The Mysterious Bell1183 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1183

6 min read November 5, 2026

और मुझे दिखावा नहीं चाहिए था। मुझे चाहिए था कि यह चौक साफ़ हो, चाहे मेरे बिना हो।

तभी मुझे गली के मोड़ पर एक घड़ा दिखा।

मिट्टी का बड़ा घड़ा, जिसका मुँह लाल कपड़े से ढका था। और उसे रखकर जाने वाली औरत — ज़ुबैदा।

वो दूर खड़ी थी, चौक से करीब तीस कदम दूर। उसने घड़ा ज़मीन पर रखा, एक पल के लिए चौक की तरफ़ देखा, जहाँ सानिया झाड़ू लगा रही थी। फिर वो मुड़ी और चली गई।

उसने कुछ नहीं कहा। किसी को नहीं बुलाया। बस घड़ा रखकर चली गई।

मैंने देखा कि काजल ने भी यह देखा। वो मेरे पास आई और धीरे से बोली, “भाई, वो पानी का घड़ा रख गई है।”

मैंने कहा, “हाँ। और वो किसी को कहे बिना रख गई है। यह सबसे बड़ी बात है।”

काजल ने कहा, “क्या यह माफ़ी है?”

मैंने कहा, “नहीं। यह माफ़ी नहीं है। यह सिर्फ़ एक घड़ा है। पर आज के दिन, इस गली में, एक घड़ा भी बहुत होता है।”

काजल ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने को हुई, फिर रुक गई। फिर बोली, “भाई, तू क्यों खड़ा है यहाँ? जा न।”

मैंने कहा, “काजल, आज मैं झाड़ू नहीं उठाऊँगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि आज इस चौक को मेरी ज़रूरत नहीं है। इसे सिर्फ़ साफ़ होने की ज़रूरत है।”

काजल ने सिर हिलाया। वो नहीं समझी, पर उसने बहस नहीं की। कभी-कभी बहन का काम बहस न करना होता है।

चौक पर काम चल रहा था। बच्चे झाड़ू लगा रहे थे और उस्ताद उनके पीछे-पीछे चलकर देख रहे थे कि कहीं कुछ छूट न जाए। शबनम आपा गरम पानी से पत्थर धो रही थीं, जिससे भाप उठ रही थी और चबूतरी पर पुरानी गंदगी पिघलकर बह रही थी।

तभी सानिया ने झाड़ू रोक दी।

उसने चारों तरफ़ देखा — जैसे कोई चोरी करने वाला हो। फिर वो धीरे-धीरे, बिना किसी की तरफ़ देखे, मेरी तरफ़ चली आई।

मैं साँस रोककर खड़ा रह गया।

उसके हाथ में झाड़ू थी। वो मेरे पास आई, झाड़ू ज़मीन पर रखी, और मेरे पैरों के पास खिसका दी।

फिर वो मुड़ी और चली गई, बिना एक शब्द बोले।

मैं कुछ देर झाड़ू को देखता रहा। फिर सानिया को देखा, जो वापस चबूतरी के उस कोने में जा रही थी जहाँ सबसे ज़्यादा पत्ते थे।

मेरी आँखों में कुछ आ गया। मैंने तुरंत पलकें झपकीं और आसमान की तरफ़ देखा, जैसे पीपल के पत्तों में कुछ गिरा हो और मुझे ढूँढना हो।

झाड़ू उठाते वक़्त मेरे हाथ काँप रहे थे।

मैंने झाड़ू उठाई और चबूतरी के दूसरे कोने पर लगाने लगा। जब मैंने पहला झटका मारा, तो चिंटू ने मुझे देखा और चिल्लाया, “अंकुश भैया आ गए!”

मीरा ने चिंटू को घूरा।

चिंटू ने अपनी आवाज़ धीमी की और कहा, “मतलब… कोई नहीं आया। मैंने कुछ नहीं कहा।”

मैं हँसा। पहली बार उस दिन मैं ज़ोर से हँसा।

मैंने कहा, “चिंटू, तू ज़रूर बड़ा होकर राजनीति में जाएगा। तेरे पास जवाब हमेशा तैयार रहता है।”

चिंटू ने बाल्टी उठाई और कहा, “भैया, राजनीति में नहीं, क्रिकेट में जाऊँगा। वहाँ भी जवाब देने पड़ते हैं अंपायर को।”

और फिर बच्चे हँसने लगे, और मैंने भी हँसते-हँसते झाड़ू लगाई।

थोड़ी देर बाद दुबे अंकल ने अपनी कुर्सी से आवाज़ दी, “मीरा बेटी!”

मीरा ने कहा, “जी अंकल?”

“तुम्हारा झाड़ू टेढ़ा चल रहा है। सीधा चलाओ। गली की ज़मीन सीधी है, तुम्हारा हाथ टेढ़ा है।”

मीरा ने कहा, “अंकल, आप बैठे-बैठे निर्देश दे रहे हैं?”

दुबे अंकल ने कहा, “निर्देश देने के लिए ही तो बैठा हूँ। वरना मैं भी झाड़ू उठा लेता।”

बच्चे फिर हँसे।

मैं झाड़ू लगाते-लगाते सोच रहा था — यही तो है। यही असली चीज़ है। कोई बड़ा भाषण नहीं, कोई बड़ा सच नहीं। बस एक झाड़ू, एक बाल्टी, गुड्डू का गिरना, चिंटू का मज़ाक, सानिया का चुपचाप झाड़ू खिसकाना। गली इसी से जुड़ती है। काग़ज़ों से नहीं, अंगूठों से नहीं, सभाओं से नहीं। झाड़ू से।

और मुझे लगा कि आज तक मैंने जो कुछ किया, वो सब बड़ा था — घंटी, तंत्र, जोड़, अंक, हिसाब। पर यह छोटा सा काम, झाड़ू लगाना, इसका वज़न उस सबसे ज़्यादा था।

करीब आधे घंटे बाद चौक साफ़ हो गया।

पीपल के नीचे की चबूतरी धुलकर चमक रही थी, जैसे बरसों बाद नहाई हो। पत्ते एक तरफ़ ढेर में थे। शबनम आपा ने उस ढेर पर गरम पानी डाल दिया, ताकि उड़े नहीं।

मीरा ने अपना माथा पोंछा और एक लंबी साँस ली। उसके बाल भीगे हुए थे और उसकी साड़ी का छोर अब भी गीला था। वो मेरी तरफ़ आई और बोली, “अंकुश, चौक साफ़ है।”

मैंने कहा, “हाँ।”

“अब?”

“अब क्या?”

“अब तू क्या करेगा?”

मैंने झाड़ू को उसके ढेर के पास टिकाया और कहा, “अब मैं घंटी सुनूँगा।”

मैंने घंटी जेब से निकाली। वो सुबह से बर्फ़ जैसी ठंडी थी। मैंने उसे हथेली पर रखा। उसमें कोई गरमाहट नहीं थी।

और तभी, बिना हिलाए, बिना छुए, घंटी ने एक हल्की सी आवाज़ की।

धीमी। बहुत धीमी। जैसे दूर किसी ने उसे उँगली से छुआ हो और फिर हाथ हटा लिया हो।

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

मैंने घंटी को कान के पास लाया। बच्चे चुप हो गए। मीरा ने साँस रोक ली। शबनम आपा ने चिमटी नीचे रख दी। उस्ताद ने अपना चश्मा उतार लिया। दुबे अंकल कुर्सी पर सीधे होकर बैठ गए।

मैंने कान लगाया।

घंटी में एक धीमी सी धुन थी, जैसे बहुत दूर कोई बच्चा गा रहा हो या कोई बूढ़ी औरत रोटी बेलते हुए गुनगुना रही हो।

मैंने कान और सटाया और आँखें बंद कर लीं।

और तभी —

“अंकुश भैया!”

आवाज़ पीछे से आई। तेज़। चीख जैसी।

मैंने आँखें खोलीं। घंटी की धुन टूट गई।

गुड्डू दौड़ता हुआ आ रहा था, स्कूल की गली से। उसका चेहरा लाल था और साँस फूल रही थी।

वो चिल्लाया, “स्कूल में! स्कूल के नोटिस बोर्ड पर! वो लिस्ट फाड़ दी गई है!”

मीरा ने पूछा, “कौन सी लिस्ट?”

गुड्डू ने घुटने पकड़कर साँस ली और बोला, “परीक्षा वाली लिस्ट। जिसमें बच्चों के नाम लिखे थे।”

मैंने कहा, “तो फाड़ने में क्या है? परीक्षा की लिस्ट फट गई, नई लगा देंगे।”

गुड्डू ने सिर उठाया और मेरी आँखों में देखा।

“भैया, लिस्ट फाड़ी नहीं गई। लिस्ट के ऊपर किसी ने तुम्हारा नाम लिख दिया है।”

मेरे हाथ से घंटी फिसल गई और मेरी हथेली पर गरम होकर बैठ गई।

मीरा ने पूछा, “क्या लिखा है?”

गुड्डू ने हाँफते-हाँफते कहा, “ऊपर लिखा है — अंकुश यादव। और नीचे… नीचे सब बच्चों के नाम काटकर एक ही नाम लिखा है — जोड़ने वाला।”

मैं वहीं खड़ा रह गया।

चबूतरी पर सफ़ाई का पानी सूख रहा था। पीपल की छाया धीरे-धीरे बदल रही थी। शबनम आपा की केतली से भाप उठ रही थी। उस्ताद ने अपना चश्मा वापस पहना।

और मेरी जेब में घंटी ने फिर एक बार बजकर वही पुरानी बात दोहराई, जो आज सुबह उसने कही थी — दोनों एक ही दरवाज़े पर खड़े हैं।

अब मुझे समझ आ रहा था कि वो दरवाज़ा कौन सा है।

स्कूल का दरवाज़ा।

॥

मैंने घंटी को जेब में रखा और उसी वक़्त मेरे पैर अपने आप स्कूल की तरफ़ घूम गए।

पीछे से शबनम आपा ने आवाज़ दी, "अंकुश, चाय पी ले।"

मैंने कहा, "आपा, चाय रखिए। जब तक जवाब न मिल जाए, गला नीचे नहीं जाएगा।"

मीरा मेरे साथ चल पड़ी। उस्ताद ने अपनी लाठी उठाई। दुबे अंकल कुर्सी से उठे और बोले, "मैं भी चलता हूँ। मेरी कुर्सी पर बैठकर आदमी कम झूठ बोलता है, और आज स्कूल में कुछ ज़्यादा ही झूठ बोला जा रहा है।"

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