The Mysterious Bell – Chapter 1200
वो बैठ गईं।
और तब मुझे लगा कि पीपल के नीचे की हवा बदल गई।
लोग अब दूर नहीं खड़े थे।
अब वो रोशनी में थे।
सानिया ने चुपचाप आगे आकर एक पुरानी चारपाई का टुकड़ा ज़मीन पर रख दिया, ताकि कोई बैठ सके। रफ़ीक़ ने गुड्डू को कंधे से पकड़कर आगे किया। चिंटू ने अपनी जेब से कुछ निकाला और टिंकू की तरफ़ बढ़ा दिया। टिंकू ने देखा — चने और गुड़ का एक टुकड़ा था।
"यह कहाँ से?" टिंकू ने धीरे से पूछा।
"पीछे वाली दुकान से," चिंटू ने कहा। "किसी ने रखा था। मैंने उठा लिया।"
"यह चोरी है।"
"नहीं है। यह बैठक का खाना है।"
टिंकू ने उसका सिर हल्के से थपथपाया और दोनों बैठ गए।
शबनम आपा ने कपों में चाय डालनी शुरू की। एक कप उन्होंने उस औरत की तरफ़ बढ़ाया जिसने अभी "बस इतना" कहा था। वो औरत पहले हिचकी, फिर आगे आकर कप लिया और धीरे से बोली, "मैंने भी उन दोनों को चाय पिलाई थी, आपा। जो कह रही थीं कि घंटी से बीमारी फैलती है।"
"पता है," शबनम आपा ने कहा। "मैं वहीं खड़ी थी।"
औरत का चेहरा उतर गया।
"चुप रह," शबनम आपा ने कहा। "आज यहाँ कोई किसी को कुछ नहीं कहेगा। तूने अपनी बात बोल दी। बस। अब चाय पी।"
फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो गरम थी।
पहली बार कई दिनों में।
मैंने उसे धीरे से हिलाया। उसने एक बार टन की आवाज़ दी, बहुत हल्की, जैसे कोई दूर किसी कमरे में बजी हो।
और मैंने कहा — नहीं, मैंने नहीं कहा। मैं कुछ कहने ही वाला था कि भीड़ के सबसे पिछले हिस्से से एक आदमी आगे आया।
वो बूढ़ा था। घिसी हुई लाठी थी उसके हाथ में। सफ़ेद कमीज़, मैली धोती और गले में एक पुराना गमछा। मैंने उसे पहचाना। वो रेडियो वाला बूढ़ा था — वही जिसकी दुकान का शटर उस दिन आधा गिरा मिला था, वही जिसने मेरी दुकान की तरफ़ देखा भी नहीं था।
उसके हाथ काँप रहे थे।
नहीं, यह काँपना नहीं था। यह वो कंपकंपी थी जो आदमी के शरीर में तब आती है जब वो बहुत देर से अपने आप से लड़ रहा हो और हार गया हो।
वो आगे आया।
और उसने कहा, "मैंने ही गली में अफवाह फैलाई थी।"
पीपल के नीचे हवा भी रुक गई।
मुझे लगा किसी ने मेरे सीने पर हाथ रखकर दबा दिया है। मेरे हाथ में कप था और कप मेरी उँगलियों में हिल गया।
कोई नहीं बोला।
बच्चों ने भी मुँह बंद कर लिया। सानिया ने रफ़ीक़ का हाथ पकड़ लिया। टिंकू खड़ा हो गया।
और वो बूढ़ा वहीं खड़ा रहा, अपनी लाठी पर झुका हुआ, जैसे बोलने के बाद उसके पास खड़े रहने की ताक़त नहीं बची हो।
"मैं समझा नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ बहुत धीमी निकली।
उसने अपनी जेब से कुछ निकाला।
एक मुड़ा हुआ काग़ज़। उसके किनारे फटे थे और उस पर कोई मुहर नहीं थी, सिर्फ़ टाइप किए हुए काले अक्षर थे।
"यह मेरे शटर के नीचे आया था," उसने कहा। "यह वाला नहीं। यह वाला तो बाद में आया। पहले जो आया था, वो मेरे हाथ में था। और उस पर लिखा था कि मेरी दुकान अड़तालीस घंटे में खाली हो जाएगी।"
उसने काग़ज़ हिलाया।
"और उसी रात एक आदमी आया। सफ़ेद कुर्ता, चमकते जूते। उसने कहा, काका, तुम्हारी दुकान का काग़ज़ मेरे पास है। मैं उसे रोक सकता हूँ।"
उसने एक लंबी साँस ली, जैसे सीने में कुछ अटका हुआ हो।
"मैंने कहा, क्या करना होगा। उसने कहा — एक लाइन बोल दो। बस एक लाइन। किसी का नाम मत लो। किसी को इल्ज़ाम मत दो। बस इतना कह दो कि इस गली में जो उस लड़के के पास जाता है, उसके घर में पिछले दो महीने में कुछ न कुछ टूटा है।"
मेरे हाथ से कप मेज़ पर रखा, और मुझे अपना ही हाथ पराया लगा।
"मैंने कहा," बूढ़े ने कहा, उसकी आवाज़ टूट रही थी, "एक लाइन से क्या होगा।"
उसने आँखें उठाईं।
"बस एक लाइन। मैंने वो लाइन चाय की दुकान पर बोली। तीन लोगों से। बस तीन। और वो तीन लोग कहीं और गए, और उनके बाद कहीं और। और पंद्रह दिन में वो लाइन पूरी गली में उस काग़ज़ से ज़्यादा सच लगने लगी जिस पर मुहर लगी थी।"
किसी ने ज़ोर से साँस छोड़ी। कहीं पीछे एक औरत ने अपना मुँह दुपट्टे से ढक लिया।
"और सबसे बड़ी बात," बूढ़े ने कहा, और अब वो रो रहा था, बिना आवाज़ के, बस आँखों से पानी बह रहा था, "जब सानिया को बुखार आया और लोगों ने कहा कि यह घंटी की वजह से है, तब मैंने सुना। मैं वहीं खड़ा था। मैंने सुना और मैंने अपनी ही लाइन पहचानी। और मैं कुछ नहीं बोला। क्योंकि अगर मैं बोलता, तो सबको पता चल जाता कि वो लाइन कहाँ से शुरू हुई थी।"
उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई और उस पर दोनों हाथ रख दिए, जैसे गिरने से बच रहा हो।
"मैंने एक लाइन बोली थी," उसने कहा। "और उसने पूरी गली को डरा दिया। मेरी दुकान बच गई, अंकुश। मेरा शटर खुला है आज भी। पर मैं पंद्रह दिन से उसके नीचे खड़ा नहीं हो पाया।"
पीपल से एक पत्ता गिरा। वो लालटेन की लौ के पास आकर काँपता रह गया और फिर जल गया।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
वो गरम थी। बहुत गरम।
और उसने, बहुत धीमी आवाज़ में, सिर्फ़ तीन शब्द कहे, इतने धीमे कि मुझे लगा मैंने उन्हें सुना या सिर्फ़ सोचा।
"तीन से तीन सौ।"
मैंने घंटी को हथेली में बंद कर लिया, और मुझे लगा कि पूरे पीपल के नीचे, तीन लालटेनों की रोशनी में, सबसे ज़्यादा डरा हुआ आदमी मैं हूँ।
क्योंकि मुझे अब पता चल गया था कि गली को मेरी घंटी से नहीं, मेरे नाम से डराया गया था।
और वो नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा गया था।
वो किसी की ज़ुबान से निकला था।
उस बूढ़े ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"यह रख ले," उसने कहा। "मैंने इसे पंद्रह दिन अपनी अलमारी में रखा। अब जगह नहीं है मेरे पास।"
मैंने काग़ज़ लिया। उस पर अड़तालीस घंटे की बात लिखी थी, और नीचे किसी हाथ से नीली स्याही में एक लाइन जोड़ दी गई थी, जो टाइप नहीं थी, लिखी हुई थी।
वो लाइन थी — "एक लाइन बोल दो।"
उसी नीली स्याही में।
मैंने उसे टिंकू की तरफ़ बढ़ाया, और टिंकू ने देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, क्योंकि उसने वो स्याही पहले भी कहीं देखी थी।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, "यह वही स्याही है—"
"हाँ," मै"हाँ," मैंने कहा। "यही स्याही है।"
टिंकू ने काग़ज़ को और पास करके देखा। उसने उँगली उस नीली लाइन पर रखी और फिर हाथ पीछे खींच लिया, जैसे उसने किसी की नब्ज़ छुई हो और वो ठंडी निकली हो।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "यह वही स्याही है जो उन काग़ज़ों पर थी, ना? जो चंद्रेश के दफ़्तार से आए थे?"
"हाँ।"
"और यही स्याही उस लिफ़ाफ़े पर भी थी जो तुम्हें पीपल के नीचे मिला था?"
"हाँ।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली और वो काग़ज़ अपनी जेब में डाल दिया, जैसे कोई चीज़ जो बहुत कीमती हो और जिसे वो किसी और के हाथ में नहीं छोड़ना चाहता।
मैंने बूढ़े की तरफ़ देखा।
वो अब भी अपनी घिसी लाठी पर दोनों हाथ रखे खड़ा था। लाठी का निचला सिरा ज़मीन पर गोल पत्थर जैसा घिसा हुआ था, और उसकी उँगलियाँ उस पर इस तरह बैठी थीं, जैसे आदमी किसी बेंच पर बैठकर अपने घुटनों पर हाथ रखता है।
"कौन था?" मैंने पूछा। "वो आदमी कौन था जिसने आपको यह काग़ज़ दिया?"
उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसका ध्यान पीछे के अंधेरे में चला गया, जहाँ तीन लालटेनों की रोशनी के बाहर सिर्फ़ काला था।
"नाम नहीं पता," उसने कहा। "चेहरा भी नहीं पहचाना। पर उसके जूते याद हैं।"
"जूते?"
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