The Mysterious Bell – Chapter 1198
"अभी बात करूँगी।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।
बहुत धीमी। बहुत दूर से आती।
लकड़ी की।
किसी छड़ी की आवाज़, जो ज़मीन पर टिक-टिक करके चल रही हो। मैंने पलटकर देखा, पर अंधेरे में कुछ नहीं दिखा। रोशनी के घेरे से बाहर सिर्फ़ काला था।
आवाज़ आती रही।
टिक।
टिक।
टिक।
धीरे-धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी बहुत धीरे-धीरे चल रहा हो, इत्मीनान से, जैसे उसे पता हो कि जहाँ वो जा रहा है वहाँ कोई जल्दी में नहीं है।
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर उनके मुँह पर एक हल्की मुस्कान भी थी और उनकी आवाज़ में वो धार थी जो पंद्रह साल से किसी और के लिए नहीं रखी गई थी।
"तो," उन्होंने कहा और अपनी लालटेन उठाकर उस कपड़े के बीच में रख दी, "शुरू कर। मैं पहली सच बोलूँगी।"
पीपल से एक पत्ता गिरा और लालटेन की लौ के पास जाकर काँपता रह गया।
और पीछे के अंधेरे में छड़ी की आवाज़ एक बार और टिकी, फिर रुक गई — जैसे किसी बूढ़े ने अपनी साँस रोककर सुनना शुरू कर दिया हो।
॥
छड़ी की आवाज़ आख़िरी बार टिकी और फिर रुक गई।
मैंने पलटकर देखा। रोशनी के घेरे से बाहर सिर्फ़ काला था। तीन लालटेनें जल रही थीं, और उनके पार अंधेरा इतना घना था, जैसे किसी ने पीपल के नीचे से दुनिया काटकर अलग रख दी हो।
"कौन है?" मैंने कहा।
कोई जवाब नहीं आया।
शबनम आपा ने केतली उठाई, कप में चाय डाली और कप मेरी तरफ़ सरका दिया।
"पी ले," उन्होंने कहा। "बोलने से पहले पी ले। पंद्रह साल से मैं खुद को यही कह रही हूँ, और हर बार पीकर रख देती हूँ।"
मैंने कप उठाया। चाय गरम थी और उसमें अदरक तेज़ थी। मेरे हाथ ठंडे थे और कप की गरमाहट उँगलियों से सीधे सीने तक चली गई।
तब मैंने देखा कि पीपल के नीचे सिर्फ़ हम दो नहीं हैं।
अंधेरे के किनारे पर, पीली रोशनी की आख़िरी लकीर से बाहर, लोग खड़े थे।
पहले मुझे लगा दो-चार होंगे। फिर आँखें टेढ़ी करके देखा तो सफ़ेद कुर्ते, गमछे, साड़ियाँ, टोपियाँ — कम से कम पच्चीस-तीस लोग। कोई बैठा नहीं था। सब खड़े थे। हाथ बँधे हुए। मुँह चुप। और सब उतनी ही दूर, जितनी दूर से कोई अदालत में फैसला सुनने खड़ा होता है।
मुझे लगा, ये सच बोलने नहीं आए हैं।
ये यह देखने आए हैं कि आज किसका नाम लिया जाएगा।
मैं खड़ा हुआ।
"सुनो," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सूखी थी, इसलिए मैंने गला साफ़ किया। "मैं साफ़ कह देता हूँ। आज यहाँ कोई किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाएगा। कोई काग़ज़ नहीं। कोई अंगूठा नहीं। कोई मुहर नहीं। और कोई नाम नहीं लिया जाएगा। जो बोलेगा, वो बस अपनी एक छोटी-सी अनकही बात बोलेगा। और बोलने के बाद किसी की तरफ़ उँगली नहीं उठेगी।"
अंधेरे में कोई बोला, "पर वो लाइन भी तो किसी के नाम पर ही लगेगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "आज कोई लाइन नहीं लगेगी। सिर्फ़ इतना कि मैं कहाँ चुप रहा।"
एक और आवाज़ आई। भारी। बूढ़ी। "और अगर किसी ने झूठ बोला तो?"
मैंने जेब से घंटी निकाली।
वो ठंडी थी। पिछले कुछ दिन से वो ज़्यादातर ठंडी ही थी। पर मैंने उसे उँगलियों में पकड़कर ऊपर उठा दिया, जैसे कोई तराज़ू का पलड़ा दिखा रहा हो।
"इसका कोई काम नहीं," मैंने कहा। "झूठ पकड़ने का काम भगवान का है, मेरा नहीं। मैं तो बस एक बात कहूँगा — आज यहाँ जो झूठ बोलेगा, वो खुद जानेगा कि झूठ बोला। और जब अकेले में बैठेगा तो उसका अपना ही दरवाज़ा उससे वो बात दोबारा पूछेगा। बस इतना।"
फिर मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा।
वो किनारे पर अपनी अपनी कुर्सी पर बैठे थे। वही नीली शर्ट, वही चश्मा, और हाथ में छड़ी। उनके बगल में कोई काग़ज़ नहीं था, कोई मुहर नहीं थी, कोई वर्दी नहीं थी।
"दुबे अंकल," मैंने कहा। "आज आप सुनने वाले हैं। कोई किसी को टोकेगा नहीं। आप बस इतना देखिए कि कोई किसी का नाम ले तो उसे रोक दिया जाए।"
उन्होंने कुर्सी का पैर दबाकर देखा। फिर बोले, "अपनी कुर्सी पर बैठकर आदमी कम झूठ बोलता है। पता नहीं क्यों।"
"तो आज आप यही चलाइए," मैंने कहा।
"चलाता हूँ," उन्होंने कहा और छड़ी ज़मीन पर टिकाई।
शबनम आपा फिर खड़ी हुईं।
उन्होंने अपना शॉल कंधे से उतारकर कपड़े पर रख दिया, जैसे कोई अपना पूरा सामान रख रहा हो, और फिर उन्होंने अपनी लालटेन उठाकर तीनों लालटेनों के बीच रख दी।
"मैं पहली बोलूँगी," उन्होंने कहा। "क्योंकि मैंने सबसे ज़्यादा देर की।"
उन्होंने एक साँस ली।
"जिस दिन मेरी गुमटी के शटर पर वो काग़ज़ चिपका," उन्होंने कहा, "मैंने उसे पढ़ा और मैंने उसे नहीं फाड़ा। उसी दिन मेरे हाथ में वो काग़ज़ था, और उसी रात मैंने अपनी आलमारी में वो काग़ज़ रख दिया। मैं फाड़ सकती थी। आधी गली फाड़ती। एक काग़ज़ फाड़ने से क्या होता है? पर मैंने नहीं फाड़ा।"
मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ शॉल की तरफ़ चली गईं और फिर रुक गईं।
"और उसके बाद," उन्होंने कहा, "वो औरतें आईं। तीन। चार। जो बोलती थीं कि इस लड़के की घंटी से बीमारी फैलती है। मैंने उन्हें चाय दी। चाय देकर मैंने कहा, हाँ बहन, सोचने की बात है।"
भीड़ में कोई हिला। कोई खाँसा।
"मैंने उनकी बात का जवाब नहीं दिया," शबनम आपा ने कहा। "और यह नहीं कि मुझे यक़ीन था। मुझे यक़ीन नहीं था। पर मैं उस वक़्त उठकर खड़ी होने से डर रही थी। क्योंकि मैं पंद्रह साल से एक ऐसे झगड़े में जी रही थी जिसमें मैंने कभी एक हाथ भी नहीं बढ़ाया था। और आदमी को जब चुप रहने की आदत पक्की हो जाए, तो फिर उसे बोलने के लिए बहुत मज़बूत बात चाहिए होती है। मुझे वो बात नहीं मिली।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और कल, अंकुश, जब तेरे यहाँ कोई नहीं आया, तब भी मैं आ सकती थी। तेरे शटर पर कोयले से नाम लिखा देखा था मैंने। मैंने देखा और मैं चली गई। मैंने अपने आप से कहा, एक दिन रुक जा, देख ले, लोग क्या कहते हैं।"
"आपा—" मैंने कहा।
"मुझे मत रोक," उन्होंने कहा। "यह मेरा सच है और मुझे इसे आज पूरा बोलने दे।"
वो रुकीं, और उनकी आवाज़ थोड़ी नरम हुई।
"असली बात यह थी कि मुझे डर था। डर यह था कि अगर मैं तेरे साथ खड़ी हो गई और तू हार गया, तो मेरे पास कुछ नहीं बचेगा। मेरी बहन से पंद्रह साल से बात नहीं हो रही। मेरे पास न कोई आदमी, न बच्चा, न घर। मेरे पास सिर्फ़ यह गुमटी है और यह गली। और मुझे लगा, इस लड़के के साथ खड़े होने से यह गली भी चली जाएगी।"
वो बैठ गईं।
पीपल के नीचे एक पल के लिए कोई कुछ नहीं बोला।
फिर अंधेरे में से किसी ने कहा, "बस इतना?"
वो आवाज़ एक औरत की थी। मैंने देखा, औरत सिर ऊपर करके खड़ी थी, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो आदमी के पास तब आता है जब वो बड़ा इल्ज़ाम सुनने आया हो और उसे कोई छोटी बात सुना दी जाए।
"बस इतना," मैंने कहा। "और यही 'बस इतना' गली को डरा रहा था पिछले तीन दिन। किसी ने किसी का घर नहीं जलाया। किसी ने किसी को मारा नहीं। सबने बस इतना किया कि जब बोलने का वक़्त आया तो चुप रह गए। और चुप्पी किसी को मारती नहीं, बस धीरे-धीरे सबका दरवाज़ा खोखला कर देती है।"
तभी छड़ी की आवाज़ फिर आई।
टिक।
टिक।
और इस बार आवाज़ पास आई, और रोशनी में एक बूढ़ा आदमी आया।
उस्ताद अली बक्श थे। उनके हाथ में लाठी थी और कंधे पर वही पुराना सफ़ेद कुर्ता, जो उन्होंने कहा था कि उन्होंने पचास साल पहले पहली सिलाई मशीन खरीदने के दिन पहना था।
वो आए, लाठी टिकाई और मेरे सामने खड़े हो गए।
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