The Mysterious Bell – Chapter 1188
मैंने कहा, "मैडम, अगर कुछ हुआ तो—"
"अगर कुछ हुआ, तो मेरा नाम पहले आएगा। तुम्हारा बाद में।"
मैंने कहा, "यह ठीक नहीं है।"
"यह ठीक है। क्योंकि मैं मास्टर हूँ। और जब मैं पाँच साल पहले चुप हुई थी, तब मेरे सामने बच्चे थे। मैं उनके सामने फिर चुप नहीं रहूँगी।"
मैं कुछ नहीं बोला।
फिर रमा मैडम ने एक काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"यह क्या है?"
"परीक्षा की सूची। कल की।"
मैंने उसे देखा। उस पर बच्चों के नाम थे। और सबसे ऊपर एक अलग लाइन में — अंकुश यादव। जोड़ने वाला।
मैंने कहा, "इसे यहाँ रखेंगे?"
रमा ने कहा, "नहीं। कल सुबह नौ बजे तक इसे मेरे पास रखा जाएगा। और जब परीक्षा शुरू होगी, तब मैं इसे सबके सामने पढ़ूँगी।"
मैंने कहा, "और मेरा नाम?"
"तेरा नाम वहीं रहेगा। जहाँ उन्होंने लिखा है।"
"मैडम—"
"अंकुश, तू जोड़ने वाला है। यह बात सही नहीं, पर इंकार भी नहीं। कल जब सब सुनेंगे, तो उन्हें लगेगा कि यह इल्ज़ाम है। लेकिन जब तू बोलेगा, तब उन्हें पता चलेगा कि यह काग़ज़ कितना कमज़ोर है।"
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।
फिर मैंने कहा, "मैडम, एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"कल मैं अपनी तरफ़ से कुछ नहीं लिखूँगा। कोई काग़ज़ नहीं। कोई माफ़ीनामा नहीं। मैं सिर्फ़ खड़ा रहूँगा।"
रमा ने थोड़ी देर मुझे देखा।
फिर बोलीं, "यही सबसे अच्छी बात है।"
रात के करीब दस बजे मैं स्कूल से निकला। गेट पर रामलाल बाबा ने कुंडी खोली और मुझे देखकर धीरे से कहा, "अंकुश, एक बात।"
"हाँ बाबा।"
"कल सुबह मैं गेट सात बजे खोलूँगा। छह पर कोई आए, तो मैं नहीं खोलूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो छह बजे आता है, वो अभिभावक नहीं होता। वो खबर लाने वाला होता है।"
मैंने सिर हिलाया।
बाबा ने कहा, "अंकुश, कल सुबह मेरी बेटी की शादी की तारीख़ तय है। मैं उसे बताने वाला हूँ।"
मैंने पूछा, "शादी कब है?"
बाबा ने कहा, "अगले महीने। और मुझे डर है कि वो तारीख़ इसी स्कूल के साथ जुड़ी है। अगर कल कुछ हुआ और स्कूल बंद हुआ, तो उन्हें लगेगा कि यह अशुभ है।"
मैंने कहा, "बाबा, तो आपकी बेटी की शादी रुक जाएगी?"
बाबा ने कहा, "ना। रुकेगी नहीं। पर तारीख़ बदलेगी। और मेरी बेटी ने तारीख़ के लिए एक साल इंतज़ार किया है।"
मैंने कुछ देर सोचा।
फिर मैंने कहा, "बाबा, कल सुबह सात बजे से पहले कोई गेट पर आए, तो आप मुझे फोन कर दें।"
बाबा ने मोबाइल जेब से निकाला। एक पुराना बटन वाला फोन। उसकी स्क्रीन पर चटख खरोंच थी।
मैंने नंबर डाल दिया।
बाबा ने कहा, "अंकुश, मैं किसी को अंदर नहीं आने दूँगा। पर एक बात — अगर वो ज़बरदस्ती करें, तो?"
मैंने कहा, "तो आप फोन कर दें। बस। मैं आ जाऊँगा।"
बाबा ने सिर हिलाया। फिर बोले, "तू भी अकेले मत आइयो।"
"क्यों?"
"क्योंकि अंधेरे में एक आदमी सिर्फ़ एक आदमी होता है। दो आदमी सवाल होते हैं।"
मैंने कहा, "ठीक है।"
घर पहुँचकर मैंने शटर आधा ही उठाया। काजल दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठी थी और उसके सामने टिफ़िन खुला था। खाना वैसा ही था जैसा माँ ने भेजा था।
मैंने पूछा, "तूने खाया?"
काजल ने कहा, "तेरा इंतज़ार कर रही थी।"
मैंने हाथ धोए और उसके सामने बैठ गया।
"माँ कैसी हैं?"
काजल ने कहा, "दवा ले ली। सो गई हैं। पर पापा जाग रहे हैं।"
"कहाँ?"
"ऊपर छत पर।"
मैं खाना खाकर ऊपर गया। छत पर पापा ईंट पर बैठे थे। उनके हाथ में पुरानी रिंच थी और वो उसे घुमा रहे थे।
मैं पास बैठ गया।
पापा ने कहा, "कल?"
मैंने कहा, "हाँ।"
"बिजली?"
"हाँ।"
पापा ने रिंच घुमाना बंद कर दिया।
"अंकुश, कल मैं भी आऊँगा।"
मैंने कहा, "पापा, आप की ज़रूरत नहीं है।"
"मैंने तुझसे पूछा नहीं। मैंने कहा।"
मैं कुछ देर चुप रहा।
फिर मैंने कहा, "अगर आप आएँगे, तो आप क्या करेंगे?"
पापा ने कहा, "मैं सामने खड़ा रहूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब मैं चुप था, तब मेरा बेटा अकेला लड़ रहा था। अब मैं चुप नहीं रहूँगा।"
मैंने पापा का हाथ पकड़ा। उनकी हथेली ठंडी थी और उसमें रिंच की चिकनी चमक लगी थी।
मैंने कहा, "ठीक है।"
फिर मैंने कहा, "पापा, एक बात।"
"कह।"
"आपको घंटी के बारे में क्या पता है? असली बात।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले, "घंटी तेरे दादा की है। और उसकी असली बात मैं नहीं जानता।"
मैंने कहा, "पर आप जानते हैं कि वो क्या करती है।"
पापा ने रिंच ज़मीन पर रखी।
"अंकुश, मैं इतना जानता हूँ कि घंटी तब बोलती है, जब गली में कोई सच बोलता है। और तब चुप हो जाती है, जब सच छुपाया जाता है।"
"बस?"
पापा ने कहा, "और एक बात। घंटी कभी किसी को बचाने का वादा नहीं करती। वो सिर्फ़ रास्ता दिखाती है।"
मैंने कहा, "और रास्ते पर चलना?"
पापा ने कहा, "वो हमारा काम है।"
मैं उठा।
पापा ने कहा, "अंकुश, सुन।"
"हाँ।"
"कल सुबह अगर अंधेरा हुआ, तो सबसे पहले मेरी आवाज़ सुनना। मैं सबसे ऊँची आवाज़ में तेरा नाम लूँगा।"
मैंने कहा, "क्यों?"
"क्योंकि जब कोई अपना नाम सुनता है, तो डर कम होता है।"
मैं हँसा। पहली बार उस दिन में।
फिर मैंने कहा, "पापा, आपका नाम भी ऊँचा है।"
पापा ने कहा, "मेरा नाम तो आजकल कोई नहीं लेता।"
मैंने कहा, "मैं लेता हूँ।"
रात करीब सवा बारह बजे मैं अपने कमरे में गया। मैंने घंटी जेब से निकाली और तकिये के नीचे रख दी। फिर मैंने हिसाब कॉपी खोली और उस पर आज की तारीख़ लिखी।
नीचे मैंने लिखा — कल सुबह:
मीटर के तार।
सीढ़ी हटाना।
छत पर लालटेन।
आठवीं का कमरा।
पापा का नाम।
फिर मैंने कुछ देर सोचा और लिखा — सबसे पहले वो आदमी, जो सबसे ज़्यादा डरता है।
काजल दरवाज़े पर आई और बोली, "अंकुश, सो जा।"
मैंने कहा, "सो रहा हूँ।"
"तू सो नहीं रहा। तू लिख रहा है।"
मैंने कॉपी बंद की।
काजल ने कहा, "अंकुश, एक बात।"
"क्या?"
"कल अगर तू स्कूल में अकेला गया और मैंने सुना कि तेरे साथ कुछ हुआ, तो मैं…"
मैंने कहा, "तो तू क्या करेगी?"
काजल ने कहा, "मैं तेरे पीछे आऊँगी। और मैं तुझे माफ़ नहीं करूँगी।"
मैं हँसा।
"ठीक है। माफ़ी की बात बाद में। पहले कल।"
काजल ने सिर हिलाया और चली गई।
मैंने बत्ती बुझाई।
पर मुझे नींद नहीं आई।
रात करीब तीन बजे मैं उठा। मैंने टॉर्च जेब में डाली, घंटी टकिये के नीचे से निकाली और दुकान का पिछला दरवाज़ा खोला। बाहर गली सूनी थी, हवा में ठंडक थी और पीपल के पत्ते धीरे-धीरे हिल रहे थे।
मैं स्कूल के पिछले रास्ते से गया। रामलाल बाबा की चारपाई खाली थी। मैं दीवार के सहारे चढ़ा और छत के उस हिस्से में पहुँचा जहाँ मीटर था।
टॉर्च जलाई।
मीटर का लोहे का बक्सा वहीं था। दो तार नीचे आ रहे थे। हैंडल वैसा ही था जैसा टिंकू ने बताया था।
पर हैंडल के नीचे, ज़मीन पर, मुझे कुछ दिखा।
मैंने टॉर्च नीचे की।
धूल में एक कटा हुआ तार पड़ा था। मोटा तार। उसका एक सिरा साफ़ कटा था और दूसरा सिरा मुड़ा हुआ। वो ताज़ा कटा था — कटी जगह चमक रही थी।
मैं झुका।
तार के पास धूल में एक पैर का निशान था। लकड़ी के जूते जैसा चौड़ा निशान। और उसके बगल में एक और, छोटा।
फिर मैंने उस तार को उठाया। वो भारी था।
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