The Mysterious Bell – Chapter 1173
मैंने रजिस्टर के पन्ने पलटने शुरू किए।
पाँचवाँ, छठा, सातवाँ।
नाम — कटे हुए। रकमें — अधूरी। तारीख़ें — मिटी हुईं।
फिर आठवाँ पन्ना।
पूरा पन्ना जगह-जगह से छेदा हुआ। जैसे किसी ने सुई से बार-बार छेदा हो। और छेदों के नीचे एक छोटा वाक्य लिखा था —
"जो जोड़ता है, उसका नाम सबसे पहले लिखा जाता है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"उस्ताद," मैंने कहा। "ये वही लाइन है जो माँ की कॉपी में थी। और जो उस पुरानी पीली सूचना पर थी।"
उस्ताद ने देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
"ये नहीं हो सकता," उन्होंने धीरे कहा। "ये लाइन तो —"
"क्या?"
"ये लाइन मेरी माँ की लिखाई है," उन्होंने कहा।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
डॉक्टर इसरानी पीछे झुक गए।
"तेरी माँ?" उन्होंने कहा। "पचास साल पहले?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "मेरी माँ सिलाई करती थीं। और जब भी कोई काग़ज़ आता, वो कहती — 'जो जोड़ता है, उसका नाम सबसे पहले लिखा जाता है।' हमें लगता, माँ पागल है। पर आज ये लाइन… ये रजिस्टर में…"
उन्होंने रजिस्टर को अपनी तरफ़ खींचा। काँपते हाथों से पन्ना उलटा।
और पीछे — उस पन्ने के बैक साइड — कुछ नीली स्याही में लिखा था। बहुत पुरानी स्याही, फीकी, पर पढ़ी जा सकती थी।
"इलाही," उस्ताद ने पढ़ा। "ये नाम… मैंने नहीं करवाया… मैंने बस… मैंने बस उस लालची की बात मान ली…"
उन्होंने रजिस्टर बंद कर दिया। एकदम से।
"उस्ताद," मैंने कहा। "ये आपकी लिखाई है?"
"मैंने रजिस्टर में कुछ नहीं लिखा," उन्होंने कहा, आँखें बंद किए हुए। "ये किसी और ने लिखा है। और ये लिखने वाला मेरी माँ की लिखाई की नक़ल कर रहा था — ताकि मैं इसे पढ़ूँ, और मुझे लगे कि मैंने ही लिखा है।"
"क्यों?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार गुस्सा आया, "जो आदमी अपने भाई के नाम कटे हुए देखकर खुद पर शक करने लगे, वो किसी और को सवाल पूछने का हक़ नहीं देगा।"
वो खड़े हो गए। कुर्सी पीछे खिसकी।
"मैं आज यहाँ से बहुत कुछ लेकर जा रहा हूँ," उन्होंने कहा। "पर सबसे बड़ी चीज़ — ये कि मेरा भाई चालीस साल से काग़ज़ पर मरा हुआ है। और मैं उसे काग़ज़ से हटाएगा — चाहे जो हो जाए।"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। पर दरवाज़े तक पहुँचने से पहले — दरवाज़ा खुद खुला।
मीरा अंदर घुसी। उसका चेहरा लाल था। उसने हाँफते हुए कहा —
"अंकुश — स्कूल — स्कूल गई थी। हेडमिस्ट्रेस —"
"क्या?"
"रमा मैडम," मीरा ने कहा। "वो वापस आ गई हैं। आज सुबह।"
मैं ठिठक गया।
"रमा मैडम?"
"हाँ।" मीरा ने सामने देखा — उस्ताद को, डॉक्टर इसरानी को, रजिस्टर को मेज़ पर पड़ा हुआ। फिर मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें भर आई थीं।
"अंकुश," उसने धीरे कहा। "वही रमा मैडम — जिनका घर मेरी एक आधी सच खबर ने बिखेरा था।"
कमरा चुप हो गया।
डॉक्टर इसरानी ने धीरे से कुर्सी छोड़ी।
उस्ताद ने अपना काग़ज़ जेब में रखा।
और मैंने मीरा को देखा — उसकी आँखों में वो सब था जो वो पाँच साल से किसी को नहीं बता पाई थी।
"मीरा," मैंने कहा। "बैठ।"
"मैं बैठने नहीं आई," उसने कहा। "मैं बताने आई हूँ। वो स्कूल में है। और उसने स्कूल के गेट पर एक नोटिस लगाया है — पुराने सभी काग़ज़ माँगे गए हैं। और जो भी उससे मिलने जाए, उसे सब बताना पड़ेगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तो चल," मैंने कहा।
"कहाँ?"
"स्कूल," मैंने कहा। "पर पहले — तू मुझे ये बता कि रमा मैडम के बारे में मुझे क्या पता होना चाहिए, जो मुझे नहीं पता।"
मीरा ने होंठ सिकोड़े। फिर बोली —
"तू जानता है कि मैंने उनके बारे में खबर छापी थी। तू जानता है कि वो खबर आधी सच थी।"
"और?"
"और ये कि रमा मैडम पाँच साल से शहर से बाहर थीं। उनका घर बिखर गया था — पति चले गए, बेटी ने स्कूल बदल लिया, और वो खुद गाँव चली गईं।"
"तो अब क्यों लौटीं?"
मीरा ने उस्ताद की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"क्योंकि," उसने धीरे कहा, "जिस काग़ज़ को उन्होंने पाँच साल पहले बचाया था, वो आज खुद उनके दरवाज़े पर आ गया है।"
"कौन सा काग़ज़?"
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें से एक मुड़ा हुआ पीला काग़ज़ निकाला। उस्ताद की तरफ़ बढ़ाया।
"ये मुझे अस्पताल के बाहर एक औरत ने दिया," उसने कहा। "उसने कहा कि ये रमा मैडम के पास से आया है, और अब मेरे पास है।"
उस्ताद ने काग़ज़ खोला।
उस पर सिर्फ़ तीन लाइनें थीं — नीली स्याही में, काँपती लिखाई में। और नीचे एक नाम।
"अंकुश," उस्ताद ने धीरे से कहा। "ये नाम देख।"
मैंने देखा।
उस काग़ज़ पर लिखा था — "जो लड़का साइकिल गली में घंटी बजाता है, उससे कहना — तुम्हारी माँ की दवा किसी और की जेब से आती है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"कौन सा नाम?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने काग़ज़ घुमाया। नीचे के कोने पर छोटे अक्षरों में लिखा था —
"रमा।"
मीरा ज़ोर से साँस ली।
"तो वो जानती है," उसने कहा। "वो जानती है माँ की दवा के बारे में।"
"वो सब जानती है," डॉक्टर इसरानी ने कहा, जो अब तक चुप खड़े थे। "क्योंकि स्कूल की हेडमिस्ट्रेस रही है। और स्कूल की हेडमिस्ट्रेस को वो सब पता होता है जो बच्चों के माँ-बाप को पता होता है।"
वो मेरी तरफ़ आए।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "ये रजिस्टर तेरे पास है। और आज तू जो करने जा रहा है, वो कर। पर एक बात याद रख — रमा मैडम के पास जाने से पहले, तू ये सोच ले कि तू उनसे क्या पूछेगा।"
"मैं पूछूँगा," मैंने कहा, "कि उन्होंने ये काग़ज़ किसको दिया था, और क्यों।"
"और अगर वो नहीं बताएँ?"
"तो मैं उनसे वो सवाल पूछूँगा जो मीरा नहीं पूछ पाई," मैंने कहा। "मैं पूछूँगा — जब उनका घर बिखरा, तो उन्होंने उस खबर के बाद क्या किया? क्या उन्होंने किसी को माफ़ किया? या वो भी चुप हो गईं?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर होंठ कसे हुए थे।
"अंकुश," उसने कहा। "मैं तेरे साथ चलूँगी।"
"तू साथ नहीं चलेगी," मैंने कहा।
वो चौंकी।
"क्यों?"
"क्योंकि अगर तू सामने खड़ी होगी," मैंने कहा, "तो रमा मैडम तेरी तरफ़ देखेंगी। और मैं नहीं चाहता कि वो तेरी तरफ़ देखें। मैं चाहता हूँ कि वो मेरी तरफ़ देखें।"
"पर —"
"तू दरवाज़े के बाहर रहेगी," मैंने कहा। "अगर मैं अंदर से बुलाऊँ, तब अंदर आएगी।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा। फिर रुक गई। फिर सिर हिलाया।
"ठीक है," उसने कहा। "पर एक बात —"
"क्या?"
"जब तू उनसे मिले," उसने कहा, "तो उनसे ये मत कहना कि मैं तुझे भेज रही हूँ।"
हम नौ बजकर बीस मिनट पर स्कूल पहुँचे।
गेट पर वही लोहे का पुराना ताला लगा था — पर अब खुला हुआ। और गेट के अंदर, आँगन में, एक औरत खड़ी थी।
साड़ी — हल्के भूरे रंग की। बाल — कंधों तक कटे, पर कुछ सफ़ेद। चश्मा — काग़ज़ों पर झुका हुआ। हाथ में — एक फाइल।
वो हमारी तरफ़ मुड़ीं।
और मैंने देखा — उनकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो मैंने सोचा था। गुस्सा नहीं। डर नहीं। उनकी आँखों में थी — थकान। पाँच साल की थकान। और उस थकान के पीछे — एक चीज़ जो अभी भी ज़िंदा थी।
मीरा गेट के बाहर रुकी।
मैं अंदर गया।
"रमा मैडम?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno