर मैंने सोचा — नहीं, ये लड़का है, इसकी उम्र क्या है, और मेरी दुकान का क्या होगा?"
उसने अपनी लाठी उठाई और धीरे से उसे अपने कंधे पर रख लिया।
"आज तुमने वो दरवाज़ा खोला जो मैंने पंद्रह दिन से नहीं खोला था," उसने कहा। "मैं चला। तुम बाक़ी लोगों से बात करो।"
वो चल दिया।
उसकी लाठी की टिक-टिक अंधेरे में दूर होती गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
"उस्ताद," शबनम आपा ने धीरे से कहा। "लोग आ रहे हैं।"
मैंने चारों तरफ़ देखा।
दूर, पीपल के घेरे के बाहर, कुछ साये हिल रहे थे। कोई दीवार के पीछे से झाँक रहा था। कोई नीम के पेड़ के नीचे खड़ा था। कोई गली के मोड़ पर। और फिर, धीरे-धीरे, जैसे बरसात के बाद पानी सूखता है और ज़मीन दिखती है, वो साये पास आने लगे।
पहले आया भोला भाई। उसके हाथ में स्टील का गिलास था, जिसमें चाय ठंडी हो चुकी थी। उसके पीछे रमेश भाई। उसके पीछे कोई औरत, सिर पर दुपट्टा। फिर कोई बूढ़ा, फिर एक लड़का, फिर दो और।
वो सब दूर खड़े हो गए।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
वो ऐसे खड़े थे जैसे कोई फ़ैसला सुनने आए हों। जैसे मैं कोई अदालत हूँ और वो सब आरोपी हैं, और उन्हें पता है कि जो अब सामने आएगा, उससे कोई नहीं बचेगा।
"बैठो," मैंने कहा। "तुम सब बैठो। कोई कुर्सी नहीं है, यहाँ कपड़ा बिछा है। ज़मीन साफ़ है।"
कोई नहीं बैठा।
शबनम आपा ने अपनी साड़ी ठीक की और उस कपड़े के बीच में खड़ी हो गईं। उनके हाथ में एक लालटेन थी।
"मैं पहली सच बोलूँगी," उन्होंने कहा। "क्योंकि मैं पहले आई थी।"
उन्होंने लालटेन नीचे रख दी और अपने दोनों हाथ सामने जोड़ लिए, जैसे कोई दुआ माँग रहा हो, या कोई माफ़ी।
"मैंने डर के मारे अपनी गुमटी बंद की," उन्होंने कहा। "मुझे दुकानदार कहते हैं, और मेरी गुमटी में रोज़ सौ आदमी चाय पीते हैं। पर जिस दिन गली में ये बात फैली कि अंकुश के पास जाने वाले के घर में कुछ टूटता है, मैंने अपनी गुमटी का शटर नीचे गिरा दिया। उस दिन मैं अंकुश से बात करने गई थी, पर मैंने उससे सिर्फ़ इतना कहा — बेटा, आज से तू दूर से नमस्ते कर दिया कर।"
वो रुकीं।
"यह मेरा सच है," उन्होंने कहा। "और मेरी उम्र में, इस गली के बीच, इस सच को बोलने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए, और मैं अभी भी काँप रही हूँ।"
उन्होंने अपना एक हाथ उठाया। वो सच में काँप रहा था।
उनके पीछे से उस्ताद अली बक्श की आवाज़ आई।
"बहन," उन्होंने कहा, "मुझे पहले बोलने दो।"
वो आगे आए। उनकी आँखों के नीचे काला था और उनका चश्मा कान पर टेढ़ा था, जैसे उन्होंने उसे आज कई बार सीधा किया हो और फिर भूल गए हों।
"मैंने यह घंटी और इसका जोड़ बहुत दिन छुपाया," उन्होंने कहा। "जब यह लड़का पहली बार मेरे पास आया था, तब मैं उससे कह सकता था कि यह घंटी इस गली की है, यह एक खानदान की है, और इसे तेरे बाप की साइकिल ने नहीं, इस गली के हर उस आदमी ने बचाया है जिसने इस घर में कुछ बनाया है।"
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए, बहुत थकी हुई मुस्कान।
"पर मैं उससे नहीं कह सका।"
"क्यों, उस्ताद?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मैं अपने भाई की बात से डरता था।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू जानता है, अंकुश, मेरे भाई का नाम इलियास है।" उन्होंने कहा। "मैंने उसे पचास साल पहले खो दिया था। और उसके बाद हर रोज़ मुझे लगता था कि जो हुआ, वो इसी घंटी की वजह से हुआ था। और जब भी कोई इस घंटी को छूता था, मैं उसे वापस रखने को कह देता था।"
वो एक कदम और आगे आए।
"अगर मैं पहली बार ही तुझे पूरी बात बता देता," उन्होंने कहा, "तो शायद यह सब इतना दूर नहीं जाता। शायद तेरा नाम किसी काग़ज़ पर न लिखा जाता। शायद मैं अपने भाई से भी पहले से बात कर लेता।"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछा।
"यह मेरा सच है," उन्होंने कहा। "मैंने डर की वजह से छुपाया। और आज, इस उम्र में, मुझे कबूल करना पड़ रहा है कि मैंने एक ज़िंदगी ज्ञान की तरह नहीं, डर की तरह बिताई।"
वो वापस शबनम आपा के पास जाकर खड़े हो गए।
अब भोला भाई ने अपना गिलास पीछे की तरफ़ बढ़ाया, जैसे कोई किसी को दे रहा हो, और फिर उसे अपनी जेब में रख लिया। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने आज दोपहर तुमसे कह दिया था कि मैंने बीस हज़ार लिए। पर एक बात और है।"
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