The Mysterious Bell – Chapter 1170
उसने सिर उठाया। "हाँ?"
"आज सुबह से तीसरा नाम," मैंने कहा। "पहले सुबह सात बजे, फिर आठ बजे, अब नौ। तुम्हारी कॉपी में जगह बची है?"
वो हँसा। छोटी हँसी। "जगह है। ये कॉपी नई है।"
"फिर ठीक है," मैंने कहा और अंदर चला गया।
डॉक्टर इसरानी का कमरा। वही काग़ज़ों का ढेर, वही आधा पानी का गिलास, वही टूटा चश्मा मेज़ के कोने पर। पर आज मेज़ पर एक और चीज़ थी — एक मोटा, भूरे रंग का, कपड़े में लिपटा रजिस्टर। कपड़ा खुला हुआ था। रजिस्टर की जिल्द पर धूल की परत थी और किनारों से जिल्द उखड़ रही थी।
उस्ताद अली बक्श कुर्सी पर बैठे थे। आज उनके हाथ में कैंची नहीं थी। हाथ खाली थे और मेज़ पर रखे थे — दोनों हथेलियाँ ऊपर, जैसे कोई दुआ माँग रहा हो या हिसाब माँग रहा हो।
"आ गया," डॉक्टर इसरानी ने कहा।
"आ गया," मैंने कहा।
"बैठ।"
मैं बैठा।
डॉक्टर इसरानी ने रजिस्टर की तरफ़ हाथ बढ़ाया — फिर रोक लिया। इतने सालों में पहली बार मैंने उनके हाथ में झिझक देखी। वो साठ के पार हैं। उन्होंने हज़ार मरीज़ देखे हैं। हज़ार बार मौत के पास खड़े हुए हैं। पर इस रजिस्टर को छूने से पहले वो रुके।
"ये रजिस्टर," उन्होंने कहा, "मेरी नौकरी के पहले साल का है। चालीस साल पुराना। इसमें अस्पताल की ज़मीन, दान, गवाह और इलाज का हिसाब है। और — "
"और?" मैंने कहा।
"और इसमें कुछ नाम काटे हुए हैं," उन्होंने कहा।
उन्होंने रजिस्टर खोला।
पन्ना पलटा। फिर पलटा। फिर पलटा।
मैंने देखा।
हर पन्ने पर दो-तीन नाम ऐसे थे जिन पर ब्लेड से सीधी लकीर खींची गई थी। काग़ज़ कटा नहीं था — सिर्फ़ स्याही के ऊपर से धातु फेरी गई थी। इस तरह काटा हुआ नाम पढ़ा नहीं जाता, पर मिटता भी नहीं। उसकी जगह पर काग़ज़ थोड़ा चमकता है। बस इतना।
"ये किसने किया?" मैंने पूछा।
"यही तो सवाल है," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "ये रजिस्टर मेरे कब्ज़े में चालीस साल रहा। और मैंने इसे पूरा कभी नहीं पढ़ा।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब मैंने पहली बार इसे खोला था," उन्होंने कहा, "तो इसमें मेरे उस्ताद का नाम कटा हुआ था। और उस दिन मैंने सोचा — जिस काग़ज़ पर मेरे उस्ताद का नाम कटा हो, उसे मैं नहीं पढ़ूँगा।"
फिर उन्होंने पन्ना पलटा। और रुक गए।
"यहाँ," उन्होंने कहा।
उनकी उँगली एक नाम पर थी। नाम के ऊपर ब्लेड की सीधी लकीर थी। पर नाम इतना गहरा लिखा था कि लकीर के नीचे से झाँक रहा था।
उस्ताद अली बक्श ने आगे झुककर देखा।
फिर वो पीछे झुक गए।
फिर से आगे झुके।
और उनका हाथ मेज़ पर काँपने लगा।
"ये — " उनकी आवाज़ फँस गई। उन्होंने गला साफ़ किया और फिर कहा, "ये मेरे भाई का नाम है।"
कमरे में चुप्पी।
"पुराने काग़ज़ों में उनका नाम इसी तरह लिखा जाता था," उस्ताद ने कहा, आवाज़ अब भी धीमी, पर अब उसमें कुछ और था — बीस साल का भूगोल। "इलाही बक्श। मैंने इसे चालीस साल से इस काग़ज़ में नहीं ढूँढा, क्योंकि मुझे लगता था कि मेरा भाई किसी काग़ज़ में नहीं, किसी रास्ते में खोया है। और वो यहाँ था। इसी पन्ने पर। कटा हुआ।"
डॉक्टर इसरानी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। उस्ताद ने उसे हटाया नहीं।
मैं चुप बैठा रहा।
क्योंकि कुछ पल ऐसे होते हैं जिनमें बोलना चोरी है।
फिर उस्ताद ने खुद को सँभाला। चश्मा ठीक किया। मोटे काँच के पीछे आँखें सूखी थीं — पर नमी की वो लकीर थी जो सूखने के बाद भी रहती है।
"पन्ना पलटो," उन्होंने कहा। "आख़िरी पन्ना देखो।"
डॉक्टर इसरानी ने पन्ने पलटे। पीछे के पन्ने साफ़ थे — सिर्फ़ हिसाब, रकम, तारीख़ें। फिर आख़िरी पन्ना।
वहाँ कुछ अजीब था।
आख़िरी पन्ने पर एक और पन्ना चिपका हुआ था। मोटा, अलग रंग का, ऊपर से चिपकाया गया। चिपकाने वाली लाह सूखकर पीली पड़ गई थी और किनारों से उभर आई थी। ऊपर वाले पन्ने पर कुछ नहीं लिखा था। बिल्कुल खाली।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"यही मैं सोच रहा हूँ," डॉक्टर इसरानी ने कहा।
"इसके नीचे कोई हिसाब है," उस्ताद ने कहा।
"तो खोल दें?"
"नहीं," उस्ताद ने कहा। इतनी जल्दी कहा कि हम दोनों चौंक गए। "नहीं। इसे ज़बरदस्ती नहीं खोलना। जो चीज़ ज़बरदस्ती की जाती है, वो तोड़ती है।"
वो उठे। अपनी जेब से रुमाल निकाला — वही पुराना,हल्का पीला, धुला। उससे रजिस्टर के किनारे की धूल पोंछी। फिर झुके और चिपके पन्ने के कोने को उँगली से हौले से उठाया।
कोना उठा।
उसके नीचे से काग़ज़ का एक हिस्सा दिखा।
और उस हिस्से पर — एक अधूरा निशान।
दो लकीरें। और बीच में एक बिंदु।
मेरा हाथ अपने आप गले की तरफ़ गया।
घंटी गरम थी। बहुत गरम।
और फिर — इतनी धीमी कि मैंने पहले सोचा कि मेरे कान बज रहे हैं — उसने एक छोटी सी बात कही।
"काटा हुआ भी बोलता है।"
मैंने आँखें बंद कीं।
डॉक्टर इसरानी ने मुझे देखा। "कुछ कहा?"
"कहा," मैंने कहा। "कि काटा हुआ भी बोलता है।"
उस्ताद ने अपना हाथ वापस खींच लिया। पन्ने का कोना फिर चिपक गया।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "ये पन्ना नहीं खुलेगा। ये तब खुलेगा जब उसके अपने हिसाब में जगह बनेगी।"
"इसका क्या मतलब?" मैंने पूछा।
"इसका मतलब है," उस्ताद ने कहा, "कि अभी सात आदमी बैठे नहीं हैं।"
उन्होंने अपनी उँगली कोने पर रखी।
"देख," उन्होंने कहा। "ये चिपकाने वाले ने ऊपर सिर्फ़ एक नाम बचाया था। ये निशान — दो लकीरें और बिंदु — किसी नाम का नहीं है। ये कोई पहचान का निशान है। और जो चीज़ पहचान से चलती है, वो नाम से नहीं मरती।"
"आपको ये निशान कहाँ से पता है?" मैंने पूछा।
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए। वो मुस्कान जो बूढ़े लोग देते हैं जब उनके पास कोई जवाब हो, पर देने का वक़्त न हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने अपनी उँगली पर कभी वो निशान बनाया है जो तेरी दुकान के पीछे वाले दरवाज़े पर है?"
मैं चुप रहा।
"मैंने चालीस साल में इसे तीन जगह देखा है," उन्होंने कहा। "यहाँ। तेरी दुकान पर। और उस पीतल की घंटी के छल्ले पर जो तेरे गले में है।"
"तो इसका मतलब?"
"इसका मतलब है," उन्होंने कहा, "कि ये काग़ज़, ये रजिस्टर, तेरी दुकान और तेरी घंटी एक ही हिसाब के चार हिस्से हैं। और जब चार हिस्से इकट्ठे हो जाएँगे, तो जिसने भी ये पन्ना चिपकाया था, उसका चेहरा खुद खुल जाएगा।"
डॉक्टर इसरानी ने रजिस्टर बंद किया। उनके हाथ अब नहीं काँप रहे थे। उलटा — वो स्थिर थे।
"आज से," उन्होंने कहा, "ये रजिस्टर मेरे कब्ज़े में नहीं रहेगा।"
"कहाँ रहेगा?" मैंने पूछा।
"तेरे पास," उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मैं इसे दुकान पर नहीं रख सकता," मैंने कहा। "मेरी दुकान पर दो सफ़ेद कुर्ते वाले आते हैं, और उन्होंने मुझसे बड़े काग़ज़ छीने हैं।"
"मैंने ये नहीं कहा कि दुकान पर रख," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मैंने कहा तेरे पास रख। इसका एक हिस्सा तेरी दुकान है, एक हिस्सा तेरी घंटी, एक हिस्सा ये रजिस्टर। और चौथा हिस्सा?"
वो रुके।
"वो तू खुद ढूँढ।"
उस्ताद ने रजिस्टर उठाया। फिर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने हाथ बढ़ाया। रजिस्टर भारी था — काग़ज़ से ज़्यादा भारी। जैसे किसी ने उसमें चालीस साल का सन्नाटा भर दिया हो।
"अब मैं चलता हूँ," उस्ताद ने कहा, और उस वक़्त उनकी आवाज़ बदल गई थी — नरम, थोड़ी थकी। "मुझे अपनी दुकान पर काग़ज़ उतारना है।"
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