The Mysterious Bell – Chapter 1175
मीरा ने कैमरा कंधे से उतारा और बेंच पर रख दिया।
"अंकुश," उसने कहा। "मुझे तेरी दुकान चलनी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं यहाँ खड़ी नहीं रह सकती।"
हम चुपचाप स्कूल से निकले। गली में उस वक़्त कोई नहीं था। पीपल के नीचे धूल का वो चौकोर निशान अब भी था, जहाँ कल दरोगा ने मेज़ उठवाई थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा ही नहीं। मैंने शटर उठाया। कोयले से लिखा मेरा नाम अब भी वहीं था — अंकुश यादव, साइकिल मरम्मत, और नीचे दो शब्द, टूटा लाओ।
मीरा उन दो शब्दों पर रुक गई।
"तूने मिटाया नहीं," उसने कहा।
"मिटाने से क्या होता है," मैंने कहा। "मिटाने वाले ही नाम बड़ा करते हैं।"
हम दुकान के पीछे वाले कमरे में गए। बल्ब गुनगुना रहा था। चारपाई पर धूल की पतली परत थी। औज़ारों का ट्रंक खुला था और उसके पीछे वाली ईंट के नीचे वो चालीस साल पुराना रजिस्टर छिपा था, जिसमें कटे हुए नाम बोलते थे। कोने में टिंकू की खाली स्टूल रखी थी। आज सुबह से कमरे में एक चीज़ कम थी — उसके हाथ का शोर। कान को वो शोर अब भी सुनाई देता था, और आँख को वो जगह खाली दिखती थी।
मीरा चारपाई पर बैठ गई। मैं उसके सामने वाले लकड़ी के स्टूल पर बैठा।
दस मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर उसने अपना कपड़े का थैला खोला।
उसमें से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। पीला पड़ चुका था। किनारे फटे हुए थे, और बीच में मोड़े जाने की तीन सीधी लकीरें बन गई थीं।
उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पढ़," उसने कहा। "ये मेरी पहली खबर है।"
खबर की हेडलाइन बड़े अक्षरों में थी — शिक्षिका पर दाख़िले के पैसे लेने का आरोप।
और उसके नीचे एक तस्वीर थी। तस्वीर में एक औरत स्कूल के गेट पर खड़ी थी, चश्मा पहने, हाथ में रजिस्टर। तस्वीर पीछे से खींची गई थी — औरत को पता भी नहीं था। उसके नीचे मीरा तिवारी का नाम छपा था।
और सबसे नीचे, छोटे अक्षरों में एक लाइन थी — आरोप अब तक साबित नहीं।
मैंने काग़ज़ मोड़कर रख दिया।
"बताओ," मैंने कहा।
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
"पाँच साल पहले," उसने कहा, "मैं उस अखबार में नई थी। छह महीने भी नहीं हुए थे। मुझे छोटी-छोटी खबरें दी जाती थीं — कोई नल टूटा, कोई बिजली गई, कोई सड़क टूटी। और मैं हर खबर का पीछा इस तरह करती थी जैसे मेरी जान उसी में बंधी हो।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरे पास और कुछ नहीं था। मैं बस्ती से आई थी। मेरी माँ ने मेरी पढ़ाई के लिए दो कमरों का मकान गिरवी रखा था। और मुझे लगता था कि अगर मैं दो महीने में बड़ी खबर नहीं लाई, तो मुझे निकाल देंगे।"
वो रुकी।
"फिर एक दिन एक आदमी ने दफ़्तर में फोन किया। उसने नाम नहीं बताया। उसने सिर्फ़ इतना कहा — नूर अस्पताल के पास वाले सरकारी स्कूल में एक मैडम हैं, रमा। उन्होंने चार बच्चों के दाख़िले के लिए पैसे लिए हैं।"
"तूने कितने?"
"चार हज़ार पाँच सौ।"
"तूने उनसे पूछा?"
"मैंने फोन किया। उन्होंने नहीं उठाया। तीन दिन तक नहीं उठाया।"
"फिर?"
"फिर मेरे एडिटर ने उन्हें फोन किया। मैं पास खड़ी थी। उन्होंने कहा — 'जो लिखना है लिख लो, पर मैं तुमसे एक बात कहूँगी — वो पैसा दाख़िले का नहीं था।' और एडिटर ने फोन काट दिया।"
मेरी जेब में घंटी थी। वो ठंडी थी, पर मुझे लगा जैसे उसने अंदर ही अंदर साँस भरी हो।
"तूने उस लाइन को क्यों नहीं पकड़ा?" मैंने पूछा। "वो बोल रही थीं — वो पैसा दाख़िले का नहीं था।"
"क्योंकि मैंने उस लाइन को एक इंकार समझा," मीरा ने कहा। "मुझे लगा वो बच रही हैं। और मुझे लगा कि अगर मैं इस खबर को पकड़ लूँ, तो मेरा नाम एक रात में बड़ा हो जाएगा।"
"और क्या हुआ?"
"पहले दिन सब खुश थे। एडिटर ने मेरी पीठ थपथपाई। मेरी माँ ने वो कतरन काटकर स्टील के डिब्बे में रख ली। और मैं सारी रात जागकर सोचती रही कि मैंने कितना बड़ा काम किया है।"
अब उसकी आवाज़ टूटने लगी थी।
"चौथे दिन एक टीचर ने मुझे फोन किया। उन्होंने रोते हुए कहा — 'बेटा, वो पैसे दाख़िले के नहीं थे। उस स्कूल में अमन नाम का लड़का पढ़ता है — रिक्शा चलाने वाले का बेटा। उसके दिल में छेद था। ऑपरेशन के लिए पैसे नहीं थे। रमा मैडम ने सारे टीचरों से, माँ-बाप से, मोहल्ले से चार हज़ार पाँच सौ जोड़े थे। और वो पैसे अस्पताल पहुँचा कर आई थीं।'"
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसल गया। मैंने उसे उठाया।
"अमन?" मैंने कहा। "क्या वो —"
"वो ज़िंदा है," मीरा ने कहा। "अब दसवीं में है। उसका ऑपरेशन हो गया। टीचरों ने दोबारा पैसे जोड़े। वो अब भी उसी स्कूल में पढ़ता है और मैं जब भी उस गली से गुज़रती हूँ, मैं उसे देखती हूँ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"और ये सबसे बड़ी सज़ा है," उसने कहा। "कि जिस बच्चे की जान बची, उसकी खबर किसी ने नहीं छापी। मैंने नहीं छापी। क्योंकि उस खबर में मेरा नाम नहीं बनता था।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
बेंच के नीचे से कहीं चूहे की खुरचने की आवाज़ आई। बल्ब एक बार झपका और फिर जल गया।
"और रमा मैडम?" मैंने पूछा।
मीरा ने मुँह फेर लिया।
"उनका नाम अखबार में छपा। उनकी तस्वीर छपी — बिना पूछे। अगले दिन उनकी बेटी स्कूल पहुँची तो बच्चों ने ताली बजाकर कहा — 'ओ चोर की बेटी।' बेटी ने दो दिन बाद स्कूल जाना बंद कर दिया। फिर कभी नहीं गई। उनकी बेटी की पढ़ाई वहीं रुक गई।"
"और उनके पति?"
"मुझे नहीं पता कि उस घर में क्या हुआ," मीरा ने कहा। "मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि उस साल के बाद वो घर टूट गया। एक कमरा उनका, एक बेटी का। उनके पति चले गए।"
"तूने माफ़ी माँगी?"
मीरा ने अपना थैला उठाया और उसमें से एक और काग़ज़ निकाला। यह काग़ज़ मुड़ा नहीं था, लिफ़ाफ़े में था। लिफ़ाफ़े पर नीली स्याही में लिखा था — रमा मैडम। और नीचे मेरा हस्ताक्षर। और लिफ़ाफ़े के कोने पर डाक का कोई टिकट नहीं था।
"ये मैंने उसी हफ़्ते लिखा था," उसने कहा। "और पाँच साल से अपने थैले में लिए घूम रही हूँ। कभी डाक में नहीं डाला। कभी हाथ से नहीं दिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे डर था," उसने कहा। "कि अगर वो मुझे माफ़ नहीं करेंगी तो?"
मैंने अपने घुटनों पर हाथ रखे। ग्रीस के निशान अब भी उन पर थे, और आज सुबह के बाद मुझे लग रहा था कि मेरे हाथों से ज़्यादा गंदा तो कोई और चीज़ है — जिसे मैं पाल रहा हूँ और नाम दे रहा हूँ, मेहनत।
"सुन," मैंने कहा। "मैं तुझे एक बात बताता हूँ। ये घंटी मुझे किसी ने तोहफ़े में नहीं दी। ये मेरे काम से चलती है। और मेरे काम का पहला नियम ये है — दो लोगों के बीच सच्ची माफ़ी और सच्चा भरोसा जुड़े, तभी कुछ जुड़ता है। झूठी माफ़ी से कुछ नहीं जुड़ता, कुछ भी नहीं।"
"मैं जानती हूँ," मीरा ने कहा। "तूने मुझे बताया था।"
"तो अब ये भी सुन," मैंने कहा। "जब तक तू अपनी गलती नहीं सुधारेगी, कोई भी जोड़ टिकेगा नहीं। तेरे हाथ से होकर जाने वाला हर जोड़। मेरा भी। इसकी भी।"
मीरा ने काग़ज़ की तरफ़ देखा।
"मेरी गलती सुधर सकती है क्या?" उसने कहा। "पाँच साल पहले का अखबार? वो काग़ज़ जो किसी ने फाड़ दिया, किसी ने सहेजा नहीं? उनका चला हुआ घर? उनकी रुकी हुई बेटी?"
"नहीं," मैंने कहा। "वो सुधरने वाली चीज़ है ही नहीं।"
वो रुक गई।
"पर एक चीज़ सुधर सकती है," मैंने कहा। "तेरा अगला काग़ज़।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno