The Mysterious Bell – Chapter 1196
मैं गली की तरफ़ चल पड़ा। पैरों के नीचे धूल थी, जो आज कुछ ज़्यादा ही भारी लग रही थी। पीछे से किसी ने मेरा नाम लिया, पर मैंने पलटकर नहीं देखा। मुझे सिर्फ़ वो आदमी दिख रहा था जो गली के मुँह पर खड़ा था, दूर, पीली रोशनी के नीचे, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुद रास्ता रोककर खड़ा हो।
पापा।
वो हिले नहीं। जैसे उन्हें पता था कि मैं आ रहा हूँ, और जैसे उन्हें यह भी पता था कि मैं क्या पूछूँगा।
मैं उनके सामने पहुँचा। दस कदम रह गए, तो मैं रुक गया। मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं रुक गया।
उनकी नीली शर्ट पर धूल थी। बहुत धूल। जैसे वो सुबह से कहीं बैठे हों, किसी पुराने काग़ज़ों के बीच, किसी ऐसी जगह जहाँ हवा भी न हो। उनका एक हाथ सीने पर था, और उस हाथ के नीचे कुछ था — छोटा, बंद, छिपाया हुआ।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ देखा।
और वो भी कुछ नहीं बोले।
हम दोनों वहीं खड़े रहे, जैसे दो आदमी जिनके बीच एक काग़ज़ पड़ा है और दोनों उसे उठाना नहीं चाहते।
फिर मैंने जेब से टुकड़े निकाले।
मेरी उँगलियाँ अब भी काँप रही थीं। मैंने उन्हें हथेली पर रखा और उनकी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये सुबह नल के नीचे पड़े थे," मैंने कहा। मेरी आवाज़ जितनी साफ़ होनी चाहिए थी, उतनी साफ़ नहीं थी। "ओस से भीगे हुए। और इन पर…"
मैं रुक गया।
"इन पर मेरा नाम है, पापा।"
पापा ने टुकड़ों को देखा। बहुत देर तक देखा। फिर उन्होंने आँखें नीची कर लीं, जैसे कोई बच्चा जिसने गलती की हो और जिसे पता हो कि अब बहाना नहीं चलेगा।
"काग़ज़ हिसाब लिखने वाले का था," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी। इतनी धीमी कि मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि वो बोले भी हैं।
"हिसाब लिखने वाले का," मैंने दोहराया। "मतलब?"
"मतलब यह कि वो काग़ज़ मेरा नहीं था," पापा ने कहा। "वो उस आदमी का था जो पीछे बैठकर चाय पीता है और हिसाब लिखता है। मैंने उसे पढ़ा। और फिर…"
वो रुके।
और उस रुकने में सब कुछ था।
"और फिर आपने फाड़ दिया," मैंने कहा।
पापा ने सिर हिलाया।
"क्यों?"
"क्योंकि उस काग़ज़ में तेरा नाम था," उन्होंने कहा। "और जो नाम उस काग़ज़ में लिखा था, वो नाम तेरे किसी काम का नहीं था। वो नाम… किसी और के मुँह में जाने वाला नाम था।"
"किसका काग़ज़ था, पापा?" मैंने पूछा। "नाम बताइए।"
वो चुप रहे।
"पापा।"
"आज नहीं," उन्होंने कहा। "आज रात नहीं।"
"और कब?" मेरी आवाज़ तेज़ हो गई और मुझे उसका अफ़सोस भी हुआ। "कब, पापा? जब वो खुद आकर मेरे सामने खड़ा हो जाएगा? जब वो मेरा नाम किसी और काग़ज़ पर लिखवा देगा? जब—"
"अंकुश।"
मैं रुक गया।
पापा ने हाथ सीने से हटाया। उनकी हथेली में एक छोटी सी चीज़ थी — कुछ ऐसी जिसे मैंने उस पीली रोशनी में ठीक से पहचाना नहीं। लगा जैसे काग़ज़ का मोड़ा हुआ कोना हो, या कोई टुकड़ा जिसे उन्होंने पूरी रात पकड़ रखा हो।
"ये मेरे पास रहेगा," उन्होंने कहा। "आज रात।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये वो आख़िरी चीज़ है," पापा ने कहा, "जो मुझे बताती है कि मैंने किसके लिए सब सहा।"
मैं कुछ नहीं बोला।
पापा ने वो चीज़ फिर सीने से लगा ली और मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था।
"तू अंदर जा," उन्होंने कहा। "मैं यहीं हूँ। मैं दूर नहीं जा रहा।"
"आप सुबह भी यही कहकर गए थे।"
वो थोड़ा मुस्कुराए। बहुत थोड़ा। थकी हुई मुस्कान, जैसे पुरानी साइकिल की घंटी जो बजती तो है, पर आवाज़ में दम नहीं रहता।
"आज सुबह मैं किसी से मिलने गया था," उन्होंने कहा। "अब मैं किसी का इंतज़ार कर रहा हूँ। फ़र्क़ है।"
और वो वहीं खड़े रहे।
मैं लौटा। पीपल के नीचे सब मेरा इंतज़ार कर रहे थे — मीरा, काजल, उस्ताद, शबनम आपा, बच्चे। सबके चेहरे पर वही सवाल।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
मैं सीधा पीपल की चबूतरी के पास गया और खड़ा हो गया। मेरे हाथ में अब भी वो टुकड़े थे। मैंने उन्हें कॉपी के पन्नों के बीच रख दिया, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि उन्हें और कहाँ रखा जाए।
फिर मैंने देखा — चारों तरफ़ लोग थे, पर वो लोग दूर खड़े थे। मेरे पास कोई नहीं आ रहा था। जैसे मैं किसी ऐसी बीमारी का नाम बन गया हूँ जिसे कोई छूना नहीं चाहता।
मीरा मेरे पास आई।
"अंकुश, तुम्हारा चेहरा…"
"मीरा," मैंने कहा। "कल सुबह से पहले मुझे कुछ करना है।"
"क्या?"
"पीपल के नीचे सच की चौपाल," मैंने कहा।
वो कुछ देर मुझे देखती रही।
"सच की चौपाल?"
"ऐसी सभा," मैंने कहा, "जहाँ कोई किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाएगा। कोई काग़ज़ नहीं दिखाएगा। कोई यह नहीं कहेगा कि यह ग़लत हुआ या वो ग़लत हुआ।"
"तो फिर क्या होगा?"
"हर आदमी आएगा," मैंने कहा, "और सिर्फ़ एक चीज़ कहेगा। अपनी एक छोटी सी सच्चाई। बस एक। जो उसने आज तक नहीं कही।"
मीरा ने कुछ सोचा।
"अंकुश, यह आसान नहीं है।"
"मुझे पता है।"
"लोग डरते हैं। लोग यह सोचेंगे कि यह तुम्हारा नया नाटक है। कुछ लोग तो यह भी कहेंगे कि तुम्हारे पास अब कोई तर्क नहीं बचा, इसलिए तुम भावनाओं से खेल रहे हो।"
"तो कहें," मैंने कहा। "पर मैं उन्हें बुलाने तो जाऊँगा।"
"कब?"
"शाम पाँच बजे," मैंने कहा। "आज ही।"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। फिर उसने सिर हिलाया।
"ठीक है," उसने कहा। "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तुम रमा मैडम के पास रहो। उनके हाथ में वो रजिस्टर है और वो आज अकेली नहीं लग रहीं।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गई। फिर बोली, "अंकुश, तुम अकेले नहीं जाओगे।"
"मैं अकेले नहीं जा रहा," मैंने कहा और टिंकू की तरफ़ देखा। "टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — पाँच जासूस चाहिए।"
टिंकू एक पल के लिए खड़ा रहा, फिर उसका चेहरा बदल गया। वो पिछले कुछ दिनों से चुप था, डरा हुआ था। आज पहली बार उसकी आँखों में वो पुरानी तेज़ी लौटी।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैं चलूँगा।"
"पहले एक शर्त," मैंने कहा। "कोई झूठ नहीं। किसी को डराना नहीं। किसी को मजबूर नहीं करना। बस बुलाना है। जो न आए, उसके लिए कुछ नहीं कहना। समझे?"
"समझे," पाँचों ने एक साथ कहा।
और फिर हम निकल पड़े।
पहला घर किशनलाल काका की किराने की दुकान था। मैं अंदर गया, तो वो चने का लोटा मुँह के पास लेकर बैठे थे, जैसे हमेशा बात टालने के लिए करते हैं।
"काका, आज शाम पाँच बजे पीपल के नीचे—"
"अंकुश बेटा," उन्होंने चबाते हुए कहा, "मेरी आँखें कमज़ोर हैं। मैं क्या सच बोलूँगा? मुझे दिखता ही नहीं।"
"काका, सच बोलने के लिए आँखें नहीं चाहिए।"
वो रुक गए। उन्होंने लोटा नीचे रखा।
"तू ठीक कहता है," उन्होंने कहा। "पर मैं आज नहीं आ पाऊँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो चीज़ मैं नहीं बोला," उन्होंने कहा और उनकी आवाज़ भारी हो गई, "अगर वो बोल दी, तो मेरे बेटे को पता चल जाएगा कि उसका बाप उसकी माँ के इलाज के लिए क्या-क्या कर गया।"
मैं चुप हो गया।
"ठीक है, काका," मैंने कहा। "आप नहीं आएँगे, कोई बात नहीं। पर आपका नाम मैं किसी काग़ज़ पर नहीं लिखूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज किसी का नाम कहीं नहीं लिखा जाएगा," मैंने कहा। "आज सिर्फ़ बोला जाएगा।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखते रहे और फिर उन्होंने धीरे से कहा, "तू अजीब लड़का है, अंकुश।"
"वो तो मेरी माँ भी कहती है," मैंने कहा और बाहर निकल आया।
दूसरा घर भोला भाई की दुकान था। शटर आधा गिरा था और अंदर से रेडियो की आवाज़ आ रही थी — जैसे कोई ज़िंदा होने का इशारा दे रहा हो।
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