The Mysterious Bell1185 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1185

7 min read November 5, 2026

बबलू ने देखा। उसका हाथ सच में काँप रहा था।

उसने हाथ जल्दी से जेब में डाल दिया और कहा, "कुछ नहीं साहब। पान ज़्यादा खा लिया।"

रणवीर ने कहा, "अच्छा।"

फिर वो उठा और खिड़की के पास गया। पर्दा हटाया। बाहर नई बस्ती थी, साफ़ सड़कें, बड़ी गाड़ियाँ, और दूर कहीं पुराने बिजलीघर की तरफ़ जाती हुई सूनी गली।

रणवीर ने पीठ करके कहा, "बबलू, एक और टूटन चाहिए।"

बबलू ने कहा, "क्या?"

"कल के बाद एक और टूटन। स्कूल में जो होगा, उससे मोहल्ले में जो फूटेगा, वो मुझे चाहिए। बाकी तुम समझ जाओ।"

बबलू ने कुछ नहीं कहा।

वो उठा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुका। उसने पीछे मुड़कर देखा — रणवीर अब भी खिड़की के पास खड़ा था, पर्दा हाथ में।

और बबलू ने देखा कि पर्दे के नीचे, रणवीर की परछाईं में, एक और साया है।

हल्का। धुआँ जैसा। जो किसी इंसान का नहीं था।

बबलू का मुँह सूख गया। उसने जल्दी से दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया।

सीढ़ियाँ उतरते वक़्त उसके पैर एक बार फिसले, फिर उसने रेलिंग पकड़ी और अपने आप से बड़बड़ाया, "पागल हो गया है। बस काग़ज़ और पैसा। काग़ज़ और पैसा।"

पर उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।

शाम छह बजे।

स्कूल के पीछे वाली गली सूनी थी। दिन की गर्मी उतर रही थी और दीवारों से वो अजीब सी खुशबू आ रही थी जो पुराने स्कूलों से आती है — चूना, धूल और किसी बच्चे का छूटा हुआ खाना।

टिंकू अपना बैग कंधे पर लटकाए चुपचाप चल रहा था। राँची से लौटा था आज दोपहर। स्टेशन से सीधा स्कूल गया था, सूची देखने। सूची फटी देखी, गेट पर लगी लाल स्याही वाली लाइन पढ़ी और वो संदूक की तरह चुप हो गया था।

वो पीछे के गेट की तरफ़ जा रहा था, जहाँ से वो दुकान के पीछे निकल सके।

और तभी एक हाथ ने उसका कंधा पकड़ लिया।

टिंकू चीखता-सा रह गया, पर आवाज़ नहीं निकली।

बबलू पांडे उसके सामने खड़ा था। पान चबा रहा था। मोटा शरीर दीवार से टिका हुआ था और आँखें टिंकू पर जमी थीं।

टिंकू ने कहा, "भैया, मैं… मैं कुछ नहीं…"

बबलू ने उसका कंधा छोड़ा और कहा, "तू राँची से लौटा है।"

"हाँ भैया, परीक्षा है कल।"

"परीक्षा होगी?"

"मैडम ने कहा है।"

बबलू ने उसकी तरफ़ झुककर देखा। उसकी आँखों में वो हिसाब था जो इंसान पैसा गिनते वक़्त करता है।

उसने कहा, "टिंकू, तू समझदार है। तेरे पापा नहीं हैं, तेरी माँ अकेली है, तेरे घर में पैसा नहीं है। ऐसे बच्चे बड़ी जल्दी बड़े हो जाते हैं।"

टिंकू ने नीचे देखा।

बबलू ने कहा, "मैं तुझे कुछ नहीं करने को कह रहा। बस कल सुबह स्कूल जाना और सबके साथ रहना। बस।"

टिंकू ने सिर उठाया।

"क्या होगा कल?"

बबलू ने इधर-उधर देखा। गली सूनी थी। उसने एक कदम और करीब आकर धीरे से कहा, "सुबह नौ बजे बिजली जाएगी।"

टिंकू ने कहा, "बिजली?"

"हाँ। पूरी। अंधेरा। और उस अंधेरे में जो होगा, उसका इल्ज़ाम तेरे उस्ताद पर जाएगा।"

टिंकू सन्न रह गया।

"क्यों भैया? ये क्या बात है?"

बबलू ने उसके कंधे पर हाथ रखा। वो हाथ भारी था, गर्म था और उसमें सोने की चेन की हल्की ठंडक थी।

उसने कहा, "टिंकू, अब बात बढ़ाने का वक़्त नहीं है। साहब तय कर चुके हैं। और जो साहब तय करते हैं, वो होता है।"

टिंकू की आँखें भर आईं।

बबलू ने कहा, "मैं तुझे पैसे नहीं दे रहा। मैं तुझे डरा भी नहीं रहा। मैं बस इतना कह रहा हूँ कि कल सुबह स्कूल में कुछ होगा, उसका नाम अंकुश यादव होगा। बाकी तेरा काम नहीं।"

टिंकू ने कहा, "भैया, मैं उस्ताद को बता दूँगा।"

बबलू हँसा।

"बता दे। पर याद रखना — तू बताएगा तो कल कुछ और ज़्यादा होगा। और ज़्यादा का इल्ज़ाम भी उसी पर जाएगा। सोच ले।"

वो पलट गया और चलने लगा।

फिर रुका, बिना मुड़े, और उसने कहा, "और टिंकू, तेरी माँ राँची वाले भाई के पास जाने की बात कर रही है ना? अभी कुछ दिन रुक जाओ। स्कूल खत्म होने दो।"

टिंकू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

बबलू गली के मोड़ पर मुड़ गया और ग़ायब हो गया।

टिंकू वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ में बैग था, बैग का पट्टा हाथ में लिपटा हुआ था और उसकी आँखों से पानी बह रहा था।

फिर उसने कुछ नहीं सोचा।

वो भागा।

स्कूल की पिछली गली से, सूखी नाली पर पड़े पत्थर के पुल से, उस्ताद की दुकान के सामने से, और सीधा मेरी दुकान की तरफ़।

मैं उस वक़्त दुकान के अंदर था।

शटर आधा उठा था। मैंने एक पुरानी साइकिल घसीटकर अंदर रखी थी और उसका पिछला पहिया खोल रहा था। मेरे हाथ में ग्रीस लगी थी। औज़ारों का ट्रंक खुला था। काजल दुकान के पीछे कमरे में थी और हल्की आवाज़ में कुछ गुनगुना रही थी।

बाहर से शटर के नीचे एक झटका लगा और फिर मैंने पैरों की आवाज़ सुनी — तेज़, बेकाबू, फिसलती हुई।

मैंने हाथ पोंछा और दरवाज़े की तरफ़ देखा।

टिंकू नीचे फिसल गया, फिर घुटनों पर उठा और दुकान की मेज़ का कोना पकड़ लिया। उसका चेहरा लाल था, बाल माथे से चिपके हुए थे, और साँस ऐसे चल रही थी जैसे दौड़ता हुआ आया हो।

मैंने कहा, "टिंकू, रुक। पहले पानी।"

मैंने पास में रखा स्टील का गिलास उठाया और उसमें पानी डालकर उसे दिया। उसने गिलास दोनों हाथों से पकड़ा और एक साँस में आधा पी गया। बाकी उसके होंठों से टपककर उसकी कमीज़ पर गिर गया।

मैंने कहा, "अब सीधी साँस ले और धीरे बोल।"

टिंकू ने गिलास मेज़ पर रखा। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।

और तभी मेरी जेब से घंटी बजी।

एक हल्की, साफ़ आवाज़। गरम नहीं, ठंडी भी नहीं। ऐसे जैसे किसी ने ध्यान से सिर्फ़ मेरा नाम लिया हो।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में वो डर था जो बच्चों की आँखों में तब आता है जब उन्हें पहली बार पता चलता है कि बड़े भी डरते हैं और उन्हें छुपाना पड़ता है।

मैंने कहा, "टिंकू, क्या हुआ?"

वो बोला, "उस्ताद…"

"हाँ।"

"आज दोपहर मैं राँची से लौटा। सीधा स्कूल गया। सूची देखी। लोग बता रहे थे कि ऊपर तुम्हारा नाम लिखा है और बच्चों के नाम कट गए हैं।"

मैंने कहा, "पता है। मैं वहाँ था।"

टिंकू ने होठ भींचे। फिर बोला, "शाम को स्कूल के पीछे बबलू भैया ने मुझे पकड़ा।"

मेरे हाथ में जो पहिया था, वो रुक गया।

"क्या कहा उसने?"

टिंकू की आँखें भर आईं।

वो बोला, "उस्ताद, बबलू ने कहा कि कल सुबह नौ बजे स्कूल की बिजली जाएगी। पूरी बिजली। और…"

"और?"

"और उस अंधेरे में जो गड़बड़ होगी, उसका इल्ज़ाम तुम पर लगेगा।"

दुकान के अंदर का बल्ब गुनगुना रहा था। पीछे से काजल की गुनगुनाहट बंद हो गई थी। मुझे लगा जैसे पूरी गली ने साँस रोक ली हो।

मैंने ग्रीस वाले हाथ को पोंछा और पहिया उसकी जगह पर टिका दिया।

फिर मैंने टिंकू से पूछा, "उसने और कुछ कहा?"

टिंकू ने नीचे देखा।

"कुछ नहीं।"

"टिंकू।"

"उस्ताद, उसने कहा कि मैं तुम्हें बता दूँगा तो कल कुछ और ज़्यादा होगा। और ज़्यादा का इल्ज़ाम भी तुम पर ही जाएगा।"

मैंने कुछ देर उसकी तरफ़ देखा।

फिर मैं दुकान के बाहर आया। शाम का आसमान बैंगनी हो रहा था और पीपल के पत्ते हवा में हिल रहे थे। गली सूनी थी, बस एक-दो साइकिलें दूर दीवार से टिकी थीं।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

वो गरम थी।

और जब मैंने उसे हथेली पर रखा, तो उसने धीरे से कहा, "अंधेरा काग़ज़ से पहले आएगा।"

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