The Mysterious Bell – Chapter 1181
फिर बोलीं — उन्नीस साल पहले इस स्कूल में एक लड़का था। बहुत ही शरारती। एक दिन उसने अपनी बेंच के नीचे चाकू से मेरा नाम खोद दिया था। मैंने उसे पकड़ा, उसे डाँटा, ऑफ़िस बुलाया। वो रोया और बोला — मैडम, मैंने गलत नहीं किया, सबसे ज़्यादा पसंद होने वाले का नाम बेंच के नीचे ही लिखा जाता है।
मैं हँस पड़ी थी। उसे माफ़ कर दिया था। वो लड़का अब यहाँ नहीं है। पर उसका लिखा हुआ नाम इन्नीस साल से उस बेंच में बैठा था।
मीरा ने कहा — और मैडम, आज की लिखी हुई लाइन किसने लिखी?
रमा मैडम ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर बोलीं — मैंने नहीं लिखी। और मुझे लगता है, यह किसी ऐसे आदमी ने लिखी है जो उस लड़के को जानता था।
उस वक़्त मेरे मन में एक सवाल आया जो बड़ा भारी था — रमा मैडम ने स्कूल में रजिस्टर खोला था। उसमें उनके पति का नाम शंकरलाल था। और मेरे पापा का बड़ा भाई होने का ज़िक्र आया था। अगर शंकरलाल पापा के भाई थे… तो रमा मैडम मेरी बुआ लगती थीं।
मैंने कहा — मैडम, एक बात पूछूँ?
वो बोलीं — पूछो।
— उस रजिस्टर में शंकरलाल का नाम था। और अंकुश यादव का नाम… वो शंकरलाल कौन थे?
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखें जैसे पहली बार मुझे पहचान रही थीं।
— शंकरलाल मेरे पति थे। और अंकुश… अंकुश तुम हो। उस रजिस्टर में तुम्हारा नाम भी लिखा था। तुम्हारे पापा ने तुम्हारा नाम भी उसी काग़ज़ पर लिखवा दिया था, जिस पर उन्होंने अपना अंगूठा लगाया था।
काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैं खामोश खड़ा रहा। मैंने कहा — मैडम, मुझे उस रजिस्टर में अपना नाम दोबारा दिखाइए।
रमा मैडम ने कहा — आज शाम सभा में। जब मैं अपनी बेटी के साथ आऊँगी, मैं वो रजिस्टर साथ लाऊँगी। और उस रजिस्टर में जो नाम तुम्हें दिखेगा, वो तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच होगा।
फिर उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा और कहा — मीरा, तुम पीपल चौक जाओ। झाड़ू एक काम है, पर सच पढ़ना दूसरा काम है। दोनों आज करने पड़ेंगे।
मीरा ने कहा — मैडम, मैं लिखकर पढ़ूँगी। पूरा सच। कुछ भी नहीं छिपाऊँगी।
रमा मैडम ने अपना रजिस्टर उठाया और स्कूल के अंदर चली गईं।
हम गेट पर खड़े रहे।
कुछ देर बाद काजल ने कहा — भाई, तुझे पता है ना कि आज शाम सभा में रमा मैडम का लाया रजिस्टर क्या खोलेगा?
मैंने कहा — पता है। पर पहले मुझे उस आदमी को ढूँढना है जिसने इस बेंच के नीचे आज सुबह चार शब्द लिखे।
मीरा ने कहा — क्या तुम्हें शक है कि किसने लिखे?
मैंने घंटी जेब से निकाली। फिर भी गुनगुनी थी। मैंने कहा — मीरा, तू उस दिन स्कूल आई थी। उस वक़्त यहाँ कौन-कौन था?
मीरा कुछ सोचने लगी।
— मैं आई थी। रमा मैडम थीं। सुनीता दीदी थीं। और… और एक बूढ़ी मैडम थीं, ऊपर की खिड़की पर। सफ़ेद बाल, शॉल।
मैंने कहा — वो बूढ़ी मैडम कौन हैं?
मीरा ने कहा — पता नहीं। पर उन्होंने मुझे देखकर पर्दा खींच लिया था।
मैंने कहा — ठीक है। पहले पीपल चौक की सफ़ाई। फिर उस बूढ़ी मैडम की खोज।
उस वक़्त स्कूल के गेट के बाहर जो हो रहा था, वो मैंने काजल की आँखों में देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
मैंने पूछा — क्या हुआ?
काजल ने गेट के बाहर सड़क की तरफ़ इशारा किया।
वहाँ एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी थी। खिड़की खुली और उसमें से किसी ने एक काग़ज़ मीरा के हाथ में दे दिया — और गाड़ी चली गई।
मीरा ने काग़ज़ खोला।
उस पर नीली स्याही में सिर्फ़ एक लाइन थी —
"आज शाम पीपल की सभा में रमा जो रजिस्टर लाएगी, वो पहले पाँच पन्ने नहीं खोलेगी। और अगर खोल दिए, तो जो चौथा नाम है, वो तुम्हारी गली का सबसे पुराना नाम है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने लंबी साँस ली।
और मेरी जेब में घंटी एक बार, सिर्फ़ एक बार, ज़ोर से बजी।
फिर वो बोली — "चौथा नाम, तीसरा हाथ। दोनों एक ही दरवाज़े पर खड़े हैं।"
मैंने घंटी जेब में रखी और मीरा से कहा — चल, पहले झाड़ू लगाते हैं। पीपल चौक साफ़ करते हैं। पर आज शाम उस रजिस्टर के चौथे पन्ने से पहले हम वो बूढ़ी मैडम ढूँढेंगे।
काजल ने कहा — भाई, एक बात कहूँ? सानिया की अम्मी ने सानिया का हाथ पकड़ा, पर उसका बस्ता नहीं छीना। मतलब वो सानिया को स्कूल भेजेगी। बस सफ़ाई पर नहीं। और शायद यही सबसे बड़ी बात है। वो डरती है, पर बेटी की पढ़ाई नहीं रोकती।
मैंने कहा — तो चल, आज हम उसी दरवाज़े पर दोबारा चाय लेकर जाएँगे। पहले की तरह नहीं, आज अलग तरीके से।
मीरा ने पूछा — अलग कैसे?
मैंने कहा — आज चाय मैं नहीं बनाऊँगा। आज चाय सानिया बनाएगी। और अपनी माँ को वो खुद पिलाएगी। कुछ बातें किसी और की आवाज़ से नहीं, अपने ही घर की आवाज़ से सुनी जाती हैं।
मीरा मुस्कुराई।
काजल ने कहा — और रमा मैडम के उस चौथे नाम का क्या?
मैंने कहा — चौथा नाम मुझे नहीं चाहिए। मुझे चाहिए तीसरा हाथ। क्योंकि जो हाथ किसी का नाम मिटाता है, उसका अपना नाम भी कहीं न कहीं छिपा होता है।
हम पीपल चौक की तरफ़ चले।
रास्ते में एक बात सोच रहा था — स्कूल में जब बच्चों ने तालियाँ बजाई, मुझे लगा कि यह जीत है। पर जीत नहीं थी। यह सिर्फ़ एक औरत का अपने पाँच साल पुराने झूठ को सबके सामने रखना था। और उसके बाद जो हुआ — सानिया की अम्मी का हाथ पकड़कर चले जाना — वो जीत नहीं थी। वो सबक था। गली का सच बस एक झाड़ू से नहीं, बल्कि उस औरत के सामने से होकर जाता है जो अब भी डरती है।
शाम को सभा में रमा मैडम वो रजिस्टर खोलेंगी। और उस रजिस्टर में मेरा नाम बताया गया है। पर उससे भी बड़ी बात यह है कि उस रजिस्टर में चौथा नाम किसका है — और वो चौथा नाम आज किसी और की ज़ुबान से नहीं, मेरे मुँह से सुना जाएगा।
पर पहले पीपल चौक।
क्योंकि झाड़ू जब ज़मीन पर चलती है, तो धूल के साथ-साथ गली के डर भी हल्के हो जाते हैं।
और मुझे लगता है, आज के बाद अंकुश यादव और उसकी बेंच, दोनों स्कूल के गेट पर नहीं, गली के दिल में खड़े होंगे।
॥
सुबह के आठ बजे थे, और पीपल चौक पर पहुँचते ही मुझे लगा कि गली ने अपना चेहरा धो लिया है।
कल तक यहाँ बोर्ड था, मेज़ थी, कुर्सी थी, और उन सबके ऊपर धूल की एक मोटी चादर थी। आज बोर्ड नहीं था, मेज़ नहीं थी, सिर्फ़ पीपल का पेड़ था और उसके नीचे पत्थर की चबूतरी, जो वर्षों से वैसी ही पड़ी थी, जैसे कोई बूढ़ा दादा चुपचाप बैठा हो और बस देख रहा हो कि अब बच्चे क्या करते हैं।
मैं चौक से थोड़ी दूर खड़ा था। उस्ताद की दुकान के मोड़ पर, जहाँ से पूरा चौक दिखता है, पर चौक वालों को मैं नहीं दिखता।
मुझे लगा कि आज मैं वहाँ खड़ा नहीं होना चाहिए। क्यों, यह मैं ठीक से नहीं बता सकता। बस लगा कि आज झाड़ू उन हाथों से चले जिन पर किसी ने काला जादू होने का इल्ज़ाम नहीं लगाया। जिस चौक को मैंने साफ़ किया, वो चौक मेरे नाम से डरा हुआ है। तो आज पहले उसे मेरे नाम से आज़ाद होने दो।
सबसे पहले मीरा आई।
उसके हाथ में दो झाड़ू थीं, एक बड़ी और एक छोटी। छोटी वाली बच्चों के लिए थी, यह मैंने झाड़ू देखकर नहीं, उसके चलने से समझा। जल्दबाज़ी में चलने वाली मीरा आज धीरे चल रही थी, जैसे किसी की नींद से उठी हो और याद कर रही हो कि पाँव कहाँ रखने हैं।
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