The Mysterious Bell – Chapter 1169
"मैं समझता हूँ," मैंने कहा।
"नहीं समझता," उन्होंने कहा। "तू अभी अकेला है। अकेले आदमी को सबसे ज़्यादा समझ आती है और सबसे कम पता होता है।"
मैं हँसा। बिना आवाज़। "ये बात आपने कहाँ से सीखी?"
"जिंदगी से," उन्होंने कहा। "जो औरत दरवाज़ा आधा खोलकर जीती है, वो ज्ञानी हो जाती है।"
दरवाज़ा बंद हुआ।
पर पूरा नहीं। आधा खुला रह गया — जितना खुला था, उतना। मैंने सुना — कुछ देर बाद, बहुत हल्की सी आवाज़ आई। जैसे स्टील का गिलास उठाया गया हो और पत्थर पर रगड़ खा गया हो।
मैं पलटा नहीं।
पर मेरे भीतर कहीं एक धागा गरम हुआ।
गले में घंटी ने एक बार भी आवाज़ नहीं दी। पर जब मैंने उसे अंगुली से छुआ, तो वो उतनी ठंडी नहीं थी।
दूसरा दरवाज़ा — सानिया के अब्बा का। लोहे का, हरे रंग का, जिसका रंग अब नीला-भूरा हो चुका है। दरवाज़े पर एक पुरानी कलाई घड़ी टँगी है जो बंद है, और नीचे बच्चों की चप्पलों की एक जोड़ी।
मैंने दस्तक दी।
कोई नहीं आया।
फिर दी। फिर दी।
अंदर से आवाज़ आई — दरवाज़े के बीच से, दरार से, वैसे ही जैसे बच्चा अंदर से बोलता है।
"चला जा, अंकुश।"
"चाय लाया हूँ," मैंने कहा।
"हमें चाय नहीं चाहिए। हमें कुछ नहीं चाहिए। हमें बस चुप्पी चाहिए। तेरे आने से पहले गली में कम से कम लोग शांति से सोते थे।"
"अंकल —"
"मेरी बेटी रात भर खाँसती है," उन्होंने कहा। आवाज़ में कड़वाहट थी, पर उसके नीचे डर। "डॉक्टर कहते हैं चलो अस्पताल। मैं कहाँ ले जाऊँ? वार्ड सील है। और तू पूछता है चाय। तेरी चाय से मेरी बेटी की खाँसी नहीं जाएगी, अंकुश। और तेरे नाम से गली में जो फैल रहा है, वो तो और बढ़ेगा।"
"मेरा नाम हो या न हो," मैंने कहा, "इलाज चाहिए।"
"इलाज का रास्ता तू नहीं है।"
"मैं रास्ता नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ एक दुकान हूँ।"
अंदर चुप्पी हुई।
फिर उन्होंने कहा, "दुकानें भी बंद हो जाती हैं।"
मैं गिलास लेकर सीढ़ी पर रख आया। उनकी दहलीज़ पर नहीं — सीढ़ी पर, जहाँ से कोई भी उठाकर ले जा सके और किसी पर एहसान भी न हो।
"गिलास सीढ़ी पर है," मैंने कहा। "ठंडी हो जाए तो फेंक देना।"
जवाब नहीं आया।
मैं चला।
तीसरा दरवाज़ा — गुड्डू के पापा का। दूसरी गली में, पीली दीवार, नीचे पत्थर की सीढ़ी। यहाँ तो दरवाज़ा खुला था, पर मुँह पर बंद हो गया — मतलब, दरवाज़ा खुला था और जैसे ही मैंने पैर रखा, अंदर से आवाज़ आई और दरवाज़ा मुँह पर आकर बंद हो गया।
इतनी ज़ोर से कि चौखट से धूल झर गई।
"गुड्डू," मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए कहा। "मैंने तुम्हें कल गली में देखा था, तुम दौड़कर मेरी तरफ़ आ रहे थे और फिर रुक गए। तुम्हारे पापा ने हाथ पकड़कर खींच लिया था।"
अंदर से गुड्डू के पापा की आवाज़ आई, "बच्चे को मत घसीटो।"
"मैं बच्चे को नहीं, आदमी को बुला रहा हूँ," मैंने कहा।
"आदमी के पास वक़्त नहीं है।"
"वक़्त नहीं है या हिम्मत नहीं है?"
अंदर चुप्पी।
फिर दरवाज़े से सिर्फ़ एक वाक्य निकला, बहुत धीमा — "अंकुश, मेरे बच्चे का नाम उस सूची में है। मैंने अपनी आँखों से देखा है। सफ़ेद कुर्ते वाले ने मुझे दिखाया था। नाम कटने में देर नहीं लगती।"
मैंने हाथ दरवाज़े पर रखा। लकड़ी गरम थी।
"नाम कटने से कुछ नहीं होता," मैंने कहा। "मैंने अपना नाम कटते देखा है, काका। कल सुबह। मेरी दुकान के बोर्ड से। और उस दिन मैंने कुछ खोया नहीं। उस दिन मैंने कोयले से अपना नाम अपने शटर पर लिखा।"
"तेरे पास हिम्मत है," उन्होंने कहा। "मेरे पास बच्चा है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि उस वाक्य में कोई झूठ नहीं था। उस वाक्य में कोई बहाना नहीं था। वो बस सच था — और सच का सबसे बड़ा हथियार यही है कि उसे तोड़ा नहीं जा सकता। सिर्फ़ उसके साथ जिया जा सकता है।
मैंने आख़िरी गिलास उनकी सीढ़ी की दूसरी पायदान पर रखा।
"ये रख रहा हूँ," मैंने कहा। "अंदर मत ले जाना। क्योंकि जो चीज़ बाहर रखी होती है, वो किसी दिन किसी और को भी दिखती है।"
मैं मुड़ा।
तीन कदम चला।
पीछे से दरवाज़ा खुला — बहुत हल्का, बहुत धीमा। मैंने सुना, कोई बाहर आया, गिलास उठाया और अंदर चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ। फिर घुंडी घूमी — पूरी बंद।
मैं मुस्कुराया। बस थोड़ा सा।
क्योंकि गिलास बाहर से अंदर गया था। अगर वो चाय फेंकनी होती तो बाहर ही फेंक देते। अंदर ले जाने का मतलब है — कोई पीएगा। और जो आदमी मेरी चाय पीएगा, वो कल मेरी बात भी सुन सकता है। यह जीत नहीं है। पर यह हार भी नहीं है।
मैं दुकान लौटा।
दुकान के बाहर किशनलाल काका खड़े थे। एक हाथ में चने का लोटा, दूसरे में पुरानी चाबी का गुच्छा। मेरी तरफ़ देखकर बोले, "केतली खाली है?"
"हाँ," मैंने कहा।
"तीनों दरवाज़े?"
"एक आधा खुला," मैंने कहा। "दो बंद। पर सारी चाय गई।"
उन्होंने चने का एक दाना मुँह में डाला और देर तक चबाया। फिर बोले, "कल मैं वो काग़ज़ निकालूँगा। बोरी के नीचे से।"
मैं रुक गया।
"कल?"
"कल," उन्होंने कहा। "आज तो मैं सिर्फ़ यह बताने आया था कि मैंने जलाया नहीं था। ये मेरी तरफ़ से एक ईंट है। बाकी कल।"
वो चले गए। और मैं दुकान की सीढ़ी पर बैठ गया।
हाथ में केतली थी जो खाली थी, पर गंध बची थी। भाप नहीं थी, बस अदरक की गंध। और मुझे लगा कि आज सुबह मैंने तीन दरवाज़ों पर चाय नहीं बाँटी। मैंने तीन दरवाज़ों पर एक बात रखी — कि मैं तुम्हारा नाम नहीं लूँगा। और वो बात जितनी छोटी थी, उतनी बड़ी थी।
घंटी गले में अब भी चुप थी। पर गुनगुनी।
तभी काजल आई।
सिर पर दुपट्टा, हाथ में दवा की थैली जिसमें सिर्फ़ दो पत्ते थे, आँखों में वो थकान जो नींद से नहीं आती, इंतज़ार से आती है।
"माँ ने दवा ली," उसने कहा। "पर वो कह रही हैं कि अस्पताल में आज नई खेप आनी थी।"
"रुकी है," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं सुबह सात बजे गई थी। खिड़की वाला कह रहा था — काग़ज़ साफ़ नहीं है।"
वो मेरे पास बैठ गई। कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "अंकुश, तूने सुबह चाय बनाई?"
"हाँ।"
"किसके लिए?"
"तीन दरवाज़ों के लिए।"
"और मेरे लिए?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो मुस्कुराई — वैसी मुस्कान जो रोने से पहले आती है।
"मज़ाक कर रही हूँ," उसने कहा। "मुझे पता है तूने मेरे लिए दो बार बनाई थी और मैं दोनों बार अस्पताल में थी।"
मैं उठा। स्टोव फिर जलाया। बची हुई पत्ती में पानी डाला।
"आज तीसरी बार," मैंने कहा।
उसने दोनों हाथों से गिलास पकड़ा और घूँट भरा। फिर बोली, "कड़वी है।"
"अदरक ज़्यादा है।"
"नहीं," उसने कहा। "ये चीनी की कमी है।"
हम दोनों हँसे। थोड़ा। जितना हँस सकते थे।
फिर वो उठी और बोली, "नौ बजे का वक़्त है। डॉक्टर इसरानी बुला रहे थे। उस्ताद भी आए हैं। बोले हैं तुझे भी आना है।"
मैंने केतली धोई, उलटी रखी, और बाहर निकला।
अस्पताल के गेट पर आज भीड़ नहीं थी। सिर्फ़ एक बूढ़ी माँ बेंच पर बैठी थी, गोद में कपड़े का पोटला, आँखें सीढ़ी पर। और गेट के अंदर पहरेदार वही सफ़ेद कमीज़ नीला पैंट वाला — जेब से काग़ज़ निकालकर मेरा नाम पेंसिल से लिख रहा था।
"अंकुश यादव," मैंने खुद कहा।
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