The Mysterious Bell – Chapter 1179
"क्योंकि यह जोड़ बनाने का काम नहीं है," मैंने कहा। "यह सिर्फ़ एक बेंच है। इसे किसी को माफ़ी नहीं माँगनी। इसे बस ठीक होना है।"
"तो यह भी जोड़ नहीं है?"
"यह भी जोड़ है," मैंने कहा। "पर बिना हिसाब का। कभी-कभी हिसाब न रखना ही सबसे बड़ा हिसाब होता है।"
टिंकू ने गौर से देखा, फिर बोला — "ये स्कूल की कमर है। इसे सीधा करना पड़ेगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्या कहा?"
"ये बेंच स्कूल की कमर है," उसने कहा। "और माँ कहती है कि कमर टूट जाए तो आदमी सीधा नहीं खड़ा हो पाता।"
मैं एक पल के लिए चुप हो गया। यह लड़का कभी-कभी ऐसी बात कह देता है जो लंबे समय तक कान में बजती रहती है।
"तो चल," मैंने कहा। "आज स्कूल की कमर सीधी करते हैं।"
मैंने बेंच को पलटकर उसकी तली देखी।
और तभी मैं रुक गया।
बेंच के नीचे, बीच के पटरे के ठीक नीचे, लकड़ी पर कुछ खुदा हुआ था। पुराना खुदा हुआ। इतना पुराना कि लकीरों में धूल भर गई थी, और लकीरें डूब गई थीं। पर साफ़ दिख रहा था — एक नाम।
रमा।
और उसके नीचे, ताज़ा स्याही में, किसी ने अभी-अभी लिख दिया था, पेंसिल से, बहुत छोटे अक्षरों में, चार शब्द —
माफ़ी काम से दिखती है।
मैंने उँगली उस पर फेरी। स्याही अभी सूखी नहीं थी।
मैंने चारों तरफ़ देखा।
गली खाली थी। सिर्फ़ शबनम आपा की गुमटी से धुआँ उठ रहा था और दूर स्कूल की दीवार पर पीली रोशनी पड़ रही थी।
"भैया," चिंटू ने कहा, "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बेंच ठीक हो गई।"
पर मेरी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो ठीक नहीं था।
क्योंकि मुझे पता था कि यह बेंच स्कूल के आँगन की है। और स्कूल के आँगन में उस वक़्त सिर्फ़ एक ही औरत ने क़दम रखा था — रमा मैडम।
पाँच साल से एक औरत उस बेंच के नीचे एक नाम खुदा हुआ रखे थी। और आज जब वो बेंच घसीटकर लाई गई, तो एक औरत ने उसके नीचे चार शब्द लिख दिए।
मैंने घंटी जेब से निकाली। बर्फ़ जैसी ठंडी थी। पर जब मैंने उसे हिलाया तो वो बजी। धीरे से। इतनी धीरे कि जैसे कोई जवाब दे रहा हो किसी ऐसी बात का जो अभी पूरी नहीं हुई।
और फिर वो बोली —
"एक और दरवाज़ा खुला है।"
मैंने घंटी को वापस जेब में रखा। और बेंच उठाकर उन बच्चों के साथ स्कूल की तरफ़ चल पड़ा।
पीछे शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं और उन्होंने कहा —
"अंकुश, तेरी मेज़ पर कोई काग़ज़ छोड़ गया।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। शबनम आपा के हाथ में एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा था।
और उस लिफ़ाफ़े के कोने पर वही नीली स्याही थी। वही दो लकीरें। वही बिंदु।
गली की धूल में उस दिन एक और नाम लिखा गया, और वो नाम मेरे अपने घर का था।
मैंने बेंच नीचे रखी और कदम बढ़ाया। बच्चे मेरे पीछे आ रहे थे। चिंटू कह रहा था कि बेंच कल लौटा देंगे, चिंटू चिंता मत कर।
पर मुझे पता था — यह बेंच कल स्कूल नहीं लौटेगी।
क्योंकि अब यह सिर्फ़ एक बेंच नहीं थी। यह एक औरत के पाँच साल की चुप्पी का सबूत थी। और मैं उसे किसी तहखाने में बंद नहीं करने वाला।
मैंने बेंच वापस दुकान के पीछे रखी और काग़ज़ पढ़ने लगा।
उस लिफ़ाफ़े में एक ही लाइन थी — "माफ़ी जो काम से दिखती है, वो कभी काग़ज़ नहीं माँगती।"
मैंने उसे कॉपी में चिपका दिया।
और उस वक़्त मेरे दिमाग़ में जो सवाल उठा, वो यह था — पाँच साल पहले इस बेंच के नीचे "रमा" किसने खुदा था?
रमा मैडम ने खुद?
या वो कोई और था, जो उनका नाम बचाना चाहता था?
मैंने घंटी फिर निकाली। इस बार उसने जवाब नहीं दिया। वो सिर्फ़ गुनगुनी थी, जैसे कोई सो रहा हो।
मैंने उसे जेब में रखा और कॉपी में एक लाइन लिखी —
"अगर माफ़ी काम से दिखती है, तो मेरा काम क्या है?"
जवाब मुझे नहीं पता था। पर अब मेरे पास एक बेंच थी। और मुझे लगा कि अगर मैं इस बेंच को कल स्कूल में वापस ले जाकर सबके सामने यह कहूँ कि यह उस औरत का नाम है जिसे पाँच साल से भुला दिया गया था — तो शायद जवाब उसी में मिल जाए।
पर उसके लिए पहले मुझे उस्ताद से पूछना था कि पचास साल पहले इस शहर में ऐसे कितने नाम छुपाए गए थे।
और उससे भी पहले — मुझे चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े के उस ताले को खोलना था, जिसमें घंटी जैसी आवाज़ बंद थी।
मैंने कॉपी बंद कर दी।
बाहर शाम गहरी हो रही थी, पीपल की छाया लंबी होकर स्कूल की दीवार तक पहुँच गई थी, और दूर कहीं एक नीम के पेड़ के नीचे, कोई बूढ़ा आदमी तपेरी जलाकर बैठ गया था।
उसकी पीली रोशनी में मुझे वो बेंच दिख रही थी, जिसके नीचे रमा का नाम खुदा था। और मुझे लगा — कभी-कभी एक नाम को बचाने के लिए एक पूरी गली को बोलना पड़ता है।
आज कोई नहीं बोला।
कल मैं बोलूँगा।
॥
सुबह छह बजे मैंने दुकान का शटर उठाया तो मीरा पहले से पीपल के नीचे खड़ी थी। उसके हाथ में वो टूटी बेंच थी। मैंने कहा — ये तू अकेली क्यों उठा रही है, मेरा इंतज़ार करती। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस इतना कहा — ये बेंच मेरी है। जिस स्कूल के आँगन से मैं एक औरत का नाम मिटाने निकली थी, वो बेंच मैंने खुद तोड़ी थी। अब मैं उसे खुद लौटाऊँगी।
मैं चुप हो गया।
कभी-कभी इंसान को लगता है कि वो सब ठीक कर रहा है। पर असल में टुकड़े खुद ही जुड़ने लगते हैं, हम बस रास्ते में खड़े रह जाते हैं।
मीरा ने बेंच उठाई। एक टाँग हिल रही थी, वो घसीटती नहीं चल रही थी, बल्कि गोद में उठाकर चल रही थी, जैसे किसी बच्चे को उठाया जाता है। मैं उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। टिंकू नहीं था — वो लक्ष्मी दीदी के यहाँ सुबह की क्लास में गया था, आज उसका पहला दिन था।
गली सुबह की सुस्ती में थी। शबनम आपा का चूल्हा जल चुका था, समोसे का तेल कड़कड़ा रहा था, पर आज उनके गुमटी पर भी कोई भीड़ नहीं थी। दूर पीपल के नीचे वो चौकोर निशान अभी भी धूल में मौजूद था, जहाँ तीन दिन पहले तक मेरी मेज़ रखी थी।
हम गली के मोड़ पर पहुँचे तो एक औरत ने पानी का लोटा नाली में उलट दिया — जैसे हमारे जाते ही रास्ता धो देना हो। बाईं तरफ़ नसीमा बाई की राशन की दुकान का शटर आधा गिरा हुआ था। वो बाहर बैठी दाल चुन रही थी। मीरा ने उसकी तरफ़ देखा और आवाज़ की — नसीमा बी, एक मिनट।
नसीमा बाई ने नज़र ऊपर की, फिर झुका दी। बोली — मैं कुछ नहीं कहना चाहती। जिसके साथ चलती है, उस हिसाब से गिनी जाने लगी हूँ।
मीरा ने बेंच नीचे रखी। मैंने देखा उसका हाथ काँप रहा था। उसने कहा — नसीमा बी, आपकी दुकान का काग़ज़ जो सील होने वाला था, वो आठ दिन में रुका। आपके साजिद का नाम भी उस सूची में था, है ना?
नसीमा बाई ने दाल की बोरी से हाथ उठा लिया। एक पल को लगा वो कुछ कहेंगी। फिर बस इतना कहा — मेरा लड़का साल भर से घर खर्च दे रहा है। तू उसका नाम ले, या न ले, गली में सब का नाम वैसे भी लिया जा रहा है, जिसे बचाना है, उसे बचा।
और फिर वो अंदर चली गई।
हम आगे बढ़े। किशनलाल काका की दुकान पर चने का लोटा वैसे ही रखा था, जैसे रोज़ रखा रहता है। उन्होंने मीरा के हाथ में बेंच देखी, कुछ कहा नहीं, बस सिर हिलाया। और फिर बहुत धीरे कहा — बेटा, स्कूल के गेट पर दो सफ़ेद कुर्ते वाले सुबह छह बजे से खड़े हैं। सूची लिए हैं।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा वैसा ही था, जैसा उस रात था जब वो रणवीर के दफ़्तार के काग़ज़ पढ़ रही थी। जमा हुआ। ठंडा।
हम स्कूल के गेट पर पहुँचे।
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