The Mysterious Bell – Chapter 1190
एक आदमी दीवार के पास खड़ा था — मोटा, काले कोट में, गले में सोने की चेन। उसका हाथ मीटर के बक्से की तरफ़ बढ़ा हुआ था, और उसकी उँगलियों में एक पतली चीज़ चमक रही थी।
और उसी वक़्त गुड्डू ने चिल्लाना शुरू किया।
"चोर! चोर! मीटर के पास चोर!"
चिंटू ने रिम ज़मीन पर पटकी। ठन्न!
किशनलाल काका बेंच से उठे और ज़ोर से बोले, "कौन है वहाँ?"
उस्ताद ने माचिस की डिब्बी जेब में डाली और आवाज़ लगाई, "भोला! भोला, पीछे देख!"
भोला भाई दौड़कर पीछे गए। पर तब तक वो मोटा आदमी दीवार के पीछे मुड़ चुका था। मैंने सिर्फ़ उसका जूता देखा — चमकता काला जूता — और फिर सब ग़ायब।
बबलू था। मैंने उसे पहचान लिया। गले की सोने की चेन से।
वो पीछे हट गया। दौड़ा नहीं। बस हट गया, जैसे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर खींच लिया हो।
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो ठंडी थी। ठंडी और चुप।
परीक्षा चलती रही।
मैं छत से उतरकर बरामदे में आया। रमा मैडम ने मुझे देखा और आँख से इशारा किया — सब ठीक है।
मैं आँगन के किनारे खड़ा हो गया। बच्चे सिर झुकाए लिख रहे थे। सानिया तीसरी कतार में थी, उसकी कलम तेज़ चल रही थी। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा जेब में रख दिया था। चिंटू अपनी कॉपी पर झुका हुआ था और होंठ हिला रहा था, जैसे पढ़ रहा हो।
और टिंकू — टिंकू आख़िरी कतार में बैठा था, स्कूल के पीछे वाले कमरे से निकलकर, मास्टर इरफ़ान के पास।
उसने अपनी उत्तर पुस्तिका पर अपना नाम लिखना शुरू किया — टिंकू कुमार। क, फिर ु, फिर म। जब उसने अपना पूरा नाम लिख लिया, तो उसने कलम नीचे रखी और मेरी तरफ़ देखा।
और मुस्कुराया।
ऐसी मुस्कान जो कह रही थी — देखो, मैंने नाम लिख दिया। मैं यहाँ हूँ। मैं कहीं नहीं गया।
मैंने सिर हिलाया।
तभी मेरी जेब में घंटी हिली।
हल्की। बहुत हल्की। जैसे किसी ने दूर से, बहुत दूर से, किसी पुरानी चीज़ को छुआ हो। वो बजी, फिर रुक गई।
कोई आवाज़ नहीं। कोई शब्द नहीं। सिर्फ़ एक हल्की टन, और फिर चुप्पी।
मैंने आँखें बंद कीं।
और मुझे लगा, जैसे गली ने पहली बार साँस ली हो। जैसे पीपल के पत्ते अब आराम से हिल रहे हों, जैसे गुमटी का चूल्हा बिना डर के जल रहा हो, जैसे दुकानों के शटर आधे गिरे हुए भी पूरे खुले हों।
मैंने घंटी जेब में दबाई और धीरे से कहा, "शुक्रिया।"
घंटी ने जवाब नहीं दिया। पर वो ठंडी नहीं थी।
ग्यारह बजे परीक्षा खत्म हुई। बच्चे उठे, काग़ज़ जमा हुए, और आँगन में एक अजीब सी हल्की हलचल फैल गई — वो हलचल जो लंबे डर के बाद आती है, जब लोग खुद पर यक़ीन नहीं कर पाते कि डर गया।
शबनम आपा ने केतली खोली और सबको चाय बाँटने लगीं। उस्ताद ने लालटेनें समेटीं। रामलाल बाबा गेट पर खड़े मुस्कुरा रहे थे।
और तभी स्कूल के गेट पर एक सफ़ेद गाड़ी रुकी।
गाड़ी से रणवीर भारद्वाज उतरा। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पैंट, बाल साफ़ कटे, हाथ जोड़े हुए। उसके पीछे वकील चंद्रेश सक्सेना थे, हाथ में पीली फ़ाइल, चेहरे पर वही मीठी मुस्कान।
रणवीर आँगन में आया। बच्चों के बीच से गुज़रा। किसी को छुआ नहीं, किसी से बोला नहीं, बस चलता गया और बरामदे की सीढ़ी के नीचे रुक गया।
फिर उसने हाथ जोड़े और कहा, "रमा जी, परीक्षा अच्छी हुई?"
रमा मैडम ने उसे देखा। "आपको क्या चाहिए?"
रणवीर मुस्कुराया। वो मुस्कान जो किसी भी सवाल का जवाब नहीं देती, सिर्फ़ सवाल को छोटा कर देती है।
"मैडम, मैं आपको तकलीफ़ नहीं देना चाहता। पर एक बात सबके सामने कह देना ज़रूरी है, क्योंकि कल से अफ़वाहें फैल रही हैं।"
उसने फ़ाइल चंद्रेश से ली और खोली।
"यह स्कूल की ज़मीन है। और यह ज़मीन — काग़ज़ों में — मेरे नाम है। पिछले महीने रजिस्ट्री हुई है। सारे दस्तख़त पूरे हैं।"
पूरा आँगन चुप हो गया।
रणवीर ने फ़ाइल बंद की और सबकी तरफ़ देखा।
"अगले हफ़्ते यह इमारत खाली होगी। बच्चों को कहीं और दाख़िला देना पड़ेगा। मैं चाहता हूँ कि यह काम आसानी से हो, बिना किसी के नाराज़ होने के।"
उसने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
"आप मेरी तरफ़ से कोई भी मदद माँग सकती हैं। नई इमारत में स्कूल के लिए जगह भी दी जा सकती है।"
रमा मैडम ने कुछ नहीं कहा।
और तभी रणवीर ने आख़िरी बात कही। उसने अपनी जेब से एक छोटी चीज़ निकाली — पुरानी घिसी लोहे की चाबी, छल्ले पर पीली पड़ चुकी रस्सी — और उसे हवा में उठाकर सबको दिखाया।
"और हाँ, यह चाबी उस ताले की है जिसमें याद बंद है। जिसे मैंने लिया था। आज से यह मेरे पास नहीं रहेगी। मैं इसे उसी को दूँगा जिसका हक़ है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश, यह तेरी है। पर शर्त है — पहले वही रिश्ता जोड़ो जो तुमने खुद तोड़ा था। भाई वाला।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया।
रणवीर ने चाबी जेब में वापस रखी और मुस्कुराया।
"पहले तुम्हारा नाम मिटेगा, अंकुश। फिर तुम्हारा घर। और फिर यह स्कूल। क्रम में।"
वो मुड़ा और चल दिया।
चंद्रेश सक्सेना ने फ़ाइल दबाई और उसके पीछे चला।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ। गाड़ी चली गई।
आँगन में सिर्फ़ काग़ज़ की वो आवाज़ बची जो हवा में उड़ रही थी।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। पूरी तरह ठंडी।
उसने एक बार भी नहीं कहा कि वो झूठ बोल रहा है।
उसने कुछ नहीं कहा।
और यही सबसे डरावनी बात थी।
रमा मैडम मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा कंधा नहीं छुआ, बस पास आकर खड़ी हो गईं।
"अंकुश।"
"मैडम, वो झूठ बोल रहा है।"
"काग़ज़ झूठ नहीं बोलते।" उन्होंने धीरे से कहा। "पर इंसान बोलते हैं। और मुझे लगता है आज काग़ज़ों की बारी है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें गीली नहीं थीं। उनमें कुछ और था — जैसे कोई बहुत लंबी लड़ाई लड़ चुका हो, और अब अगली सीढ़ी पर पैर रखने की तैयारी कर रहा हो।
उस्ताद बेंच पर आकर बैठ गए। उन्होंने लालटेनें ज़मीन पर रखीं और एक-एक करके उनके काँच पोंछने लगे।
"उस्ताद," मैंने कहा, "कुछ बोलिए।"
वो रुके। "बेटा, मैं पैंतीस साल से इस गली में बैठा हूँ। मैंने यहाँ शादियाँ देखीं, जुलूस देखे, रोना देखा। पर आज पहली बार देखा कि एक आदमी हँसते हुए आया, और पूरी गली का पानी उतर गया।"
उन्होंने एक लालटेन मेरी तरफ़ बढ़ाई। "यह जलती रहे, तब तक कोई हारा नहीं माना जाता।"
तभी टिंकू मेरी कमीज़ पकड़कर खींचने लगा। उसके हाथ में अपना उत्तर पत्रक था — कोना मुड़ा हुआ, पसीने से गीला।
"अंकुश भैया, मैंने सारे सवाल किए। एक भी खाली नहीं छोड़ा।"
"शाबाश।"
"तो कल स्कूल खुलेगा ना?"
मेरा गला सूख गया।
शबनम आपा ने केतली नीचे रख दी। रामलाल बाबा ने गेट की तरफ़ देखा, जैसे कहीं से कोई फिर न आ जाए।
बबलू दूर खड़ा था। फिर धीरे-धीरे आया और मेरे पास रुक गया।
"अंकुश दादा," उसने फुसफुसाया, "सुबह वो जो शोर मचाया ना… मैं डर गया था। गाड़ी देखी और भाग गया। कायर हूँ मैं।"
"नहीं है।" मैंने कहा। "डरना कायरता नहीं है। भागना भी नहीं। असली बात यह है कि तू लौटकर आया।"
वो मुस्कुराया नहीं। बस सिर झुका लिया और मेरे साथ खड़ा हो गया।
मेरे अंदर एक आवाज़ उठ रही थी — बार-बार, ज़िद करके। क्यों घंटी चुप है? सुबह जब झूठ बोला जा रहा था तब वो बोली थी। तो अब क्यों नहीं?
और तभी गेट पर सफ़ेद गाड़ी की ब्रेक चरमराई।
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