The Mysterious Bell – Chapter 1191
दरवाज़ा खुला। रणवीर उतरा। इस बार अंदर नहीं आया। गेट पर ही खड़ा रह गया, और हाथ जोड़कर उन सबकी तरफ़ देखा जो सुबह से बाहर जमा थे — दुकानदार, माताएँ, खड़े मज़दूर, साइकिल पर बैठे लड़के।
"आप लोग यहीं हैं," उसने कहा, आवाज़ में वही मिठास। "तो सुन लीजिए। दोबारा बोलने में कोई हर्ज नहीं।"
उसने फ़ाइल हवा में उठाई।
"यह इमारत, यह ज़मीन, यह आँगन — सब काग़ज़ों में मेरा है। पिछले महीने रजिस्ट्री हो चुकी है। अगले हफ़्ते से यहाँ न कोई स्कूल, न कोई घंटी, न कोई लालटेन।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"बस बच्चे और उनके सपने — दोनों बाहर।"
वो गाड़ी में बैठा। गाड़ी चली गई।
और मेरी जेब में घंटी बिल्कुल चुप रही।
॥
गाड़ी की आवाज़ दूर तक गई और फिर गायब हो गई।
आँगन में उड़ते काग़ज़ एक-एक करके ज़मीन पर बैठ गए। हवा भी जैसे थक गई थी। रामलाल बाबा गेट की कुंडी पकड़े खड़े थे, हाथ में चाबी, और उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
बाहर जो माताएँ खड़ी थीं, वो अंदर झाँक रही थीं। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। बस आँखें बोल रही थीं।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। इतनी ठंडी जैसे बरसों से किसी तहखाने में पड़ी हो। मैंने उसे हल्का हिलाया। सिर्फ़ टन-टन। कोई आवाज़ नहीं।
रमा मैडम मेरे पास खड़ी थीं और मेरी तरफ़ देख रही थीं, जैसे इंतज़ार कर रही हों कि मैं कब कुछ कहूँगा।
"मैडम, वो काग़ज़ जो उसने दिखाया…"
"मैंने देखा।"
"वो सच्चा है?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, मैं पैंतीस साल से इस स्कूल में हूँ। इस स्कूल की ज़मीन का हर काग़ज़ मैंने अपनी आँख से देखा है। जो उसने आज दिखाया, वो काग़ज़ मैंने पहले कभी नहीं देखा।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
"तो फिर वो…"
"तो फिर यह मानने की ज़रूरत नहीं कि जो काग़ज़ नया दिखे, वो पूरा भी हो।" उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू कंधे पर सीधा किया। "आज काग़ज़ों की बारी है। और काग़ज़ों से बात करने वाला कोई एक होता है।"
तभी गेट पर फिर ब्रेक चरमराई।
सबका सिर उठा।
वही सफ़ेद गाड़ी लौट आई थी। पर इस बार अंदर से पहले चंद्रेश उतरा। उसके हाथ में पीली फाइल थी। फिर रणवीर उतरा। और उसके पीछे-पीछे बबलू।
बबलू मेरी तरफ़ देखकर एक पल के लिए रुका, फिर नज़र नीची कर ली।
रणवीर सीधा गेट तक आया। इस बार अंदर नहीं आया। बाहर जुटी भीड़ की तरफ़ मुड़ा और दोनों हाथ जोड़ लिए।
"माफ़ कीजिए," उसने कहा, इतनी नरमी से जैसे कोई बुज़ुर्ग किसी की बीमारी में आया हो। "मैं जानता हूँ अभी मुझ पर गुस्सा है। पर एक चीज़ दिखाए बिना नहीं जाऊँगा।"
उसने चंद्रेश की फाइल से एक पुराना काग़ज़ निकाला।
वो काग़ज़ पीला था, किनारों से थोड़ा भूरा, और उसके ऊपर बैंगनी स्याही में एक गोल मुहर लगी थी जो धुँधली हो चुकी थी। मुहर का रंग उतर गया था, बस बीच का हिस्सा बचा था।
"यह सालों पुराना है," रणवीर ने कहा। "मेरे पास आज का नहीं, पुराना काग़ज़ भी है। देखिए। इस पर साफ़ लिखा है कि यह ज़मीन पहले मेरे खानदान के नाम दर्ज थी। और जब वो लोग इसे स्कूल के नाम कर रहे थे, तब भी मेरे पिता ने अंगूठा लगाया था।"
एक औरत ने पीछे से आवाज़ दी। "अगर पहले से तुम्हारा था, तो स्कूल इतने साल यहाँ कैसे चला?"
रणवीर मुस्कुराया। "इसीलिए तो कह रहा हूँ, मैं किसी का घर नहीं उजाड़ रहा। मैं तो अपना लेने आया हूँ।"
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "तुम पढ़ो। तुम जोड़ने वाले हो, ना? काग़ज़ पढ़ने में भी तो जोड़ लगता है।"
मैंने काग़ज़ नहीं लिया।
रमा मैडम आगे आईं। उन्होंने हाथ बढ़ाया। "मुझे दीजिए।"
रणवीर ने काग़ज़ उनके हाथ में रखा। वो उस काग़ज़ को उँगलियों से सीधा करके, आँखों से थोड़ा दूर करके पढ़ने लगीं।
पूरा आँगन चुप।
रमा मैडम ने काग़ज़ को उलटा किया। पलटकर देखा। फिर पीछे। फिर किनारे पर उँगली रगड़ी।
"रणवीर जी," उन्होंने धीरे से कहा, "यह काग़ज़ अधूरा है।"
वो हँसा। "मैडम, आप भी…"
"इसमें तारीख़ नहीं है," उन्होंने कहा। "न नीचे, न ऊपर, न मोहर के अंदर। जिस काग़ज़ पर तारीख़ न हो, वो किस दिन का है? इसमें गवाह के दो हस्ताक्षर की जगह है — दोनों जगह खाली है। और सबसे बड़ी बात, इसमें ज़मीन का हिस्सा नहीं लिखा। सिर्फ़ लिखा है कि यह ज़मीन मेरे खानदान की रही है। कौन सा टुकड़ा? कितना? कहाँ से कहाँ तक? कुछ नहीं।"
भीड़ में फुसफुसाहट शुरू हुई।
"एक और बात," रमा मैडम ने आगे कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो चाकू जैसा नहीं, पत्थर जैसा था। "यह ज़मीन स्कूल को दान में मिली थी। दान काग़ज़ से नहीं, बैठक से होता है। उस बैठक में मोहल्ले के बुज़ुर्ग बैठे थे। उनके नाम आज भी दर्ज हैं। और जो ज़मीन दान में मिली हो, वो बिकती नहीं — वापस माँगी जाती है।"
रणवीर की मुस्कान चेहरे पर जमी रही, पर उसकी आँखें रमा मैडम के काग़ज़ पर टिक गईं।
"तो सुन लीजिए," रमा मैडम ने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा। "जब पूरा काग़ज़ आएगा, तब बात करेंगे। आधा काग़ज़ आधी बात कहता है। और आधी बात से यहाँ किसी का घर नहीं टूटेगा।"
माताएँ आगे आ गईं।
शबनम आपा ने केतली मेज़ पर पटकी। "रोज़ नया काग़ज़! कल दुकान, आज स्कूल, परसों अस्पताल! तेरे दफ़्तार में काग़ज़ बनाने वाली मशीन है क्या जो जब चाहे छाप लेते हो?"
नसीमा बाई, जो राशन की दुकान चलाती थीं, अपनी काँपती उँगली उठाकर बोलीं, "मेरी दुकान के काग़ज़ में तूने मेरा नाम ऐसे लिख दिया जैसे मैंने बेच दिया हो! मेरे साजिद ने तो बस एक बार तेरे आदमी से पैसे लिए थे!"
भीड़ में कुछ औरतें थीं जो अब तक खामोश थीं। फिर एक-एक करके कुछ पीछे हटने लगीं। कोई अपने बच्चे का कंधा पकड़कर बाहर खींच ले गई।
मैंने देखा। लोग अब भी डर रहे थे।
रणवीर का आना व्यर्थ नहीं गया था। उसने जो काग़ज़ दिखाया, वो पूरा नहीं था, पर उतना था कि डर बन जाए। डर कभी पूरे सबूत का इंतज़ार नहीं करता। वो आधे सबूत से भी रोटी बना लेता है।
शबनम आपा अपनी लोहे की चिमटी उठाकर हवा में लहराने लगीं, पर मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
"आपा, आप नहीं।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि वो अपने आदमी खड़े किए है पीछे। और अगर आपने हाथ उठाया, तो कल यही काग़ज़ उनके थाने में जाएगा। वो भी पूरा होकर।"
उनका हाथ नीचे आया। आँखों में गुस्सा वैसा ही रहा, पर हाथ शांत हो गया।
तभी भीड़ के पीछे से एक आवाज़ आई।
"मैं बोलूँ?"
सब पलटे।
ज़ुबैदा आगे आ रही थीं। सानिया उनके पीछे थी, बस्ता कंधे पर, आँखें नीची।
ज़ुबैदा सीधी रणवीर के सामने आकर खड़ी हुईं। वो उससे एक हाथ दूर थीं। उनका चेहरा सख्त था, एक भी लकीर नहीं हिल रही थी।
"तुम मुझे जानते हो?" उन्होंने पूछा।
रणवीर ने माथा झुकाया। "बहन जी, मैं तो सबको…"
"अच्छा।" उन्होंने बीच में काट दिया। "तो जानते हो। फिर सुनो। तुम्हारे आदमी मेरे घर के बाहर दो बार आए। पहली बार कह गए कि बेटी स्कूल जाती है ना? दूसरी बार कह गए कि नाम ठीक करवाना है तो दफ़्तार आ जाओ।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
"मैं चुप रही," ज़ुबैदा ने कहा, और उनकी आवाज़ थोड़ी टूटी, पर टूटकर भी ऊपर उठी। "बारह साल से चुप हूँ। मेरे पति… उन्होंने मुझे छोड़ दिया, और मैंने अपने ही घर की चुप्पी को चादर बना लिया। बेटी के सामने कभी नहीं बोली। कभी नहीं।"
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