The Mysterious Bell – Chapter 1178
शबनम आपा ने कटोरी मेरी मेज़ पर रखी और हँसी। "तेरे हाथ में जो घंटी है, वो अगर हिसाब रखती है, तो मेरी गुमटी का उधार भी माफ़ कर दे।"
मैंने हँसते हुए उसका हाथ पकड़ा। "आपकी गुमटी का उधार सबसे आख़िर में।"
दोपहर से ही गली आती-जाती रही। पहले आठ साल का एक लड़का आया। उसके हाथ में साइकिल की टूटी ज़ंजीर थी — एक ओर टूटी, दूसरी ओर जंग। मैंने टूलबॉक्स से चेन खोलने वाला औज़ार उठाया और दो मिनट में चेन जोड़ दी। लड़का हैरान रह गया।
"कितने पैसे?"
"कुछ नहीं।"
"मेरी अम्मी ने कहा है कि तेरे पास नहीं जाना।"
"तो तू मेरे पास आया ही क्यों?"
"क्योंकि मेरी साइकिल ही नहीं है और मैं स्कूल नहीं जा पाता।" वो ज़मीन देखकर बोला।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"अगली बार चुपके से आ," मैंने कहा। "दुकान के पीछे वाले दरवाज़े से। अम्मी को पता नहीं चलेगा।"
वो हँसकर भागा। मुझे पता था कि यह ठीक नहीं है। पर उस वक़्त मुझे यह ठीक लगा।
फिर एक बूढ़ी औरत आई। उसकी चाय की केतली का ढक्कन टूटा था। मैंने टिन का छोटा टुकड़ा काटकर उसे फिट किया, दो पेंच लगाकर। उसने कहा — "पैसा ले ले बेटा।"
"नहीं लूँगा।"
"तू मेरा बेटा नहीं है।"
"आप भी मेरी माँ नहीं हैं, फिर भी आपके लिए यह कर रहा हूँ।"
वो एक पल रुकी, फिर केतली उठाकर चली गई। दो कदम जाकर पलटी।
"अगर तेरे पास काला जादू होता, तो तू ऐसे नहीं बोलता," उसने कहा। "काला जादू वाला इंसान इतना फ़ालतू हँसता नहीं।"
वो चली गई।
मैंने आपा की तरफ़ देखा। आपा ने कंधे उचकाए। "एक माँ की दुआ ले ली। काफ़ी है।"
शाम के पाँच बजने वाले थे। मैं काग़ज़ पर और कुछ लिखने की सोच ही रहा था कि गुमटी की तरफ़ से एक औरत आई।
रज़िया।
उसके हाथ में एक फटा हुआ काग़ज़ था। वो काग़ज़ किसी पुरानी फाइल से निकला लग रहा था — कोना जला हुआ, बीच से एक लंबी दरार। वो सीधे मेरी दुकान की तरफ़ आ रही थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा तो वो मेरी नज़र पड़ते ही रुकी। मैंने हाथ उठाया कि कुछ कहूँ, पर उसने कुछ नहीं कहा। बस पलट गई और चुपचाप वापस गुमटी की तरफ़ लौट गई।
मैं कुछ देर उसकी तरफ़ देखता रहा। शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने रज़िया के जाते वक़्त उसके हाथ से वो काग़ज़ अपने हाथ में ले लिया था। कोई बात नहीं हुई।
पर मैंने देखा — शबनम आपा ने काग़ज़ जेब में नहीं रखा। उन्होंने उसे अपने सीने से लगाया और वापस कटोरी उठा ली।
इसका मतलब कुछ भी हो सकता था। और इस वक़्त किसी चीज़ का मतलब ढूँढना बेकार था। मतलब वो होता है जो आदमी ढूँढता है। सच वो होता है जो आदमी नहीं ढूँढता, और वो अपने आप सामने आ जाता है।
छह बजे के क़रीब मैंने देखा कि गली के बच्चे — सानिया, गुड्डू, चिंटू, रफ़ीक़ — चारों गुमटी के पीछे खड़े हैं और मेरी तरफ़ देख रहे हैं। मैंने उन्हें इशारा नहीं किया। मैंने अपना काम किया।
पर फिर चिंटू आया। वो दौड़कर आया, घुटने पर पट्टी बंधी थी, हाथ में एक पुराना रिम था।
"भैया," उसने कहा। "ये रिम मिला है। इसकी तीलियाँ टूटी हैं। ठीक हो सकता है?"
मैंने उसके हाथ से रिम लिया और देखा। तीन तीलियाँ टूटी थीं, एक एड़ी मुड़ी थी। ठीक हो सकता था। दस मिनट का काम था।
"कहाँ से लाया?"
वो कुछ नहीं बोला।
"चिंटू, ये रिम कहाँ से लाया?"
"गली के मोड़ के कबाड़ से," उसने कहा। "मुझे पता है। मुझे पता है कि भैया की दुकान में कोई नहीं आ रहा। और मुझे पता है कि आप किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाते।"
मैंने उसे देखा।
"तूने यह किससे कहा?"
"किसी से नहीं। सानिया ने कहा कि अगर अम्मी को पता चलेगा, तो हमारा स्कूल छूट जाएगा।"
"तो तुझे क्यों आना पड़ा?"
वो अपने जूते देखने लगा।
"क्योंकि मेरी साइकिल कल से खराब है और अम्मी के पास पैसे नहीं हैं।" उसने कहा। "मुझे पता है कि यह बात माँ को बुरी लगेगी। पर मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मास्टर जी ने कहा था कि अगर हम झूठ बोलेंगे तो हमारे नाम कट जाएंगे।"
मैं हँस पड़ा। बिना सोचे।
"चिंटू," मैंने कहा। "तेरा नाम नहीं कटेगा। पर तेरी साइकिल ज़रूर ठीक होगी। कल सुबह लाकर रख देना।"
वो चमक गया।
"सच?"
"सच में। और ये रिम भी ठीक कर दूँगा।"
वो दौड़कर गया। मैंने रिम देखा और टूलबॉक्स से तीन नई तीलियाँ निकालीं।
दो मिनट बाद सानिया आई।
वो चुपचाप मेरी मेज़ के पास आई। उसके हाथ में मेरी पुरानी नर्सिंग की किताब नहीं थी। उसके हाथ में एक लोहे की टूटी पेंचकस थी।
"ये ठीक हो सकती है?" उसने पूछा।
मैंने उसे देखा। उसने आँखें नहीं मिलाईं। उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो कह रहा था कि मैं यहाँ नहीं हूँ, पर मैंने यह चीज़ हाथ में पकड़ी हुई है।
"हो सकती है," मैंने कहा। "पर तेरी अम्मी को पता चलेगा?"
"अम्मी सो रही है," उसने कहा। "और ये पहिए वाली पेंचकस है, चलने वाली पेंचकस नहीं — यह ठीक होगी तो हमारी साइकिल चलेगी।"
मैंने वो पेंचकस ली और ठीक करने लगा। सानिया पास में खड़ी रही। उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा, पर आँखें नहीं मिलाईं।
"अंकुश भैया," उसने कहा। "आपने मेरी अम्मी से क्या कहा था?"
"कुछ नहीं। उसका नाम बोला था।"
"वो रोई थी।"
"मुझे पता है।"
"आपने उसे रुलाया।"
"मैंने नहीं रुलाया। उसका नाम ज़ुबैदा है। किसी ने उसे बहुत दिन तक बुलाया नहीं। जब नाम बुलाया जाता है, तो आदमी रो पड़ता है।"
सानिया कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा —
"मेरी अम्मी ने कहा कि आप कुछ नहीं करते। सिर्फ़ लोगों को बहलाते हैं।"
"अम्मी सही कह रही है।" मैंने कहा। "मैं सच में कुछ नहीं करता। शायद अब कुछ करना पड़ेगा।"
मैंने पेंचकस उसे वापस दी। ठीक हो चुकी थी।
वो चली गई।
दस मिनट बाद मैंने देखा — चिंटू, गुड्डू और रफ़ीक़ चारों अपना स्कूल का टूटा बेंच घसीटकर ला रहे थे। बेंच भारी थी। स्कूल के आँगन से निकालकर लाए थे। रास्ते में उसे तीन बार गिराया। घसीटने की आवाज़ से आधी गली सुन रही थी।
मैंने पहले उन्हें डाँटा।
"क्या कर रहे हो? ये स्कूल का है। तुम्हें पता नहीं अम्मी क्या कहेगी?"
"अम्मी को पता चलेगा तो हम कह देंगे कि स्कूल के सामने पड़ा मिला," गुड्डू ने कहा।
"ये बेंच स्कूल की संपत्ति है, गुड्डू। इसे बाहर ले जाना चोरी है।"
"अरे भैया, हम ले जा नहीं रहे। वापस रख आएंगे," चिंटू ने कहा। "पर यह टूटी है और कोई इस पर बैठ नहीं सकता। मैंने सोचा कि आप इसे ठीक कर देंगे तो सुबह स्कूल में सबको कह देंगे कि यह अपने आप ठीक हो गई।"
मैंने सिर हिलाया।
"तुम सब पागल हो," मैंने कहा। और फिर हँस पड़ा। "लाओ इसे।"
वो तीनों मुस्कुरा पड़े।
तीन बजे से हम उस बेंच पर झुके हुए थे। टाँग हिल रही थी, दूसरी तरफ़ का नट गायब था, बीच का पटरा चरचरा रहा था। मैंने एक ही बार में चार चीज़ें ठीक कीं — दो पेंच नए लगाए, एक ईंट का बोल्ट नहीं था इसलिए टिन का टुकड़ा काटकर नट बनाया, और पटरे के नीचे एक हल्की सी लोहे की पट्टी लगाई।
टिंकू ने कंधे उचकाए। "भैया, यह सब अपने आप हो रहा है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब — आप कह रहे थे कि घंटी से काम लेना है। पर मैंने देखा कि आपने एक बार भी घंटी नहीं बजाई।"
मैं रुका।
हाँ। मैंने एक बार भी नहीं बजाई थी।
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