The Mysterious Bell – Chapter 1194
पापा ने उसे देखा। देखा, और उनका चेहरा वैसा हो गया जैसे किसी ने अंदर से एक तार खींच दिया हो। उन्होंने काग़ज़ नहीं छुआ। बस हाथ को हवा में रोक दिया, और उनकी उँगलियाँ हल्की-हल्की काँपने लगीं।
"पापा?"
"यह उसका काग़ज़ है," उन्होंने कहा। आवाज़ फटी हुई थी।
"किसका?"
वो चुप रहे।
"पापा, किसका?"
"जो मेरे पीछे बैठता था," उन्होंने कहा। "जो चाय पीता था और सबका हिसाब लिखता था। जिसके हाथ में मेरा अंगूठा गया था।"
मेरा गला सूख गया।
"नाम?"
पापा ने काग़ज़ की तरफ़ देखा और फिर अपनी गोद में रखी रिंच की तरफ़।
"कल सुबह बताऊँगा," उन्होंने कहा। "पहले मुझे एक जगह जाना है।"
"कहाँ?"
उन्होंने जवाब नहीं दिया। बस रिंच उठाई, और उसे अपने औज़ारों के ट्रंक में रखने लगे। पर हाथ इतना काँप रहा था कि रिंच दो बार ट्रंक के किनारे से छूटी।
माँ अंदर से बोलीं, "शंकर।"
पापा रुक गए।
"शंकर, अंदर आ जाओ।"
वो उठे और अंदर चले गए। काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही सवाल था जो मेरे अंदर घूम रहा था।
पर हम दोनों ने कुछ नहीं पूछा।
उस रात मैं सोया नहीं। दुकान के पीछे वाले कमरे की चारपाई पर लेटा, और छत की टीन को देखता रहा। घंटी जेब में ठंडी पड़ी थी। बीच में एक बार हिली भी, पर कुछ नहीं बोली। जैसे वो भी इंतज़ार कर रही हो।
सुबह चार बजे मैं उठा। आँगन में गई तो पापा की चप्पलें जगह पर नहीं थीं। खूँटी से उनकी पुरानी नीली शर्ट भी गायब थी।
पाँच बजे उजाला हल्का हो रहा था। मैंने आँगन में पानी का नल खोला, तो देखा कि नल के नीचे पक्के फ़र्श पर काग़ज़ के छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे पड़े हैं। कुछ ओस से भीगे हुए थे। कुछ पर स्याही फैली थी।
मैंने उन्हें उठाया। एक टुकड़े पर "अं" बना हुआ था। एक पर "का" जैसा कोई अक्षर। एक टुकड़े के कोने पर नीली स्याही से बना वही निशान था — दो लकीरें और बिंदु।
जैसे किसी ने कुछ लिखा हो, फिर पढ़ा हो, और फिर फाड़कर फेंक दिया हो।
मैंने सारे टुकड़े जेब में डाल लिए।
पीछे से काजल की आवाज़ आई, "क्या ढूँढ रहा है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा और उठ खड़ा हुआ।
"पापा कहाँ हैं?"
"पता नहीं।"
वो मेरे पास आई, मेरी जेब की तरफ़ देखा, और कुछ नहीं पूछा। बस यह कहकर अंदर चली गई कि माँ की दवा का वक़्त हो गया है।
मैंने छत पर जाकर अपनी कॉपी खोली। उसमें मैंने लिखा —
आज सुबह पापा घर से गए। पीछे काग़ज़ के टुकड़े छोड़ गए। हिसाब कल बंद होगा वाला काग़ज़ दरवाज़े के नीचे था। मुझे नहीं पता कि पहले क्या टूटेगा।
फिर मैंने पेन नीचे रख दी। और दूर देखने लगा।
गली उस सुबह अजीब तरह से ज़िंदा थी।
उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की टिक-टिक आ रही थी। शबनम आपा की गुमटी पर चूल्हा जल रहा था और भाप ऊपर उठ रही थी। नसीमा बाई की दुकान का शटर उठा, और उसके बाद उनकी आवाज़ आई — साजिद को कुछ काम बता रही थीं। कहीं दूर बच्चों के हँसने की आवाज़ आई, और फिर साइकिल की घंटी जैसी कोई छोटी आवाज़।
मेरे सीने में कुछ हिला।
पिछले कई दिनों से गली चुप थी। आज वो चुप नहीं थी।
मैंने शटर उठाया और बाहर की तरफ़ देखा। सामने से एक छोटा लड़का आया — मैंने उसे पहचाना नहीं, वो पीछे की गली का रहने वाला था। उसके हाथ में साइकिल की ज़ंजीर थी, टूटी हुई।
"भैया, ये जुड़ जाएगी?"
"जुड़ जाएगी," मैंने कहा।
वो शरमाया और बोला, "अम्मी ने कहा था आपके पास नहीं आना।"
"तो तू आ गया?"
"अम्मी को पता नहीं चलेगा।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार कई दिनों में, बिना कोशिश किए, मेरे अंदर से हँसी निकली।
"ठीक है," मैंने कहा। "बैठ। और अगली बार पीछे के दरवाज़े से आ।"
मैंने ज़ंजीर जोड़ी। पाँच मिनट लगे। बच्चा पूरे पाँच मिनट मुझे देखता रहा, जैसे किसी जानवर को देख रहा हो।
जब वो जाने लगा, मैंने कहा, "पैसे मत दे।"
वो रुका।
"पर तेरी अम्मी को बता देना कि ज़ंजीर जुड़ गई, और मुफ़्त जुड़ी।"
वो सिर हिलाकर भाग गया। मैंने उसे जाते देखा, और मेरे हाथ में ग्रीस लगी थी और मन हल्का था।
शाम को पीपल चौक पर काम खत्म हुआ।
दिन भर लोग आते-जाते रहे। पीपल के नीचे पड़ी पुरानी ईंटें उठाई गईं, नाली के किनारे की घास साफ़ की गई, और उस जगह की मिट्टी जहाँ पहले हमारा बोर्ड और मेज़ रखी थी, सबको बुहारकर बराबर कर दिया गया।
शाम सात बजे वहाँ पहुँचा, तो मैं रुक गया।
छोटे बच्चे रंगोली बना रहे थे।
सानिया बीच में बैठी थी और उसके हाथ में फूलों की पंखुड़ियाँ थीं। चिंटू ईंट का लाल बुरादा ले आया था और अपनी हथेली से उसे बिखेर रहा था — आधा ज़मीन पर, आधा खुद के कुर्ते पर। गुड्डू कहीं से पीले फूल ले आया और उन्हें एक सीध में रख रहा था। रफ़ीक़ घुटनों के बल बैठा था और अपनी टूटी चश्मे वाली आँख से सबकी रेखाओं को सीधा करने की कोशिश कर रहा था।
रंगोली बन नहीं रही थी। वो बहुत टेढ़ी थी, बीच में से फटी हुई, और कुछ जगह फूल ज़्यादा थे और कुछ जगह खाली ज़मीन।
पर वो हमारी थी।
शबनम आपा ने गुमटी से अपनी बड़ी केतली उठाई और पीपल के नीचे आकर कुल्हड़ बाँटने लगीं। उनके हाथ में समोसे की थाली थी, और वो हर किसी को देते वक़्त एक ही बात कह रही थीं — "गरम है, धीरे।"
उस्ताद अली बक्श अपनी छोटी लकड़ी की स्टूल पर बैठे थे। उन्होंने आज अपनी दुकान का कपड़ा उतार दिया था। उनके हाथ में कुल्हड़ था और वो बीच-बीच में उसे दोनों हाथों से पकड़कर गरमाहट ले रहे थे, जैसे सर्दी में लोग लेते हैं, हालाँकि शाम गरम थी।
और उस चौक के एक कोने में, पत्थर की चबूतरी के किनारे, मीरा बैठी थी।
उसके बगल में रमा मैडम बैठी थीं।
मैंने पहली बार देखा कि मीरा हँस रही है। बिना कैमरा उठाए, बिना यह सोचे कि कहीं कोई कुछ बुरा न सोचे। उसने अपना फटा बैग अपने घुटनों पर रखा था और उस पर हाथ टिकाकर बैठी थी, और रमा मैडम कुछ कह रही थीं, और मीरा सिर हिलाकर हँस रही थी।
रमा मैडम के हाथ में कुल्हड़ था और उनके दूसरे हाथ में एक छोटी कॉपी, जिसे उन्होंने बंद करके अपनी गोद में रख लिया था।
मैं कुछ दूर खड़ा रहा। मैं उनके पास नहीं गया। मुझे लगा कि अगर मैं चला गया तो ये जो चल रहा है, ये रुक जाएगा।
और मेरे अंदर एक अजीब बात हुई। मुझे लगा कि गली की आवाज़ लौट रही है। एक-एक करके। धीरे। जैसे कोई बहुत दिनों बीमार रहने के बाद बिस्तर पर बैठकर पहली बार पानी माँगता है।
सानिया मेरे पास आई। उसके हाथ रंगोली के रंग से भरे थे और माथे पर पसीना था।
"भैया।"
"हाँ।"
"अम्मी ने आज घड़ा खुद भेजा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"खुद?"
"हाँ। मैंने नहीं कहा था। उन्होंने खुद कहा — ये घड़ा चौक पर रख आ, जहाँ सब बैठते हैं।" सानिया ने मिट्टी के घड़े की तरफ़ इशारा किया, जिसका मुँह लाल कपड़े से ढका था। "और यह भी कहा कि पानी भरकर रखना, किसी को पूछना नहीं।"
मेरा गला भर आया।
"अच्छा किया," मैंने कहा।
सानिया ने मेरी तरफ़ देखा और फिर बिल्कुल धीरे से बोली, "भैया, अम्मी ने यह भी कहा कि कल जो होगा, उसमें मैं भी बोलूँगी।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"बोलेगी," मैंने कहा।
तभी टिंकू दौड़ता हुआ आया। वो शाम को लौट सा गया था — राँची नहीं गया था, और उसका स्कूल भी चालू हो गया था — पर आज उसके चलने में एक अलग तरह की सीधी थी। पहले वो हमेशा भागता हुआ आता था, जैसे पीछे कोई पकड़ने आ रहा हो। आज वो चलकर आया।
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