The Mysterious Bell1182 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1182

7 min read November 5, 2026

उसके पीछे-पीछे बच्चे आए।

चिंटू पहले, क्योंकि चिंटू को हमेशा लगता है कि सबसे पहले पहुँचने से कुछ इनाम मिलेगा। फिर रफ़ीक़, जिसके हाथ में टूटा चश्मा था और जो उसे आज भी आँख पर लगाए हुए था। फिर गुड्डू, जो एक हाथ में बाल्टी लेकर आया था और दूसरे हाथ में कोई डंडा। फिर सानिया।

सानिया आख़िर में आई। और वो भी इस तरह आई जैसे कोई चुपचाप आकर पंक्ति के आख़िर में खड़ा हो जाता है, ताकि किसी की नज़र उस पर न पड़े।

मेरी छाती में कुछ हुआ। मैंने घंटी को जेब में दबाया, पर वो चुप थी। आज सुबह से वो बहुत धीमी थी, जैसे बुखार के बाद कोई बच्चा बोलना भूल गया हो।

मीरा ने बच्चों को देखा और अपनी आवाज़ में वही पुरानी कड़क डालने की कोशिश की।

“सुनो सब। आज कोई कैमरा नहीं है, कोई खबर नहीं है, कोई तालियाँ नहीं हैं। आज सिर्फ़ झाड़ू है। जिसे बुरा लगे, वो अभी चला जाए।”

चिंटू ने हाथ उठाया, जैसे स्कूल में करता है।

“दीदी, अगर झाड़ू अच्छे से न चले तो बाद में तालियाँ बजाएँ?”

रफ़ीक़ ने कहा, “तालियाँ नहीं, समोसे। मीरा दीदी, आज शबनम आपा की गुमटी खुली है न?”

मीरा ने कहा, “समोसे का कोई वादा नहीं। पहले काम।”

गुड्डू ने बाल्टी उठाई और बोला, “मैंने पानी भर लिया है। दो बाल्टी और चाहिए।”

मीरा ने पूछा, “कहाँ से भरा?”

गुड्डू ने गर्व से कहा, “स्कूल के हैंडपंप से। रामलाल बाबा ने चाबी दे दी। बोले, गेट खोलकर पानी भर लो, पर गेट पीछे से बंद करके आना।”

मीरा हँसी। “तो तू पीछे से बंद करके आया?”

गुड्डू कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला, “वो मैं भूल गया। पर बाबा ने कहा था, बच्चों को भूलना चाहिए।”

मीरा ने माथा पकड़ा और बच्चे हँस पड़े।

मैं दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था, और मैंने खुद से कहा कि ज़्यादा मत मुस्कुरा। तू यहाँ खड़ा है, बोलने नहीं आया है। पर आदमी जब आदमी को हँसता देखता है, तो खुद भी हँसता है। यह काबू में नहीं रहता।

तभी पीछे से लोहे की चिमटी की टक-टक सुनाई दी।

शबनम आपा आ रही थीं।

एक हाथ में बड़ी केतली, दूसरे हाथ में गरम पानी से भरा टब, और सिर पर रखी थाली में समोसे, जिनकी भाप दूर से दिख रही थी।

उन्होंने वहीं आकर बीच में टब रखा और कहा, “ये झाड़ू लगाने से पहले हाथ-मुँह धो लो। धूल सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं, आदमी पर भी बैठती है। और मुँह धोए बिना झाड़ू लगाओगे तो गली को लगेगा कि कब्रिस्तान साफ़ कर रहे हो।”

चिंटू ने तुरंत कहा, “आपा, समोसे का क्या?”

शबनम आपा ने चिमटी उठाई। “समोसा काम के बाद। पहले चौक, फिर तवा।”

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। दूर खड़े मुझे देखा, और ऐसे देखा जैसे कोई माँ देखती है कि बेटा आज खाना नहीं खाएगा, यह पहले से पता है। फिर उन्होंने अपनी आवाज़ बच्चों की तरफ़ घुमाई और कहा —

“और एक बात। आज अगर किसी ने भी इस चौक पर अंकुश का नाम बुराई से लिया, तो मैं उसके मुँह पर ये गरम चिमटी रख दूँगी। समझे?”

बच्चे चुप हो गए।

मीरा ने धीरे से कहा, “आपा, ऐसे नहीं। आज हम साफ़ करने आए हैं।”

शबनम आपा ने टब को धक्का देकर ठीक किया और बोलीं, “साफ़ करना और बोलना, दोनों साथ चलते हैं। कचरा भी साफ़ होता है और ज़ुबान भी।”

तभी उस्ताद अली बक्श आए।

वो अपनी दुकान से चार झाड़ू लेकर आ रहे थे, और उनकी चाल में वही ठहराव था जो पुरानी सिलाई मशीन में होता है — तेज़ नहीं, पर टिकाऊ। उन्होंने झाड़ू चबूतरी के किनारे रखीं और बोले, “ये फटी पुरानी हैं, पर इनका सिरा मज़बूत है। नया झाड़ू पहले महीने में बिखरता है, पुराना साल भर चलता है। आदमी भी वैसा ही होता है।”

चिंटू ने पूछा, “उस्ताद, आप भी लगाओगे झाड़ू?”

उस्ताद ने अपना मोटा चश्मा ठीक किया और कहा, “मैं तुम लोगों के पीछे चलूँगा और देखूँगा कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया। यह भी झाड़ू ही है।”

बच्चे हँस पड़े।

तब पीछे से कुर्सी की चरमराहट आई।

दुबे अंकल अपनी नीली शर्ट पहने, चबूतरी के किनारे, पीपल की छाया में अपनी निजी कुर्सी लेकर आए थे। कुर्सी के एक पैर के नीचे उन्होंने पुरानी ईंट का टुकड़ा पहले ही रख लिया था, ताकि हिले नहीं।

उन्होंने कुर्सी जमाई, बैठे, और तभी मज़े से बोले, “मैं झाड़ू नहीं लगाऊँगा। मैं बैठूँगा। और बैठकर निगरानी करूँगा।”

मीरा ने कहा, “अंकल, आप तो थाने के सामने बैठते हैं।”

दुबे अंकल ने ठुड्डी ऊपर करके कहा, “बेटा, आदमी को अपनी चीज़ पर बैठना चाहिए। थाने की कुर्सी पर बैठकर आदमी कम झूठ बोलता है, अपनी कुर्सी पर बैठकर ज़्यादा सच। क्योंकि थाने की कुर्सी किसी और की है, और अपनी कुर्सी अपनी होती है।”

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, बिना ज़्यादा हिले, और मुझे एक इशारा किया — आ जा, खड़ा क्यों है।

मैंने हल्का सिर हिलाया कि नहीं अंकल, अभी नहीं।

वो समझ गए। उन्होंने कुछ नहीं कहा।

मीरा ने झाड़ू बाँटनी शुरू की। चिंटू को बड़ी, रफ़ीक़ को मध्यम, गुड्डू को छोटी और सानिया को… सानिया के हाथ में देने से पहले मीरा रुकी।

“सानिया, तू यहाँ क्यों आई?”

सानिया ने कुछ नहीं कहा।

मीरा ने धीरे से कहा, “तेरी अम्मी जानती है?”

सानिया ने कंधे हिलाए। न हाँ, न ना। ऐसा कंधा हिलाना भी एक जवाब होता है, और वो जवाब सबसे मुश्किल वाला होता है।

मीरा ने झाड़ू उसके हाथ में थमा दी। “ले। पर एक बात याद रखना। आज तेरे हाथ में जो झाड़ू है, वो किसी के खिलाफ़ नहीं है। बस ज़मीन के लिए है।”

सानिया ने झाड़ू पकड़ी और चबूतरी के उस कोने में चली गई जहाँ सबसे ज़्यादा पत्ते थे।

तभी गुड्डू ने बाल्टी उठाई और उसे एक झटके में आगे बढ़ाया। बाल्टी का किनारा उसकी कमीज़ में लग गया, बाल्टी तिरछी हुई, और आधा पानी मीरा के पाँव पर गिर गया।

चुप्पी।

फिर चिंटू चिल्लाया, “छक्का! छक्का!”

रफ़ीक़ ने कहा, “नहीं, यह तो एलबीडब्ल्यू है!”

गुड्डू ने कहा, “मैं तो गेंद फेंक ही नहीं रहा था!”

चिंटू ने कहा, “फिर भी छक्का! मीरा दीदी के पाँव पर लगा है, इसका मतलब बाउंड्री पार।”

और बच्चे हँसने लगे, इतनी ज़ोर से कि पीपल के पत्ते हिल गए।

मीरा अपनी साड़ी का छोर निचोड़ रही थी। उसका चेहरा लाल था। मुझे लगा वो डाँटेगी। पर फिर वो हँसी।

पहले धीरे, फिर खुलकर। ऐसे हँसी जैसे पाँच साल से हँसी नहीं थी और आज उसे याद आ गया कि हँसना कैसे होता है।

उसने गुड्डू की तरफ़ झाड़ू उठाई और कहा, “गुड्डू, अगर एक बूँद और गिरी, तो तुझे बाल्टी में बैठाकर पूरा चौक साफ़ करवाऊँगी।”

गुड्डू भागा, और भागते-भागते गिरा, और उसके गिरने पर बच्चे और ज़ोर से हँसे। शबनम आपा गरम पानी का टब लेकर आईं और बोलीं, “हँसने से पहले हाथ धो लो, वरना हँसी में धूल घुलेगी।”

उस्ताद चुपचाप एक झाड़ू उठाकर चबूतरी के पास से पत्ते हटाने लगे। उन्होंने किसी को नहीं बताया कि वो झाड़ू लगा रहे हैं। जब चिंटू ने देखा तो चिल्लाया, “उस्ताद झाड़ू लगा रहे हैं!”

उस्ताद ने कहा, “मैं नहीं लगा रहा। मेरा हाथ खुद चल रहा है। पचास साल से यही आदत है।”

मैं दूर खड़ा था और अंदर से मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे बाहर से देख रहा है और कह रहा है — जा, तू भी झाड़ू उठा। पर मैंने हाथ नहीं उठाया।

मैं सोच रहा था — कल तक इस चौक पर सबसे बड़ा नाम मेरा था, बुराई में। आज अगर मैं झाड़ू लेकर खड़ा हो गया, तो गली कहेगी — देखो, जिसने सब तोड़ा, वही अब झाड़ू लगा रहा है, दिखावा कर रहा है।

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