The Mysterious Bell – Chapter 1197
"भोला भाई।"
"अंकुश," उन्होंने कहा और शटर थोड़ा और ऊपर उठाया। उनके हाथ की हड्डी घिसी हुई थी, चेहरा पतला। "तू अंदर आ जा।"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं आज किसी के अंदर नहीं जा रहा। आज सबको बाहर आना है। पाँच बजे, पीपल के नीचे।"
"सभा?" उनका चेहरा बदल गया। "अंकुश, दरोगा ने तीन दिन की रोक लगाई है—"
"कोई सभा नहीं," मैंने कहा। "कोई बोर्ड नहीं। कोई माइक नहीं। कोई काग़ज़ नहीं। सिर्फ़ हम लोग हैं और एक लालटेन।"
"फिर क्या है?"
"सच की चौपाल," मैंने कहा। "हर आदमी एक छोटी सच्चाई बोलेगा। बस। कोई इल्ज़ाम नहीं।"
भोला भाई ने अपने शटर की तरफ़ देखा। फिर अंदर के अंधेरे की तरफ़, जहाँ उनकी बीवी की बैसाखी रखी थी।
"अंकुश," उन्होंने बहुत धीमे से कहा, "मैंने बीस हज़ार रुपये लिए थे।"
"किससे?"
"उसी से," उन्होंने कहा। "और मैंने उस काग़ज़ पर अंगूठा लगाया, जो मुझे पढ़ना चाहिए था और मैंने नहीं पढ़ा।"
"भोला भाई—"
"अगर मैं यह आज सबके सामने बोलूँ," उन्होंने कहा, "तो मेरी बीवी को क्या मुँह दिखाऊँगा?"
मेरे दिल से एक आवाज़ निकली, जो मैंने रोकी। फिर मैंने वो कहा जो मुझे खुद सुनकर अचरज हुआ।
"भोला भाई," मैंने कहा, "आज सिर्फ़ बोलने का दिन है। आज किसी को कुछ साबित करने का दिन नहीं है। और आज किसी को किसी के सामने नंगा होने का दिन भी नहीं है। आप सिर्फ़ एक बात बोलिए और चले जाइए। बाकी हिसाब वक़्त लेगा।"
वो कुछ देर चुप खड़े रहे। फिर उन्होंने कहा, "मैं तीन बजे की चाय पीकर आऊँगा।"
और मैं मुस्कुरा दिया।
तीसरा घर — नसीमा बाई की राशन की दुकान।
वो बोरियों के बीच बैठी थीं और साजिद सामने खड़ा था। मैंने अंदर जाकर कुछ नहीं कहा। मैं बस दरवाज़े पर खड़ा हो गया।
"बोल," नसीमा बाई ने कहा। "तेरी घंटी की खबर मुझे भी मिली है।"
"आज शाम पाँच बजे।"
"क्या बोलूँगी?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सिर्फ़ बीस साल की अकेली मेहनत के बाद आती है। "कि मेरे बेटे ने उस आदमी से पैसे लिए? कि मैंने भी उन पैसों से दाल की बोरी खरीदी? क्या बोलूँगी?"
साजिद का चेहरा सफ़ेद हो गया।
"अम्मी—"
"चुप कर," उन्होंने कहा।
और फिर मेरी तरफ़ देखकर बोलीं, "तू सबको बोल रहा है?"
"हाँ।"
"और किसी ने हाँ कहा?"
"कुछ ने कहा," मैंने कहा। "कुछ ने नहीं।"
"तो जब आधी गली न आए," उन्होंने कहा, "तो तू किसका सच सुनेगा?"
"जो आएगा," मैंने कहा। "बस उसका।"
वो मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने साजिद की तरफ़ देखा और बोलीं, "पाँच बजे हम दोनों आएँगे।"
और फिर आख़िरी घर — शबनम आपा की गुमटी।
वो शाम के लिए चूल्हा जला रही थीं। मैं गया तो उन्होंने एक पल के लिए चिमटी नीचे रखी, फिर फिर उठा ली।
"मुझे पता है तू क्यों आया है," उन्होंने कहा।
"तो बता दीजिए।"
"तू पाँच बजे की चौपाल बुला रहा है।"
"हाँ।"
"और मुझे बोलने के लिए कह रहा है।"
"नहीं," मैंने कहा। "आपको सिर्फ़ आने के लिए कह रहा हूँ। बोलना है या नहीं, वो आपका काम है।"
उन्होंने चिमटी उठाई, फिर रख दी। यह पहली बार था जब मैंने शबनम आपा को कुछ न करते देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मेरी बहन रज़िया से मेरा झगड़ा ज़मीन का नहीं था।"
"मुझे पता है।"
"कैसे?"
"क्योंकि अगर वो ज़मीन का होता," मैंने कहा, "तो पंद्रह साल में कभी न कभी इंसान बोर होकर बोल देता। ज़मीन का झगड़ा छोटा होता है। माँ का झगड़ा बड़ा होता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने फटाफट पोंछा और गरम चिमटी उठाकर हवा में हिलाई।
"जा," उन्होंने कहा। "मैं सोचूँगी।"
"ठीक है।"
"अंकुश।"
मैं रुका।
"तू हैरान नहीं होगा अगर मैं न आऊँ?"
मैं उनकी तरफ़ मुड़ा।
"हैरान नहीं होऊँगा," मैंने कहा। "पर दुखी ज़रूर होऊँगा। और आपको बताना चाहिए — मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा। मैंने अपने दोस्तों से भी कहा है।"
उन्होंने मुझे कुछ देर देखा और फिर बर्तन करने लगीं।
उस्ताद की दुकान पर मैं सबसे आख़िर में गया।
उन्होंने मशीन पर सफ़ेद कपड़ा डाल रखा था। मैं अंदर गया, तो वो टिक-टिक कर रही थी — धीमी, धीरे-धीरे, जैसे कोई बूढ़ा सिलाई करते-करते सो रहा हो।
"उस्ताद।"
"पाँच बजे," उन्होंने कहा। उन्होंने मुझसे पूछा भी नहीं।
"हाँ।"
"मैं साठ साल से इस गली में हूँ।" उन्होंने मशीन पर हाथ रखा। "और मैंने आज तक किसी सभा में नहीं बोला।"
"तब भी आइए," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि आप न आएँगे," मैंने कहा, "तो कोई एक कुर्सी खाली रहेगी। और उस कुर्सी को देखकर सबको लगेगा कि डर जीत गया।"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। वो बस अपनी मशीन पर हाथ रखे बैठे रहे, और उनकी उँगलियाँ उस लोहे पर धीरे-धीरे घूमती रहीं, जैसे कोई अपने बच्चे का सिर सहला रहा हो।
मैं चला आया।
शाम चार बजे मैं पीपल के नीचे था।
मैंने कुछ नहीं रखा। न बोर्ड, न मेज़, न चौकी, न काग़ज़। सिर्फ़ एक पुरानी चारपाई का टुकड़ा, जिसे रफ़ीक़ की अम्मी ने दिया था और जिस पर हमने मोटा कपड़ा बिछा दिया था।
उस पर एक लालटेन रखी थी।
बस एक।
हमने बुझी हुई गली में उसे जलाया, और उसकी लौ बहुत छोटी थी — इतनी छोटी कि पीपल के पत्तों तक रोशनी नहीं पहुँच रही थी। सिर्फ़ नीचे, उस कपड़े पर, एक गोल पीला घेरा बन रहा था।
पाँच बज गए।
कोई नहीं आया।
मैं खड़ा रहा।
पाँच बजकर दस मिनट।
कोई नहीं आया।
टिंकू मेरे पास आया। उसका हाथ मेरे हाथ पर आया।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैं जाकर फिर बुला लाता हूँ?"
"नहीं," मैंने कहा। "जो नहीं आया, वो नहीं आया।"
"तो हम यहाँ कब तक खड़े रहेंगे?"
"चल," मैंने कहा, "बैठ जाते हैं।"
हम बैठ गए। मैंने घंटी जेब से निकाली। वो ठंडी थी। पिछले कुछ दिनों से वो ज़्यादातर ठंडी ही थी, जैसे वो खुद इंतज़ार कर रही हो।
"एक बात बताओ, उस्ताद," टिंकू ने कहा। "अगर आज कोई नहीं आया, तो क्या ये सब बेकार गया?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं पूछ रहा हूँ—"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। और मुझे यह कहते हुए अचरज हुआ कि सच बोलना कितना आसान होता है जब आप थके होते हैं। "मुझे सच में नहीं पता, टिंकू।"
और उसी वक़्त मुझे गुमटी की तरफ़ से एक आवाज़ आई।
किसी के पैरों की नहीं।
किसी के बर्तन की।
पीतल की।
मैंने सिर उठाया।
शबनम आपा आ रही थीं। उनके हाथ में बड़ी केतली थी और उसके ऊपर कपों की ट्रे रखी थी और उनके कंधे पर एक मोटा शॉल था। उनके पीछे छोटा-सा कोई नहीं था। वो अकेली थीं।
वो सीधी उस कपड़े तक आईं, केतली नीचे रखी और अपनी जेब से माचिस निकाली।
फिर उन्होंने एक और लालटेन जलाई।
और एक और।
तीन लालटेनें जल गईं। अब पीपल के नीचे पीली रोशनी फैल गई और मुझे दिखा कि मैदान खाली है।
"तीन लालटेनें?" मैंने पूछा।
"एक तेरे लिए," उन्होंने कहा। "एक मेरे लिए। और एक उसके लिए जो अभी आएगा।"
"आपको कैसे पता कि कोई आएगा?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा और अपनी साड़ी ठीक की। "पर मैं तीन लालटेन जलाकर बैठने वालों में से हूँ।"
वो बैठ गईं।
मैं उनके सामने बैठ गया।
"आप आईं," मैंने कहा।
"हाँ।"
"क्यों?"
उन्होंने एक लंबी साँस ली। फिर कहा, "क्योंकि कल रात मैंने अपने पीछे के कमरे में जाकर देखा कि मेरे पास पंद्रह साल से एक पुराना मिट्टी का कटोरा रखा है, जो हम दोनों ने मिलकर तोड़ा था। और मैंने उसे फेंका नहीं। मैंने उसे सालों तक अपने पास रखा, अंकुश।"
"तो आप उससे बोलती क्यों नहीं?"
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