The Mysterious Bell – Chapter 1184
बच्चे आगे-आगे भाग रहे थे, जैसे उन्हें कोई खज़ाना मिल गया हो। पर वो खज़ाना नहीं था। वो एक डर था, जो काग़ज़ पर चिपका हुआ था।
स्कूल पहुँचे तो गेट पर ही भीड़ लगी थी।
माताएँ, कुछ बाप, दो-चार अभिभावक जो रोज़ सुबह बच्चों को छोड़ने आते हैं। सब नोटिस बोर्ड के सामने खड़े थे और सबकी आँखों में वही सवाल था — अब क्या होगा।
बोर्ड पर परीक्षा की सूची लगी थी। नीचे के आधे हिस्से में बच्चों के नाम थे, ऊपर की तरफ़ लंबी सफ़ेद जगह थी और उस पर किसी ने मोटे काले अक्षरों में लिख दिया था — अंकुश यादव।
उसके नीचे छोटे अक्षरों में एक और लाइन थी — और नीचे सब बच्चों के नाम काट दिए गए हैं। एक ही नाम बचा है — जोड़ने वाला।
मैंने वो लाइन पढ़ी और मेरे भीतर कुछ ठंडा सा उतर गया।
सानिया की अम्मी, ज़ुबैदा, दूर खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। पर उनका हाथ सानिया के कंधे पर था और उँगलियाँ कसी हुई थीं।
गुड्डू के पापा ने मुझे देखा और तुरंत नज़र फेर ली।
किशनलाल काका बोर्ड के पास खड़े थे। उनकी आँखें कमज़ोर हैं, इसलिए वो और पास गए और लगभग काग़ज़ से नाक टकरा गई।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, "ये स्याही ताज़ी है। अभी सूखी भी नहीं है।"
मीरा ने तुरंत अपना कैमरा निकाला।
और ठीक उसी वक़्त स्कूल के मुख्य दरवाज़े से रमा मैडम बाहर आईं।
उनके हाथ में वही पीली जिल्द वाला रजिस्टर था जो उन्होंने कल मीरा को दिया था। उनके पीछे उनकी बेटी थी — पतली, चुप, आँखें झुकी हुई। वो माँ के पीछे ऐसे खड़ी थी जैसे कोई दीवार हो।
रमा मैडम सीधी बोर्ड के पास आईं।
भीड़ में कुछ लोग पीछे हट गए। कुछ ने हाथ जोड़ लिए।
रमा मैडम ने बोर्ड पर लिखा नाम पढ़ा। फिर उन्होंने काग़ज़ के कटे किनारों को उँगली से छुआ। फिर वो मुड़ीं और सबके सामने खड़ी हो गईं।
उन्होंने कहा, "परीक्षा होगी।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
"कल सुबह नौ बजे," रमा मैडम ने कहा, "परीक्षा अपने वक़्त पर होगी। सूची फटी है तो नई लगेगी। नाम काटे गए हैं तो फिर से लिखे जाएँगे। बच्चों को घर में कोई डरेगा नहीं।"
एक औरत ने आगे से कहा, "मैडम, काग़ज़ पर तो लिखा है कि — जोड़ने वाला।"
रमा मैडम ने उस औरत की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने बहुत धीमे, पर साफ़ आवाज़ में कहा, "हाँ। लिखा है। और मैंने पढ़ लिया है। मगर एक बात सुन लीजिए — कोई काग़ज़ पर कुछ भी लिख दे, उससे बच्चे का पेपर नहीं रुकता। बच्चों के सपने नहीं रुकते। और अगर कोई यह समझता है कि डर से स्कूल बंद हो जाएगा, तो वो ग़लत समझता है।"
उनकी आवाज़ में वो कड़कपन था जो मीरा के डर में भी था, पर इनमें वो कड़कपन थमा हुआ था, बहता हुआ नहीं।
शबनम आपा ने धीरे से मेरे कान में कहा, "ये औरत अंदर से रो रही है। पर बाहर से शेर है।"
मैंने कहा, "और यही ज़रूरी है।"
रमा मैडम मेरी तरफ़ मुड़ीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तुमने यह नाम यहाँ लिखा है?"
पूरी भीड़ ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने कहा, "नहीं, मैडम। मेरी लिखाई ऐसी नहीं है। और आप जानती हैं, मैं झूठ बोल सकता हूँ — पर मरम्मत के वक़्त नहीं। फ़िलहाल मैं झूठ नहीं बोल रहा।"
रमा मैडम ने मुझे कुछ पल देखा, फिर कहा, "मुझे पता है।"
मीरा ने कहा, "मैडम, अगर परीक्षा होगी तो बच्चों को आना पड़ेगा। और आज सुबह से गली में यही चल रहा है कि अंकुश की दुकान के पास से गुज़रने वाले बच्चे का नाम सूची से कट जाएगा। आप बताइए — बच्चे आएँगे कैसे?"
रमा मैडम ने बहुत सीधा जवाब दिया।
"बच्चे आएँगे इसलिए कि हम उनके माँ-बाप को खुद बुलाकर लाएँगे। कल सुबह सात बजे सभी अभिभावक यहाँ आएँ। मगर उन्हें कोई अंकुश नहीं, मैं बताऊँगी।"
फिर उन्होंने ज़ुबैदा की तरफ़ देखा और कहा, "ज़ुबैदा, सानिया कल आएगी ना?"
ज़ुबैदा का हाथ सानिया के कंधे पर और कस गया।
सबने साँस रोक ली।
ज़ुबैदा ने फर्श की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपना सिर बहुत हल्का सा हिलाया।
रमा मैडम ने कहा, "मुँह से कहो।"
ज़ुबैदा ने होंठ खोले, पर आवाज़ नहीं निकली। सानिया ने माँ की तरफ़ देखा, फिर अपनी माँ के हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
और धीरे से ज़ुबैदा ने कहा, "आएगी।"
मेरे भीतर कुछ पिघला।
पर कुछ और भी कस गया — ये सब इतना आसान नहीं था। कोई इंसान जो डर के पीछे इतने दिन चुप रहा, वो एक सवाल में खुल नहीं गया। वो सिर्फ़ आधा दरवाज़ा खोला है।
उस्ताद ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, "अंदर जाकर देखो।"
"क्या?"
"अंदर। स्कूल के अंदर। जहाँ परीक्षा होनी है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे आँखें पत्थर जैसी स्थिर थीं।
मैंने मीरा और रमा मैडम के साथ अंदर जाने के लिए पैर बढ़ाया, पर रमा मैडम ने हाथ से रोका और कहा, "एक बात और।"
"हाँ मैडम?"
"कल के दिन किसी भी बच्चे के पास कोई काग़ज़, ताला और यहाँ तक कि कोई पेन भी नहीं होगा जो बाहर से आया हो। सिर्फ़ वही जो मैं खुद दूँगी।"
मैंने कहा, "आपको किसी का शक है?"
रमा मैडम ने कहा, "मुझे शक नहीं, तजुर्बा है। जिस स्कूल की छत तोड़कर एक काग़ज़ पर हस्ताक्षर करवाए गए, वहाँ कल कुछ भी हो सकता है।"
मीरा ने अपनी कॉपी निकाली और तुरंत कुछ लिख लिया।
और फिर हम सब स्कूल के अंदर गए।
पीछे भीड़ धीरे-धीरे छँट गई। पर बोर्ड पर लिखा वो नाम वहीं रहा, धूप में, स्याही सूखती हुई।
शाम चार बजे नई बस्ती में।
भारद्वाज भवन की दूसरी मंज़िल पर पर्दे खींचे हुए थे और अंदर ठंडी हवा चल रही थी। रणवीर भारद्वाज अपनी बड़ी सीट पर बैठा था और उसके सामने मेज़ पर एक कप चाय रखी थी, जिसे उसने एक बार भी हाथ नहीं लगाया।
बबलू पांडे दरवाज़े से अंदर आया। पान चबा रहा था। सोने की चेन हिल रही थी। उसने बैठने से पहले ही पूछा, "साहब, बुलाया?"
रणवीर ने सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
वो मुस्कान वही थी जो हर तस्वीर में थी। पर कमरे के अंदर, अकेले में, उसकी आँखें नहीं हँस रही थीं।
रणवीर ने कहा, "बबलू, स्कूल में कल परीक्षा है।"
बबलू ने कहा, "तो?"
"तो कल सुबह नौ बजे स्कूल की बिजली चली जाएगी।"
बबलू ने पान चबाना रोक दिया।
"पूरी बिजली?"
"पूरी। मीटर, तार, मेन स्विच — जो ज़रूरी हो।"
बबलू ने कहा, "साहब, उस वक़्त बच्चे अंदर होंगे।"
रणवीर ने कहा, "होंगे। और अंधेरे में जो होगा, उसका इल्ज़ाम अंकुश यादव पर जाएगा।"
बबलू ने पान थूकने के लिए पास रखा पानदान छुआ, फिर रुक गया।
उसने कहा, "साहब, इल्ज़ाम कैसे?"
रणवीर ने मेज़ से एक काग़ज़ उठाया। उस पर कुछ लिखा था, पर मैं नहीं जानता क्या। रणवीर ने उसे बबलू की तरफ़ बढ़ाया और कहा, "काग़ज़ फाड़ने की आवाज़, कुछ बच्चों के डरने की आवाज़, कोई एक बच्चा जो रोते हुए कहे कि उसने अंकुश भैया को स्कूल के पास देखा था। बाकी काम नौकर कर देंगे।"
बबलू ने काग़ज़ पढ़ा। उसका माथा सिकुड़ा।
"साहब, झूठा गवाह?"
"गवाह कभी झूठा नहीं होता, बबलू। गवाह सिर्फ़ वो होता है जिसे सही वक़्त पर सही बात याद आ जाए।"
बबलू कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने हँसने की कोशिश की। हँसी निकली भी, पर आधी आई और आधी गले में ही अटक गई।
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा और कहा, "तुम्हारा हाथ क्यों काँप रहा है?"
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