The Mysterious Bell – Chapter 119
"अच्छा, अब जाओ," मैंने कहा। "सुबह सात बजे आना। और हाँ, याद रखना — पहले देखो, फिर लिखो। जो दिखे वही लिखो। जो न दिखे, उसके आगे खाली जगह छोड़ दो। खाली जगह भी एक जवाब होता है।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, मुँह में टॉफ़ी घुमाते हुए, "कल सुबह मैं तुम्हारे लिए एक चीज़ लाऊँगा।"
"क्या?"
"पता नहीं। पर लाऊँगा।"
मैं हँस पड़ा। यही तो फ़र्क़ है बच्चों और बड़ों में। बड़े कहते हैं, "मैं कुछ लाऊँगा" तो पहले दस बार सोचते हैं कि लाएँगे या नहीं। बच्चे कहते हैं और अगली सुबह चीज़ हाथ में होती है, चाहे वो एक टूटा हुआ पत्थर ही क्यों न हो।
वो चले गए। मैंने दुकान का दरवाज़ा बंद किया, पीछे वाले कमरे में गया और चारपाई पर गिर पड़ा। शरीर थका हुआ था, पर दिमाग़ में एक ही आवाज़ घूम रही थी — उस्ताद की वो बात कि घर का तीसरा सच भीतर का है, बिना लड़े नहीं खुलेगा।
मैंने जेब से घंटी निकाली। चाँद की रोशनी में पीतल चमक रहा था। मैंने उसे हथेली पर रखा और देर तक देखता रहा।
"सो जा," घंटी ने धीमे से कहा। "कल भारी दिन है।"
"कितना भारी?"
"जितना तू सोच नहीं सकता।"
"यही तो तेरी आदत है," मैंने कहा। "कभी सीधा जवाब नहीं देती।"
"सीधा जवाब सुनने की हिम्मत रखता है तू?"
"रखता हूँ।"
"तो सुन। कल पीपल के नीचे दो आदमी बैठे होंगे। दोनों ने पचास साल से एक-दूसरे की शक्ल तक नहीं देखी। उनके बीच जो टूटा है, वो तेरे उस्ताद के झगड़े से भी पुराना है। और उसे जोड़ने के लिए तुझे वो बात कहनी पड़ेगी जो तूने आज तक किसी को नहीं कही।"
"कौन सी बात?"
पर घंटी चुप हो गई। ठंडी हो गई, जैसे कोई पत्थर।
मैंने करवट बदली। नींद नहीं आई।
सुबह पाँच बजे माँ की चूल्हे की आवाज़ आई। मैं उठा, मुँह धोया, और दुकान खोलने लगा। सात बजे से पहले चारों बच्चे आ गए — सानिया के हाथ में लाल कवर कॉपी, गुड्डू के हाथ में एक छोटी पेंसिल, रफ़ीक़ के हाथ में टूटा हुआ प्लास्टिक का स्केल, और चिंटू के हाथ में… एक पत्थर।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"पत्थर," चिंटू ने गर्व से कहा।
"देख तो रहा हूँ। पर किसलिए?"
"तुमने कहा था न, खाली जगह भी जवाब होती है। तो मैंने सोचा, अगर कल कुछ न दिखे, तो ये पत्थर रख देंगे उस जगह।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तू बड़ा होकर या तो बहुत बड़ा आदमी बनेगा, या बहुत बड़ा सिरदर्द।"
"दोनों," उसने कहा, और टॉफ़ी चबाने लगा।
मैंने उन्हें काग़ज़ दिए। चार काग़ज़, चार हाथ। ऊपर तारीख़, वक़्त, गाड़ी का रंग, कहाँ रुकी — सब खाने बनाए थे।
"अब सुनो," मैंने कहा। "आज सिर्फ़ एक काम है। पीपल के नीचे चबूतरी पर दो बुज़ुर्ग बैठते हैं। एक कोने में बाबा इक़बाल, दूसरे कोने में लाला बद्रीनाथ। दोनों के बीच कोई नहीं बैठता। कोई एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखता। मुझे जानना है कि क्यों।"
"पता है मुझे," सानिया ने कहा, और मैंने देखा कि उसकी आँखों में वो चमक फिर आ गई थी।
"कैसे?"
"शबनम आपा ने बताया था। पर पूरा नहीं बताया। बोलीं कि अभी तुम छोटी हो, बाद में बताऊँगी।"
"तो जाओ," मैंने कहा। "शबनम आपा के पास जाओ। चाय पीने के बहाने बैठो। और जो वो बताएँ, ध्यान से सुनो।"
वो चले गए। मैं दुकान के बाहर खड़ा रहा, हाथ में पेचकस। आसमान साफ़ था, पीपल की पत्तियाँ हल्की हवा में हिल रही थीं। मैंने दूर से देखा — चबूतरी पर दो सफ़ेद आकृतियाँ बैठी थीं, एक-दूसरे से दूर, जैसे एक ही चबूतरी पर दो अलग दुनिया।
थोड़ी देर बाद बच्चे लौटे। सानिया आगे थी, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें कोई बड़ा राज़ मिल जाए।
"उस्ताद," उसने कहा, "शबनम आपा ने बताया — दोनों के बेटे थे। साथ पढ़ते थे। एक साइकिल पर स्कूल जाते थे।"
"फिर?"
"तो एक दिन साइकिल पलट गई। दोनों गिरे। लाला बद्रीनाथ के बेटे के सिर पर चोट लगी। बाबा इक़बाल के बेटे का हाथ टूटा। और दोनों बापों ने… एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा दिया।"
"क्या इल्ज़ाम?"
"बाबा इक़बाल ने कहा कि लाला बद्रीनाथ का बेटा ही साइकिल चला रहा था। उसने लापरवाही की, इसलिए मेरे बेटे का हाथ टूटा। और लाला बद्रीनाथ ने कहा कि बाबा इक़बाल का बेटा चला रहा था। उसने साइकिल मोड़ने में ग़लती की।"
"और फिर?"
"और फिर दोनों ने बात करनी बंद कर दी। बस। पचास साल से।"
मैंने गहरी साँस ली। इतनी सी बात। इतनी सी बात पर पचास साल।
"एक बात और," गुड्डू ने कहा, जो अब तक चुप था। "शबनम आपा ने कहा कि लाला बद्रीनाथ का बेटा, वो अब दिल्ली में रहता है। और वो दो साल पहले गली में आया था। किसी से मिलने।"
"किससे?"
"शबनम आपा को नहीं पता।"
मैंने घंटी को जेब में टटोला। वो ठंडी थी।
"चलो," मैंने कहा। "तुम चारों गुमटी पर रुको। और आज जो भी हो, मेरे पास मत आना। जब मैं बुलाऊँ, तब आना।"
वो समझ गए। बच्चों को एक बात समझानी नहीं पड़ती — जब बड़ा कहता है "रुको", तो रुकना होता है।
मैं पीपल की तरफ़ चला। धूप अब तेज़ हो रही थी। चबूतरी पर बाबा इक़बाल बैठे थे — सफ़ेद दाढ़ी, सफ़ेद टोपी, हाथ में तस्बीह, आँखें बंद। दूसरे कोने पर लाला बद्रीनाथ — दुबले, पीली धोती, गमछा कंधे पर, लाठी के सहारे, आँखें खुली पर दूर कहीं।
मैं बीच में जाकर खड़ा हो गया।
"बाबा इक़बाल," मैंने कहा। "लाला बद्रीनाथ। मैं अंकुश हूँ। यहाँ गली में दुकान है मेरी।"
बाबा इक़बाल ने आँखें खोलीं। देखा। फिर बंद कर लीं। "जानता हूँ तुझे," उन्होंने धीमे से कहा। "तू वही है जो इन बुज़ुर्गों को जोड़ता फिरता है।"
"काम यही है मेरा।"
"काम?" लाला बद्रीनाथ ने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "यह काम नहीं है, बेटा। यह तमाशा है।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "पर आप दोनों को देखकर लगता है कि तमाशा नहीं, सन्नाटा है। और सन्नाटा तमाशे से भारी होता है।"
दोनों चुप हो गए।
"मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ," मैंने कहा। "आप दोनों के बेटे थे। वो अब कहाँ हैं?"
बाबा इक़बाल ने तस्बीह पर उँगली रोक दी। "मेरा बेटा भोपाल में है। दूसरी गली में रहता है। पर… आता नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने उसे मना किया था। मैंने कहा था — उस घर मत जाना, उस आदमी से मत बोलना।"
"और आपका बेटा?" मैंने लाला बद्रीनाथ की तरफ़ देखा।
"दिल्ली," उन्होंने कहा, और आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ उठा रहा हो। "दो साल पहले आया था। फिर चला गया।"
"आपने उससे बात की थी?"
"क्या बात करता? वो आया, मुझे देखा, चला गया। दस मिनट भी नहीं बैठा।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। "लाला जी, आपके बेटे ने शबनम आपा से कुछ पूछा था। वो आज सुबह मेरे पास आया। और मैंने सोचा कि आपको बताना चाहिए।"
लाला बद्रीनाथ ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर अंदर कुछ तेज़ था।
"क्या पूछा था?"
"उन्होंने पूछा था कि बाबा इक़बाल अभी भी उसी चबूतरी पर बैठते हैं? और क्या वो अभी भी गुस्से में हैं?"
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। बाबा इक़बाल ने आँखें खोल लीं। उनकी तस्बीह हाथ से छूटकर पत्थर पर गिरी।
"उसने मेरा नाम लिया?" उन्होंने पूछा, आवाज़ काँप रही थी।
"हाँ," मैंने कहा। "और एक बात और। उसने शबनम आपा से यह भी कहा था कि वो उनसे मिलना चाहता है। पर डरता है।"
"किससे डरता है?"
"शायद इससे कि आप अभी भी उसे ग़लत मानते हैं।"
लाला बद्रीनाथ ने लाठी उठाई और फिर रख दी। उनके हाथ काँप रहे थे।
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