The Mysterious Bell – Chapter 1174
"तुम अंकुश हो," उन्होंने कहा। आवाज़ शांत थी, पर भारी। "मुझे पता है। मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।"
"कैसे?"
उन्होंने फाइल खोली। उसमें से एक काग़ज़ निकाला — पीला, मुड़ा हुआ, कोने से जला हुआ।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "मेरे पास वो काग़ज़ है जो तुम्हारी माँ के इलाज का पूरा हिसाब रखता है। और उस पर तुम्हारे पिता का नहीं — तुम्हारे दादा का नाम है।"
मैंने काग़ज़ देखा।
और मेरे हाथ काँपने लगे।
क्योंकि उस काग़ज़ पर — साफ़ नीली स्याही में — बिल्कुल वही निशान था जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था, जो घंटी के छल्ले पर था, जो बिजलीघर के बक्से पर था।
दो लकीरें। और बीच में एक बिंदु।
और उस निशान के नीचे लिखा था — "जो जोड़ता है, उसका नाम सबसे पहले लिखा जाता है।"
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
"ये निशान," मैंने कहा। "आपको कहाँ से मिला?"
उन्होंने चश्मा उतारा।
"ये निशान," उन्होंने धीरे कहा, "मेरे पति के हाथ का है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। स्कूल के आँगन में पतंग की डोर किसी दूर छत पर खिंचने की आवाज़ आई।
"आपके पति?" मैंने कहा।
"हाँ," उन्होंने कहा। "मेरे पति साइकिल मिस्त्री थे। पुराने बाज़ार में। उनका नाम था — शंकरलाल।"
मेरे हाथ से काग़ज़ छूटते-छूटते बचा।
क्योंकि अब मैं जानता था — वो नाम जो पेचकस के हत्थे में मिला था, वो नाम जो मैंने कहीं सुना था।
शंकरलाल।
पापा का बड़ा भाई।
और मेरे पिता का नाम भी शंकर है।
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
"आप मेरी चाची हैं?"
रमा मैडम ने फाइल बंद की।
"नहीं," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हारी चाची नहीं हूँ।"
वो रुकीं।
"मैं तुम्हारी दादी की बहू हूँ," उन्होंने कहा। "और तुम्हारे दादा जगदीश यादव ने, मरने से पहले, मुझे वो काग़ज़ दिया था जिसके बिना तुम्हारी माँ का इलाज आज तक अधूरा है।"
मैं वहीं खड़ा रहा।
स्कूल का आँगन। पीपल की छाया। बच्चों की आवाज़ें दूर। और सामने — एक औरत, जो पाँच साल से बाहर थी, और जो अब लौटी थी — और जो मेरे ही खून की थी, पर मैंने उसे कभी नहीं देखा था।
"आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा।
"किसको?" उन्होंने कहा। "तुम्हारे पिता को? जो चुप रहते हैं? या तुम्हारी माँ को? जो बीमार हैं? या तुम्हें? जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे?"
"तो अब क्यों?"
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "अब वो काग़ज़ खुद मेरे पास आ गया है। और जब किसी काग़ज़ को चालीस साल तक छिपाया जाए, और वो खुद बाहर आ जाए, तो इसका मतलब है कि अब वो छिप नहीं सकता।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो गेट के बाहर खड़ी थी, हाथ में कैमरा, आँखों में पानी।
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
"एक सवाल है," मैंने कहा।
"पूछो।"
"मीरा," मैंने कहा। "आपने उसे कभी माफ़ किया?"
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर देखा।
फिर उन्होंने धीरे से कहा —
"मैंने उसे माफ़ नहीं किया।"
वो मुड़ीं। आँगन के उस पार, पीपल के नीचे, एक बेंच थी। वो वहाँ गईं और बैठ गईं।
फिर बोलीं —
"मैंने उसे माफ़ नहीं किया। मैंने खुद को माफ़ नहीं किया। क्योंकि मैंने उस खबर के बाद कुछ नहीं किया। मैंने नहीं कहा कि वो आधी सच थी। मैंने नहीं कहा कि मेरे पति चले गए, पर मैंने उन्हें रोका नहीं। मैं चुप रही। और पाँच साल मैंने यही सोचा कि मैं उस लड़की से ज़्यादा दोषी हूँ, क्योंकि उसने खबर छापी, और मैंने सच छिपाया।"
मीरा गेट से अंदर आई। उसके कदम धीमे थे।
"तो आपने सच क्यों छिपाया?" उसने पूछा।
रमा मैडम ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि सच ये था," उन्होंने कहा, "कि तुम्हारी खबर सही थी — पर अधूरी। और मैंने उसे अधूरा ही रहने दिया। मैंने अपने पति से कहा — चुप रहो। और वो चुप रहे। और फिर चले गए।"
मीरा की आँखों से पानी बह चला।
मैंने आगे बढ़कर कहा —
"रमा मैडम, आपके पास जो काग़ज़ है, वो माँ की दवा से जुड़ा है। अगर आप उसे मुझे दें, तो मैं —"
"मैं तुम्हें देने नहीं आई," उन्होंने कहा।
मैं रुक गया।
"मैं इसे उस दिन वापस करने आई हूँ," उन्होंने कहा, "जिस दिन ये लिखा जाएगा कि इसे मैंने जलाया नहीं। और ये नाम मेरे पति ने नहीं काटा।"
उन्होंने चश्मा पहना।
"तुम्हारे दादा ने मुझे बचाया था," उन्होंने कहा। "जिस रात वो काग़ज़ बनाया जा रहा था, उस रात मेरे पति वहाँ थे। और उन्होंने मुझसे कहा था — 'रमा, इसे ताले में रख दो। जिस दिन ये खुले, उस दिन मेरा भाई भी खुलेगा।'"
"आपके पति का भाई?"
"शंकर," उन्होंने कहा। "तुम्हारे पिता।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"मेरे पिता?" मैंने कहा। "मेरे पिता का इससे क्या —"
"तुम्हारे पिता वहाँ थे," रमा मैडम ने कहा। "उस रात। जब काग़ज़ लिखा जा रहा था। तुम्हारे पिता ने अँगूठा नहीं लगाया था — उन्होंने रोका था। और उसी रात के बाद, उन्होंने चुप रहना शुरू कर दिया था।"
मैं वहीं बैठ गया।
स्कूल के आँगन में। पीपल के नीचे। एक पुरानी बेंच पर।
और मीरा मेरे पास बैठ गई।
हम दोनों चुप थे।
फिर मैंने धीरे से कहा —
"तो मेरे पापा चुप नहीं थे। वो चुप कर दिए गए थे।"
"हाँ," रमा मैडम ने कहा।
"और जिसने उन्हें चुप कराया," मैंने कहा, "वो आज भी गली में है।"
"हाँ।"
मैंने सिर उठाया।
"तो चलिए," मैंने कहा। "अब मैं उसे नाम से बुलाऊँगा।"
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"उस आदमी को," मैंने कहा। "आज शाम पाँच बजे, पीपल के नीचे, उसने भारद्वाज ट्रस्ट की सभा बुलाई है। मैं वहाँ जाऊँगा। और मैं पूछूँगा — उस रात कौन था?"
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा।
"और आप," मैंने कहा, "आज शाम वहाँ होंगी? क्योंकि अगर आप वहाँ नहीं होंगी, तो मेरी बात आधी रहेगी।"
रमा मैडम ने फाइल बंद की।
"मैं वहाँ होऊँगी," उन्होंने कहा। "पर मेरे साथ एक औरत भी होगी।"
"कौन?"
"जिसने पाँच साल पहले मीरा को फोन किया था," उन्होंने कहा। "वो मेरी बेटी है। और वो भी अब लौट आई है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उसकी आँखों में — पहली बार — डर के साथ-साथ कुछ और था।
हिम्मत।
मैंने हाथ बढ़ाया।
"तो चल," मैंने कहा। "पाँच बजे तक हमें एक-एक औरत को तैयार करना है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
और पीछे से — बहुत दूर से — मुझे घंटी की आवाज़ सुनाई दी।
एक बार।
बस एक बार।
जैसे किसी ने धीरे से कहा हो — मैं जाग रही हूँ।
॥
रमा मैडम ने चश्मा उतारकर कमीज़ के पल्लू से पोंछा और फिर पहन लिया। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
"पाँच बजे," उन्होंने कहा। "मैं अपनी बेटी के साथ आऊँगी। और वो काग़ज़ भी लाऊँगी। असली वाला।"
"मैडम —" मीरा ने कुछ कहना चाहा।
"अभी नहीं," रमा मैडम ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। "अभी मुझे स्टोर से तीन फाइलें निकालनी हैं। पाँच साल से वहीं पड़ी हैं। उनमें से एक बहुत भारी है।"
वो स्कूल के अंदर चली गईं। दरवाज़ा उनके पीछे बंद हुआ और गेट का पुराना कब्ज़ा बूढ़े आदमी की खाँसी जैसी आवाज़ करके रह गया।
मैं और मीरा आँगन में खड़े रहे।
दोपहर ढल रही थी। पीपल की परछाईं दीवार से सरककर आँगन के बीच आ गई थी। जहाँ छत से प्लास्टर गिरा था, वहाँ अब भी सफ़ेद धूल जमी थी, और उसी धूल में किसी बच्चे के नंगे पैरों के निशान थे — जैसे कोई भागते-भागते पीछे मुड़कर देखा हो और फिर भाग गया हो।
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