The Mysterious Bell – Chapter 1189
और तभी मेरी जेब से आवाज़ आई।
घंटी।
वो गरम थी। बहुत गरम।
उसने धीरे से कहा, "एक दरवाज़ा अंदर से खुला है।"
॥
मैंने तार को उँगलियों में पकड़ा। कटी जगह चमक रही थी, जैसे अभी-अभी किसी ने काटी हो और हाथ धोकर चला गया हो। तार भारी था, मोटा था, और उसका दूसरा सिरा मुड़ा हुआ था — जैसे काटने वाले ने जल्दी में मरोड़ दिया हो।
मैंने टॉर्च नीचे की।
धूल में वो दो निशान अभी भी ताज़े थे। एक लकड़ी के जूते का चौड़ा निशान, और उसके बगल में एक छोटा, नंगे पैर का निशान। छोटा निशान बड़े निशान के साथ चल रहा था, जैसे कोई बच्चा किसी बूढ़े का हाथ पकड़कर चल रहा हो।
घंटी मेरी जेब में गरम थी।
उसने धीरे से फिर कहा, "एक दरवाज़ा अंदर से खुला है।"
मैंने कहा, "कौन सा दरवाज़ा?"
घंटी चुप हो गई।
मैंने तार को जेब में नहीं रखा। मैंने उसे मीटर के बक्से के पीछे, दीवार के साथ सरका दिया। फिर टॉर्च बुझाई और छत के किनारे तक गया।
नीचे गली सो रही थी। पीपल का पेड़ अंधेरे में किसी बड़े आदमी जैसा खड़ा था, और उसकी डालियाँ बिना हिले हिल रही थीं। स्कूल का गेट दिख रहा था, और उसके पास रामलाल बाबा की चारपाई।
चारपाई खाली थी। पर गेट की लोहे की कुंडी धीरे-धीरे हिल रही थी।
हवा से नहीं।
किसी ने उसे अंदर से धक्का दिया था, और फिर छोड़ दिया।
मैं छत से उतरा। सीढ़ी की पहली पायदान पर पैर रखते वक़्त मुझे ऐसा लगा कि स्कूल मेरी तरफ़ देख रहा है और कह रहा है कि तू देर कर रहा है।
घर पहुँचकर मैंने कपड़े बदले। काजल चूल्हे पर चाय रख रही थी।
उसने मेरी तरफ़ देखा और बोली, "चेहरा क्यों ऐसा है?"
मैंने कहा, "कैसा?"
"जैसे तू रात भर किसी का इंतज़ार करता रहा।"
मैं मुस्कुराया। "करता रहा। और वो आया भी। पर अपना चेहरा नहीं दिखाया।"
काजल ने चाय मेरे आगे रखी। "अंकुश, आज स्कूल में सब ठीक होगा न?"
मैंने कहा, "पता नहीं। पर जो होगा, सबके सामने होगा। छुपकर नहीं।"
काजल ने कहा, "माँ ने कहा है कि आज दवा के बाद वो भी चलेंगी।"
मैंने कप नीचे रख दिया। "नहीं।"
"अंकुश, वो ज़िद कर रही हैं।"
मैंने कहा, "माँ को स्कूल के बाहर बेंच पर बैठा देना। अंदर नहीं। और तेरे पास।"
काजल ने सिर हिलाया।
सात बजे मैं स्कूल पहुँचा। रामलाल बाबा गेट पर खड़े थे, हाथ में मोटी चाबी। उन्होंने गेट खोला। कुंडी की आवाज़ आई — वही खाँसी जैसी आवाज़।
उन्होंने कहा, "अंकुश बेटा, छह बजे कोई नहीं आया। मैंने फ़ोन किया था, तुमने उठाया नहीं।"
मैंने कहा, "छत पर था, बाबा।"
रामलाल बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। "कुछ मिला?"
मैंने कहा, "कुछ था। जो अब नहीं है।"
वे समझ गए। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "मेरी बेटी की शादी अगले महीने है, अंकुश। मैं डरता हूँ, पर आज मैं गेट खोलकर यहीं खड़ा रहूँगा।"
मैंने कहा, "बस यही चाहिए, बाबा।"
सात बजकर दस मिनट पर अभिभावक आने लगे।
पहले ज़ुबैदा आई। सानिया उसके पीछे थी, स्कूल का बस्ता कंधे पर, बाल बँधे हुए और चेहरे पर वही चुप्पी जो पिछले कुछ दिनों से थी। ज़ुबैदा ने मुझे देखा और सिर हिलाया। बात नहीं की। पर सिर हिलाया।
फिर गुड्डू के पापा आए। उन्होंने मुझे देखकर नज़र नीची कर ली और सीधे बेंच की तरफ़ चले गए। फिर चिंटू की माँ आई, रफ़ीक़ की अम्मी आई, और उनके पीछे-पीछे गली की और औरतें — कुछ साड़ी में, कुछ दुपट्टे में, सबके चेहरे पर एक ही सवाल।
किशनलाल काका भी आए। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "अंकुश, मैं डरकर चुप रहा था। आज नहीं रहूँगा।"
मैंने कहा, "काका, आप यहाँ बैठिए। आज किसी को कुछ नहीं कहना है।"
आठ बजे उस्ताद अली बक्श आए। उनके हाथ में पाँच लालटेनें थीं, और पीछे दो और आदमी दो और लालटेनें लेकर आ रहे थे। उन्होंने उन्हें स्कूल के गेट के अंदर, दीवार के साथ एक सीध में रख दिया।
फिर वे मेरे पास आए और धीरे से बोले, "अंकुश, सात लालटेनें हो गईं। तेल भरा है। माचिस मेरी जेब में है।"
मैंने कहा, "उस्ताद, आप नीचे रहिए। अगर अंधेरा आया तो लालटेन बाँटना आपका काम है। आपकी आवाज़ गली में सबसे ज़्यादा सुनी जाती है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। "और तू?"
"मैं ऊपर।"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। पर उन्होंने अपनी छोटी तीन हाथ वाली पुरानी याद वाली सुई मेरी हथेली पर रख दी और कहा, "ये मेरी माँ की सुई है। टाँका लगाती है। मेरे साथ रख।"
मैंने उसे जेब में रखा।
आठ बजकर पैंतीस मिनट पर रमा मैडम स्कूल के बरामदे से बाहर आईं। उनके पीछे मीरा थी, कंधे पर कैमरा, हाथ में छोटी कॉपी।
रमा ने सबको देखा और कहा, "सब बाहर बेंच पर बैठिए। अंदर कोई अभिभावक नहीं जाएगा। बच्चे अंदर जाएँगे, आप लोग यहाँ रहेंगे। और हाँ — किसी को कुछ कहना हो तो मुझसे कहिए। बच्चों से नहीं।"
एक औरत ने पूछा, "मैडम, कल किसी ने कहा था कि स्कूल बंद हो जाएगा।"
रमा ने कहा, "कल किसी ने कुछ कहा था। आज मैं कह रही हूँ — स्कूल खुला है और परीक्षा होगी।"
औरत चुप हो गई।
मैं स्कूल के पिछले रास्ते से छत पर चढ़ा। सीढ़ी की पहली पायदान पर मुझे वही लोहे की गंध आई जो कल रात आई थी। मैंने बिना रुके ऊपर जाकर मीटर के पास जाकर देखा।
कटा तार वही था, दीवार के साथ सरका हुआ। मैंने उसे उठाया और दोनों सिरों को पास-पास किया। तार के अंदर ताँबे के महीन धागे थे — बाल की तरह पतले, दस-बारह। मैंने उन्हें उँगलियों से सीधा किया, फिर एक-एक करके आपस में एंठ दिया।
फिर मैंने जेब से टेप निकाला। वो वही टेप था जो मैंने कल रात औज़ारदान से उठाया था। मैंने कटी जगह पर चार लपेटें दीं, और ऊपर एक और, ताकि हवा अंदर न जाए।
फिर मैंने तार का दूसरा सिरा मीटर के बक्से की तरफ़ धकेला और दोनों जोड़ों को दीवार के साथ दबा दिया।
नीचे से उस्ताद की आवाज़ आई — "अंकुश, लालटेनें रख दीं। तेल भरा है।"
मैंने नीचे देखा। उस्ताद दीवार के साथ खड़े थे, हाथ में माचिस की डिब्बी। उनके पीछे किशनलाल काका, भोला भाई, और शबनम आपा की गुमटी की स्टूल पर रखी बड़ी केतली।
तभी पीछे के रास्ते से गुड्डू और चिंटू दौड़ते हुए आए। गुड्डू के हाथ में एक लोहे की छड़ थी और चिंटू के हाथ में एक पुरानी रिम।
गुड्डू ने नीचे से चिल्लाया, "उस्ताद, हम मीटर के पास खड़े रहेंगे!"
मैंने कहा, "गुड्डू, तुम दोनों नीचे क्यों?"
चिंटू ने कहा, "टिंकू भैया ने कहा — मीटर के पास कोई अजनबी आए तो शोर मचा देना।"
मैंने कहा, "और तुमने यह डंडा क्यों उठाया?"
गुड्डू ने कहा, "ये डंडा नहीं है, अंकुश भैया। ये हमारी बल्लेबाज़ी है।"
मैं हँसा। सुबह की पहली हँसी।
नौ बजने में पाँच मिनट बाकी थे। बच्चे खुले आँगन में दो कतारों में बैठने लगे। रमा मैडम ने आठवीं के बच्चों को स्कूल के पीछे वाले कमरे में मास्टर इरफ़ान के साथ बैठा दिया। मीरा कैमरा लेकर बरामदे में खड़ी थी। मैं छत पर था, बिलकुल मीटर के पास, और मेरी जेब में घंटी।
नौ बजे।
बिजली नहीं गई।
एक मिनट हुआ। दो मिनट हुए। पंखा चलता रहा, बल्ब जलता रहा, और बच्चों की कलमें काग़ज़ पर चलने लगीं।
फिर मैंने नीचे पीछे के रास्ते की तरफ़ देखा।
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