The Mysterious Bell – Chapter 1172
"नहीं," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ उसे ज़ुबैदा बुलाऊँगा। और जब तक मैं उसे ज़ुबैदा बुलाता रहूँगा, तब तक उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा जाएगा।"
ज़ुबैदा ने कुछ कहना चाहा। पर फिर होंठ बंद कर लिए।
दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ।
मैं गली में लौटा। केतली खाली हो गई थी — मैंने चाय छोड़ दी थी।
पीछे मुड़कर देखा तो चौखट पर केतली नहीं थी।
अंदर ले जाई गई थी।
मैं मुस्कुराया।
सात बजकर पच्चीस मिनट।
सानिया के अब्बा का घर गली के दूसरे मोड़ पर है। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। तीन बार।
दरवाज़ा खुला। सानिया के अब्बा — काले रंग की शर्ट में, हाथ में अख़बार।
"तू?" उनके चेहरे पर नाराज़गी साफ़ थी।
"चाय लाया हूँ," मैंने कहा। "ज्यादा नहीं, बस एक गिलास।"
"चाय रख," उन्होंने कहा। "और सुन — तू मेरी बेटी से बात मत करना। वो बीमार है।"
"मैं उससे बात करने नहीं आया," मैंने कहा। "मैं तुमसे बात करने आया हूँ।"
"मुझसे?"
"हाँ। मैं जानना चाहता हूँ — जब तुम नल पर गुड्डू के पापा से भिड़े थे, तो तुम्हारे हाथ में बाल्टी थी। उसमें पानी था या गुस्सा?"
उनका चेहरा बदला।
"ये कैसा सवाल है?"
"सीधा सवाल है," मैंने कहा। "क्योंकि मैंने तुम्हें आधी बाल्टी पानी दी थी। और तुमने उसे ज़मीन पर फेंक दिया था। तुमने पानी नहीं फेंका — तुमने मेरी बात फेंकी थी।"
वो चुप रहे।
"मैं तुमसे सिर्फ़ एक बात पूछने आया हूँ," मैंने कहा। "क्या मैंने तुम्हारी बेटी को कभी कुछ गलत कहा है? क्या मैंने तुम्हारे घर में कभी कोई काग़ज़ दिया है? क्या मैंने तुम्हारे हाथ से कुछ छीना है?"
"नहीं," उन्होंने धीरे कहा।
"फिर तुम मुझसे क्यों डरते हो?"
"मैं नहीं डरता।"
"तुम डरते हो," मैंने कहा। "तुम डरते हो कि अगर तुमने मेरी बात मान ली, और बात सच निकली, तो तुम वो आदमी नहीं रहोगे जो तुम हो। तुम सोचते हो — अभी मैं गुस्से में हूँ, तो मैं सही हूँ। गुस्सा आदमी को सही बना देता है, ना?"
सानिया के अब्बा ने अख़बार मोड़ा।
"तू फ़िलॉसफ़ी मत दे," उन्होंने कहा, और दरवाज़ा बंद कर दिया।
दरवाज़ा मेरे मुँह पर बंद हुआ।
मैं चुपचाप खड़ा रहा। फिर धीरे से बोला —
"चाय अगर नहीं पीना, तो चौखट पर रख देता हूँ।"
अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
मैंने चाय की थैली उनके दरवाज़े के पास रखी और आगे बढ़ गया।
गुड्डू के पापा का घर गली के मोड़ पर है, जहाँ से स्कूल की गली निकलती है। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
इस बार दरवाज़ा खुला — पर गुड्डू के पापा के हाथ में अख़बार नहीं, एक छोटी बोतल थी। सुबह सात बजकर पैंतालीस। कोई सुबह-सुबह मुँह धोता है, कोई और चीज़।
"अंकुश?" उनकी आवाज़ में झिझक थी।
"चाय लाया हूँ," मैंने कहा।
"मैं चाय नहीं पीता सुबह।"
"तो कॉफ़ी पी लो," मैंने कहा। "पर कम से कम एक मिनट दरवाज़ा खुला रखो।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि कल तुमने नल पर कहा था कि मेरे पास जाने वाले का भरोसा खत्म हो जाता है। मैं जानना चाहता हूँ — क्या तुमने कभी मेरे पास कुछ जोड़ने के लिए कोई चीज़ लाई है? कोई टूटी चीज़? कोई टूटा रिश्ता?"
वो चुप रहे।
"मैंने सुना है," मैंने कहा, "कि तुम्हारे और सानिया के अब्बा के बीच पुराना झगड़ा है। कोई ज़मीन का? कोई रास्ते का?"
"वो मेरे बाप का ज़माना है," उन्होंने कहा। "तू उसको मत छेड़।"
"मैं नहीं छेड़ रहा," मैंने कहा। "मैं तो उसे जोड़ना चाहता हूँ। पर तुम दोनों मुझे ही क्यों देखते हो? तुमने मुझे देखा, और तुमने सोचा — ये आदमी अलग है। इसलिए इस पर ही सब गुस्सा निकाल दो।"
गुड्डू के पापा ने बोतल मेज़ पर रखी।
"तू जा अंकुश," उन्होंने कहा। "आज मुझे तेरी चाय नहीं चाहिए।"
दरवाज़ा बंद हुआ।
पहले घर से कम झटका लगा।
क्योंकि मैंने सीख लिया था — आज तीनों दरवाज़े बंद हो सकते हैं। और ये बंद होना भी कुछ है।
मैंने चाय की केतली उनके दरवाज़े के पास रखी।
आठ बजकर पैंतालीस मिनट।
अस्पताल का रिकॉर्ड कमरा। डॉक्टर इसरानी मेज़ पर बैठे थे। उनके सामने एक मोटा चक्करदार रजिस्टर खुला था — नहीं, वो चालीस साल पुराना कटा नाम वाला रजिस्टर नहीं था। ये रजिस्टर उन्होंने अलमारी से निकाला था — भूरी जिल्द, टूटे किनारे, कुछ पन्ने चिपके हुए।
"ये रजिस्टर मुझे चालीस साल पहले मिला था," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "जब मैं यहाँ नया डॉक्टर था। मुझे किसी ने दिया — किसने, याद नहीं। बस ये कहा था कि जब मन कड़ा हो, तब देखना।"
"आपने देखा?"
"कई बार। पर हिम्मत नहीं हुई।" उन्होंने रजिस्टर उठाया। "आज सुबह मैं इसे खोल ही रहा था कि उस्ताद आ गए।"
मैंने पीछे देखा — उस्ताद दरवाज़े पर खड़े थे। आज उन्होंने मोटा चश्मा पहना था, और हाथ में एक काग़ज़ था जो काँप रहा था।
"उस्ताद?"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस आगे आए और मेज़ के पास एक कुर्सी खींचकर बैठे।
डॉक्टर इसरानी ने रजिस्टर खोला।
पहला पन्ना — सूखा, पीला, कोने से टूटा हुआ। ऊपर लिखा था — "नूर अस्पताल — स्थानीय लोगों की सूची।"
दूसरा पन्ना — कुछ नाम, कुछ लकीरें। कुछ नामों के आगे लिखा था — "कटा।"
तीसरा पन्ना। चौथा। पाँचवाँ।
और फिर — वो पन्ना आया।
चिपका हुआ। पूरा पन्ना नहीं — एक पुराना काग़ज़, किसी ने जल्दी में चिपकाया था, चिपकाने की स्याही सूखी नहीं थी, काग़ज़ की तहें उभरी हुईं थीं।
उस पर लिखा था — एक नाम, एक तारीख़, और नीचे एक लकीर।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
डॉक्टर इसरानी ने चश्मा ठीक किया।
"ये पुराना काग़ज़ नहीं है," उन्होंने कहा। "ये जान-बूझकर चिपकाया गया है। अगर उतारा जाए, तो नीचे कुछ और निकलेगा।"
उस्ताद ने आगे झुककर देखा। उनका चेहरा एकदम से पीला पड़ गया।
"उस्ताद?" मैंने कहा।
उन्होंने रजिस्टर में एक जगह उँगली रखी। वो उँगली काँप रही थी।
"ये देख," उन्होंने धीरे कहा।
मैंने देखा। उस पन्ने पर चार नाम काटे हुए थे — काली स्याही से, मोटी लकीर। पहला नाम — "रामदीन तेली।" दूसरा — "बंसीधर सेठ।" तीसरा — "किशनलाल।" चौथा — और उस्ताद की उँगली वहीं रुकी।
"इलाही बक्श," मैंने पढ़ा।
उस्ताद ने हाथ खींच लिया। उन्होंने चश्मा उतारा। आँखें मूंद लीं।
"मेरा भाई," उन्होंने कहा। आवाज़ रुँध गई थी। "मेरा छोटा भाई।"
डॉक्टर इसरानी ने कुछ कहना चाहा, पर उस्ताद ने हाथ उठाया — रुक जाओ।
"चालीस साल," उस्ताद ने कहा, आँखें बंद रखे हुए। "मैंने सोचा, वो बस चला गया। दूर कहीं। किसी और शहर में। मुझसे झगड़कर। और ये नाम — ये नाम मेरी नज़र से कभी नहीं गुज़रा। क्योंकि मैंने रजिस्टर कभी खोला ही नहीं।"
"तुमने नहीं खोला," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "पर किसी ने खोला था। और किसी ने इस नाम को काटा।"
"किसने?"
"वही जिसने चालीस साल बाद आज भी अपना नाम नहीं कटने देता," डॉक्टर इसरानी ने कहा।
मैंने रजिस्टर में देखा। कटे नामों के नीचे एक खाली जगह थी — और उस जगह पर एक पुराना गोल निशान था। मुहर नहीं — मुहर जैसा निशान। जैसे किसी ने अँगूठा लगाया हो, फिर मिटाने की कोशिश की हो।
"ये किसका है?" मैंने पूछा।
"ये सवाल का जवाब इसी रजिस्टर में है," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "पर उसके लिए हमें इस रजिस्टर के आख़िरी पन्ने तक पहुँचना होगा। और मुझे लगता है कि आख़िरी पन्ने पर वो नाम है जो चालीस साल से इस अस्पताल की दीवारों में चुपचाप बैठा है।"
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