The Mysterious Bell – Chapter 1176
"मतलब?"
"मैंने पूरी ज़िंदगी एक चीज़ सीखी है," मैंने कहा। "चीज़ें जोड़ना आसान है — एक पहिया ठीक कर दो, एक चेन जोड़ दो, एक साँस लौटा दो। असली मुश्किल है उस टेढ़ी याद से नज़र मिलाना, जो पीछे खड़ी है और कहती है — तूने मेरे साथ ये किया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मेरे पापा उस रात काग़ज़ के खिलाफ़ थे। उन्होंने अंगूठा नहीं लगाया। उन्हें चुप करा दिया गया। और मैं — मैं बारह साल से उनकी चुप्पी को उनका स्वभाव समझ रहा था। मैंने उनसे एक बार भी नहीं पूछा — पापा, आप चुप क्यों हो? मैंने सोचा वो कमज़ोर हैं। मैंने सोचा वो डरपोक हैं। मैंने सोचा मैं उनसे अलग हूँ।"
मेरी आवाज़ धीमी हो गई।
"मैं उनसे अलग नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैंने भी एक बात बारह साल छिपाई — कि मुझे डर है। डर है कि ये घर मैं नहीं बचा पाऊँगा। और ये डर मैंने हँसी के पीछे रखा। जैसे तू अपना डर खबरों के पीछे रखती है।"
मीरा ने उस लिफ़ाफ़े की तरफ़ देखा।
"तो क्या करूँ?" उसने कहा।
"ये लिफ़ाफ़ा लेकर उनके पास जा," मैंने कहा। "आज पाँच बजे सभा में नहीं। अभी। अकेले। जब कोई न देख रहा हो। क्योंकि सभा में माफ़ी और नाटक में माफ़ी, दोनों की आवाज़ एक जैसी आती है।"
"और अगर वो नहीं लें?"
"तो तू रख देगी," मैंने कहा। "लौटा देना भी एक बात होती है। जिस चीज़ को ज़बरदस्ती थोप दिया जाए, वो माफ़ी नहीं होती — वो रसीद होती है।"
वो उठी। उसके हाथ अब कम काँप रहे थे, पर चेहरा सफ़ेद था।
तभी मेरा फ़ोन बजा।
काजल का नाम आ रहा था। मैंने उठाया।
"अंकुश," वो तेज़ बोली। "माँ ने दवा ले ली है, पर वो पूछ रही हैं कि पापा कहाँ हैं। और एक बात — पीले वार्ड के बाहर नया काग़ज़ लगा है, आज शाम छह बजे से कोई नया मरीज़ नहीं। पाँच बजे वाला सभा तो हो जाएगा न?"
"हो जाएगा," मैंने कहा। "तू माँ के साथ रह। मैं पाँच बजे तक आ जाऊँगा।"
"अंकुश," उसने कहा, "सानिया का बुखार नहीं उतरा। उसकी अम्मी दवा के लिए आई थीं। मैंने दे दी।"
मैंने फ़ोन रखा।
"चल," मैंने कहा।
बाहर धूप ढल चुकी थी और गली का रंग सुनहरा हो गया था। दुकानों के शटर आधे गिरे थे। कोई औरत बाल्टी लेकर नल से लौट रही थी और मुझे देखकर रास्ता बदल गई। किसी ने मेरे नाम की तरफ़ उँगली नहीं उठाई, पर हवा में वो बात थी जो बोली नहीं जाती, सिर्फ़ सुनी जाती है।
मीरा मेरे बगल में चल रही थी। उसने अपना कैमरा थैले में रख दिया था। यह मैंने पहली बार देखा — बस्ती की आवाज़ का कैमरा उसके कंधे पर नहीं था।
"तू कैमरा क्यों छोड़ गई?" मैंने पूछा।
"क्योंकि जहाँ जा रही हूँ," उसने कहा, "वहाँ कोई रिकॉर्ड नहीं होगा।"
हम सुनीता दीदी के क्वार्टर के सामने से गुज़रे। वो नल पर बर्तन धो रही थी। उसने मुझे देखा और फिर मीरा को देखा।
"कहाँ जा रही हो, बहन?" उसने पूछा।
मीरा रुक गई। "माफ़ी माँगने।"
सुनीता दीदी ने अपने हाथ लोटे पर पोंछे और पास आई। उसका चेहरा पिछले हफ़्ते से पतला लग रहा था — जबसे उसने वो दो हज़ार के बारे में कबूल किया था, गली उससे भी कटी हुई थी।
"सुन," उसने मीरा से कहा। "माफ़ी माँगते वक़्त सबसे मुश्किल चीज़ ये होती है कि तू अपनी तरफ़ से कोई लाइन मत जोड़ना। न 'पर मेरे साथ ऐसा हुआ था', न 'मुझे ग़लत बताया गया'। जब मैंने सभा में खड़े होकर कहा, तो मैंने बस ये कहा — मैंने ये किया, और ये ग़लत था। जिस दिन मैंने वो लाइन नहीं जोड़ी, उस दिन मेरा बेटा मेरे साथ वापस खाने बैठा।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा।
"आपने कैसे किया?" उसने पूछा।
"डर के साथ किया," सुनीता दीदी ने कहा। "और फिर डर खत्म हो गया। इसलिए कहती हूँ — डर कोई पहाड़ नहीं होता, बहन। वो बस सीढ़ी की पहली पायदान पर बैठा रहता है। चढ़ जाओ, वो पीछे रह जाता है।"
मीरा ने सिर हिलाया।
और हम चले।
स्कूल का गेट दोपहर में खुला रहता था, पर उस वक़्त बच्चे घर जा चुके थे और आँगन सूना था। दो कुर्सियाँ दीवार के सहारे रखी थीं। दूर नीम के नीचे झाड़ू पड़ी थी। अंदर से आवाज़ आ रही थी — रैक खिसकने की, काग़ज़ों के बंडल गिरने की, किसी के खाँसने की।
मीरा गेट के पास रुक गई।
"मैं नहीं कर पाऊँगी," उसने कहा।
"तू करेगी," मैंने कहा।
"नहीं, अंकुश। मैं सोच रही थी कि मैं क्या कहूँगी। और मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ एक चीज़ आ रही है — कि मैं उनसे कहूँ कि मेरी नौकरी जाने का डर था। और जिस दिन मैंने ये सोचा, मुझे लगा कि मैं फिर से अपनी सफ़ाई कर रही हूँ।"
"तो वो मत कहना," मैंने कहा।
"फिर क्या कहूँ?"
"सच," मैंने कहा। "बस सच। जो कल रात तूने मुझसे कहा था — कि मैंने सच छिपाया, क्योंकि सच ये था कि मेरी खबर सही थी पर अधूरी। वो कह देना। कोई कहानी मत बनाना। और अगर वो बीच में रोक दें, तो रुक जाना। उन्हें बोलने देना। लोगों को माफ़ी से ज़्यादा यही चाहिए होता है कि उन्हें बोलने दिया जाए।"
मीरा ने लिफ़ाफ़ा निकाला। उसके हाथ में काँप रहा था।
मेरी जेब में घंटी गुनगुनी हो रही थी। उसने एक शब्द नहीं कहा। बस मुझे ऐसा लगा जैसे एक बच्चा नींद में करवट बदलकर लेट गया हो, ताकि जगा न रहे।
"अंकुश," मीरा ने कहा, "अगर वो मुझे माफ़ कर दें, तो क्या मेरा नाम काग़ज़ से मिट जाएगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "काग़ज़ से नाम नहीं मिटता। पर उसके नीचे एक नई लाइन जुड़ जाती है। और कभी-कभी वही लाइन काफ़ी होती है।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। एक बार हल्का सा।
"चल," मैंने कहा। "मैं सामने नहीं जाऊँगा। पीपल की सीढ़ी पर खड़ा रहूँगा। अगर वो चीखें भी दें, तो भी मैं बीच में नहीं आऊँगा। पर मैं वहाँ रहूँगा।"
मीरा ने एक लंबी साँस ली और गेट के अंदर कदम रखा। धूल में उसके जूतों के नीचे सूखी मिट्टी चरमराई। वो पाँच-छह कदम गई और फिर रुक गई, जैसे उसकी टाँगें खुद फ़ैसला कर चुकी हों कि आगे नहीं जाना।
और ठीक उसी वक़्त स्कूल का दरवाज़ा अंदर से खुला।
रमा मैडम बाहर आईं। उनके हाथ में कपड़े का मोटा बंडल था — तीन फाइलें, कुछ रस्सी से बँधी हुईं, और ऊपर एक पीली जिल्द वाला रजिस्टर। उनके चश्मे पर धूल थी और बालों से एक लट खुली आ रही थी। उन्होंने एक हाथ से दरवाज़ा पकड़ा और हवा में उन्हें ठीक से देखा।
फिर उनकी नज़र मीरा पर पड़ी।
वो वहीं रुक गईं।
उनके चेहरे पर पहले कुछ नहीं था — एक खाली पल। फिर उस पल में एक और नाम नहीं आया, कोई इल्ज़ाम नहीं आया, कोई पुरानी गाली नहीं आई। सिर्फ़ पाँच साल जैसे एक साथ आकर उनके कंधों पर बैठ गए।
और फिर उन्होंने कहा —
"तुम अब भी यहीं हो?"
॥
मीरा एक कदम पीछे हट गई।
ऐसे हटी जैसे कोई चीज़ गिरने से बचाने के लिए हाथ आगे कर देता है, पर खुद उस चीज़ को छूने से डरता है। उसका हाथ लिफ़ाफ़े पर था और लिफ़ाफ़ा सीने से चिपका हुआ। रमा मैडम दरवाज़े के फ्रेम में खड़ी रहीं। उन्होंने बंडल को दोनों हाथों से सँभाला था, जैसे वो अब उनके हाथ से निकले तो सब बिखर जाएगा।
पीपल की सीढ़ी पर मैं खड़ा था। सात कदम दूर। मैंने कहा था कि बीच में नहीं आऊँगा, और मैं आया नहीं। पर जब मीरा हटी, तो मेरे पैरों ने अपने आप एक पायदान नीचे उतरना चाहा। मैंने हाथ से सीढ़ी की रेल पकड़ ली।
"मैडम," मीरा ने कहा। आवाज़ निकली पर टूटी हुई।
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