The Mysterious Bell1171 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1171

6 min read November 5, 2026

"उस्ताद," मैंने कहा। "आपको एक बात कहनी है?"

"हाँ," उन्होंने कहा। "पर आज नहीं। आज मैंने अपने भाई का नाम काग़ज़ पर कटा देखा है। आज मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा — चालीस साल पहले जिसने ये नाम काटा था, वो आज भी शहर में साँस ले रहा है। और जो आदमी चालीस साल तक अपना नाम कटा हुआ देखकर भी नहीं बोलता, वो बहुत बड़ा हिसाब लेकर बैठा है।"

वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। दरवाज़े पर पहुँचकर रुके।

"अंकुश।"

"हाँ उस्ताद।"

"तेरा नाम कल शटर से मिटाया गया था," उन्होंने मेरी तरफ़ पीठ किए हुए कहा। "और आज तूने उसे कोयले से फिर लिखा। ये सही किया। पर अब तू उसे अगले हफ़्ते तक कोयले से ही मत लिखता"…अब तू उसे अगले हफ़्ते तक कोयले से ही मत लिखता।"

उस्ताद दरवाज़े से बाहर निकल गए। उनकी चप्पल की आवाज़ गलियारे में धीरे-धीरे दूर होती गई।

मैं रजिस्टर हाथ में लिए खड़ा रहा। डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा, कुछ कहने ही वाले थे कि मैंने कहा —

"डॉक्टर साहब, ये रजिस्टर मैं आज रात अपने पास नहीं रखूँगा।"

"तो कहाँ रखेगा?"

"दुकान के पीछे वाले कमरे में, औज़ारों के ट्रंक के नीचे एक जगह है — ईंट उठती है। वहाँ रख दूँगा। पर सुबह नौ बजे मैं इसे आपके पास वापस लाऊँगा।"

डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर धीरे से मुस्कुराए।

"तू डरता है कि रात में कोई तेरी दुकान में आ सकता है।"

"मैं डरता हूँ कि रात में कोई मेरे से पहले सोच सकता है," मैंने कहा।

"ठीक है," उन्होंने कहा। "पर सुबह नौ बजे। एक मिनट देर मत करना।"

"क्यों?"

"क्योंकि सुबह नौ बजे वो औरत भी आएगी — जिसका नाम इस रजिस्टर में कटा हुआ है। उसका नाम है रमा। और उसने मुझे आज रात फोन किया था।"

मैं रुक गया।

"रमा?"

"स्कूल की पुरानी हेडमिस्ट्रेस," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "जिसके बारे में मीरा हर बार बात करते वक़्त चुप हो जाती है। वो आज फोन पर सिर्फ़ तीन शब्द बोली — 'मैं लौट आई।' और फिर फोन काट दिया।"

मैंने रजिस्टर अपनी छाती से लगाया।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा। "आज रात मैं ज़ुबैदा के दरवाज़े पर क्या कहूँ?"

"तू क्या कहना चाहता है?"

"मैं उससे कहना चाहता हूँ कि उसका नाम ज़ुबैदा है, और वो मेरी गली की सबसे बहादुर औरत है," मैंने कहा।

डॉक्टर इसरानी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"तो कह दे," उन्होंने कहा। "पर याद रख — कहने से पहले उसका दरवाज़ा खुलना चाहिए। और दरवाज़ा नाम से नहीं, चाय से खुलता है।"

रात ग्यारह बजे मैंने दुकान के पीछे वाले कमरे में रजिस्टर रखा। औज़ारों के ट्रंक के नीचे वाली ईंट उठाई। उसने पहले भी कुछ छिपाया था — धूल में चौकोर निशान था। मैंने रजिस्टर रखकर ईंट वापस दबा दी।

फिर मैंने घंटी निकाली।

"सुन," मैंने कहा। "मैं कल सुबह तुझे नहीं बजाऊँगा। मैं चाय बनाऊँगा। केतली उठाऊँगा। और तीन दरवाज़े खटखटाऊँगा।"

घंटी चुप रही। पर गरम थी।

"अगर तीनों दरवाज़े नहीं खुले," मैंने कहा, "तो भी मैं तुझे नहीं बजाऊँगा। मैं चौथा दरवाज़ा खटखटाऊँगा।"

घंटी पर उँगली रखी। एक झुरझुरी गई — बहुत हल्की, जैसे किसी ने सोते में करवट ली हो।

मैं मुस्कुराया।

"ठीक है," मैंने कहा। "सो जा। सुबह जगाना नहीं पड़ेगा। मैं खुद जाग जाऊँगा।"

सुबह पाँच बजे मैं जगा। बिना अलार्म। बिना किसी के बुलाने के।

माँ चूल्हे पर थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"आज जल्दी उठ गया?"

"चाय बनानी है," मैंने कहा।

"तू चाय बनाता है?" उन्होंने भौंहें उठाईं। "तू तो कभी चूल्हे के पास नहीं आता।"

"आज आया हूँ," मैंने कहा, और केतली उठाई।

माँ ने देखा। फिर धीरे से कहा —

"किसके लिए?"

"ज़ुबैदा के लिए," मैंने कहा। "फिर सानिया के अब्बा के लिए। फिर गुड्डू के पापा के लिए।"

माँ ने चूल्हे की आँच धीमी की। उनका चेहरा कुछ सोच रहा था।

"वो तुझे दरवाज़े पर खड़ा नहीं रहने देंगे," उन्होंने कहा।

"तो मैं चौखट पर चाय रखकर आ जाऊँगा," मैंने कहा। "कम से कम चाय तो ठंडी नहीं होगी। वो ठंडी नहीं होगी। बस दरवाज़ा खुला रहे।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने चूल्हे से एक छोटी पीतल की चम्मच उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई।

"इसे साथ ले जा," उन्होंने कहा। "मेरी नानी की थी। जब मैं छोटी थी, तो किसी के घर जाते वक़्त ये साथ ले जाती थी। कहती थी — जब शब्द कम पड़ें, तो चम्मच काम आती है।"

मैंने चम्मच ली। जेब में रखी।

"माँ," मैंने कहा। "आपको पता है ना कि गली में जो मेरे बारे में कह रहे हैं —"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "और मुझे यह भी पता है कि तू उन्हें साबित करेगा कि वो झूठ है। पर एक बात सुन।"

"क्या?"

"जब तू ज़ुबैदा के घर जाए, तो उससे ये मत कहना कि तू उसका नाम जानता है। उससे ये कहना कि तूने उसका नाम उसकी बेटी के मुँह से सुना है। बच्चों के मुँह से नाम अच्छा लगता है।"

मैंने माँ के हाथ चूमे। और चाय की केतली उठाकर निकला।

सुबह छह बजकर पैंतालीस मिनट।

ज़ुबैदा का घर गली के उस मोड़ पर है जहाँ पुराना नीम का पेड़ है। दरवाज़ा लकड़ी का है, हरा-पीला पड़ गया है, और उस पर एक छोटा सा ताला लगा है — बाहर से।

मैंने दरवाज़ा खटखटाया।

तीन दस्तकें।

अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।

मैंने फिर खटखटाया — इस बार धीरे, जैसे कोई सोते हुए बच्चे को जगा रहा हो।

अंदर पैरों की आहट आई। दरवाज़ा आधा खुला — बस इतना कि एक आँख दिख जाए।

"कौन?"

"अंकुश," मैंने कहा। "चाय लाया हूँ।"

दरवाज़ा बंद होने ही वाला था कि मैंने कहा —

"सानिया ने बताया था कि आपकी चाय अच्छी बनती है। मैंने सोचा, आज मैं आपकी चाय पीकर देखूँ।"

दरवाज़ा रुका।

फिर आधा खुला।

ज़ुबैदा सामने खड़ी थी — सिर पर दुपट्टा, हाथ में एक छोटा कटोरा, जैसे अभी-अभी आटा गूँथा हो। उसकी आँखें लाल थीं — सुबह से रो रही थी या रात से, पता नहीं।

"तू यहाँ क्यों आया?"

"चाय पीने," मैंने कहा।

"मुझे पता है तू क्यों आया है," उसने कहा। "तू मुझसे कहेगा — ज़ुबैदा, तू सबके सामने आ। बोल दे कि तेरा नाम ज़ुबैदा है। और तेरे पति का नाम साइट से कट जाएगा।"

मैंने केतली उठाई।

"मैं चाय चौखट पर रखकर जाऊँगा," मैंने कहा। "तुम पी लेना। और अगर नहीं पीना, तो ठंडी हो जाएगी, तब पीना। पर चाय पीने के लिए नाम नहीं चाहिए।"

ज़ुबैदा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका हाथ कटोरे पर कस गया।

"सानिया को बुखार है," मैंने कहा। "पता है?"

"हाँ।"

"उसने कल मुझसे नज़र नहीं मिलाई," मैंने कहा। "पर उसने अपनी कॉपी में मेरा नाम लिखा है। मुझे पता है, क्योंकि टिंकू ने देखा था। वो कॉपी में लिखती है — 'अंकुश भैया कहते हैं, टूटा लाओ।'"

ज़ुबैदा का हाथ ढीला हुआ।

"वो बच्ची है," उसने कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "और बच्चे सबसे पहले भरोसा करते हैं। और सबसे पहले भूलते भी हैं — जब बड़े उन्हें भूलना सिखाते हैं।"

मैंने केतली चौखट पर रखी। फिर अपनी जेब से पीतल की चम्मच निकाली और उसके पास रख दी।

"ये मेरी नानी की थी," मैंने कहा। "माँ ने दी। कहती है — जब शब्द कम पड़ें, तो चम्मच काम आती है। तुम्हारे पास रखो। कल मैं ले जाऊँगा।"

मैं पीछे मुड़ा।

"अंकुश।"

मैं रुका।

"तू उसका नाम सबके सामने लेगा?"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho