The Mysterious Bell – Chapter 1168
सुबह छह बजे मेरी आँख खुली और सबसे पहले मैंने अपना गला टटोला।
घंटी वहीं थी। काजल के दिए धागे से, दो गाँठ। ठंडी नहीं थी। गरम भी नहीं थी। बस गुनगुनी — जैसे किसी ने अभी हाथ धोकर पोंछा हो और हथेली की गरमी बच गई हो।
मैंने उसे हथेली पर रखा और धीरे से कहा, "आज तुझे नहीं बजाऊँगा।"
वो चुप रही।
"आज मैं बजूँगा," मैंने कहा। "दरवाज़ों पर।"
उसे वापस गले में बाँधा और चारपाई से उठा। बाहर अंधेरा हल्का हो रहा था। गली में किसी ने पानी नहीं डाला था, किसी ने झाड़ू नहीं लगाई थी। सुबह की जो आवाज़ें हमेशा पहले आती थीं — किसी की खाँसी, किसी का बाल्टी भरना, किसी का बच्चे को उठाना — वो आवाज़ें आज नहीं थीं।
सिर्फ़ एक आवाज़ थी। मेरी अपनी।
मैंने दुकान के पीछे स्टोव जलाया। केतली चढ़ाई। चाय की पत्ती उसी पुराने डिब्बे से निकाली जिस पर माँ ने एक बार अपने हाथ से लिखा था — "कम पत्ती, ज़्यादा दूध।" अदरक थोड़ी रखी। चीनी आज ज़्यादा डाली। आज चाय कड़वी नहीं चाहिए थी। आज चाय वो चीज़ थी जो बात से पहले बोलती है।
चाय उबली तो भाप से पूरा कमरा भर गया। मैंने उसे उस पुरानी स्टील की केतली में डाला, ऊपर एक साफ़ कपड़ा बाँधा, और दो गिलास एक मैले कपड़े में लपेटकर बगल में दबा लिए।
फिर खड़ा हुआ।
आईने के टूटे हिस्से में अपना चेहरा देखा। बाल बेतरतीब। आँखों के नीचे कालापन। कमीज़ पर ग्रीस का पुराना दाग। मैंने उसे हाथ से रगड़ा, पर मिटा नहीं। सोचा, रहने दो। जिस गली में मैं जा रहा हूँ, वहाँ मुझे साफ़-सुथरा दिखने की ज़रूरत नहीं। वहाँ मुझे वैसा दिखने की ज़रूरत है जैसा मैं हूँ।
शटर उठाया। आधा ही। पूरा उठाने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि पूरा उठता तो खाली गली देखकर मन भर जाता।
सात बजने में अभी थोड़ा वक़्त था।
मैं केतली उठाकर निकला।
गली में धूल अभी बैठी हुई थी। पीपल के नीचे उस चौकोर निशान पर नज़र पड़ी जहाँ कल तक मेरी मेज़ थी। मैंने नज़र फेर ली। उस जगह को देखकर कुछ माँगने का मन नहीं था।
शबनम आपा की गुमटी का शटर आधा था, पर अंदर से लाल रोशनी आ रही थी। चूल्हा जल रहा था। धुएँ की पतली लकीर बाहर निकल रही थी, और वो लकीर सीधी ऊपर जा रही थी — जैसे गली में एक ही चीज़ अभी ईमानदार बची हो।
मैं वहीं से गुज़रा तो आपा ने बिना सिर उठाए कहा, "केतली में क्या है?"
"चाय," मैंने कहा।
"किसके लिए?"
"तीन दरवाज़ों के लिए।"
उन्होंने तवे पर रखी पहली रोटी पलटी और कहा, "दो दरवाज़े बंद मिलेंगे।"
मैं रुक गया।
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि मैं सुबह चार बजे से जल रही हूँ," उन्होंने कहा, "और मेरी गुमटी पर काग़ज़ चिपका है, फिर भी कोई नहीं आया। जब गली में किसी को कुछ नहीं चाहिए, तो सब दरवाज़े बंद मिलते हैं। पर एक रखना खुला।"
"कौन सा?"
उन्होंने पहली बार सिर उठाया। आँखों में वो कड़कपन था जो सिर्फ़ उनके पास है।
"जिसे तू आख़िरी में खटखटाएगा।"
मैं हँस दिया। डर की हँसी नहीं, सच्ची। क्योंकि यही तो बात है — गली में कोई एक औरत अभी भी ऐसी है जो चूल्हा जलाकर, काग़ज़ न हटाकर, सुबह चार बजे से खड़ी है। अगर एक है, तो दूसरी भी हो सकती है। गिनती शून्य से शुरू नहीं होती, यही तो बात है।
"चाय पी लूँ?" मैंने पूछा।
"जा," उन्होंने कहा। "तेरी चाय ठंडी हो जाएगी, और मेरी गुमटी की चाय का हिसाब अभी बाकी है।"
मैं चला।
ज़ुबैदा का घर गली के उस मोड़ पर है जहाँ से स्कूल की दीवार दिखती है। दरवाज़ा नीला है। नीले पर पीली पड़ चुकी है। चौखट पर एक पुरानी कील है जिस पर सूखा नीम का टहनी का टुकड़ा टँगा रहता है — मैंने कल रात भी देखा था, आज भी टँगा था।
सात बजे से पाँच मिनट पहले मैं वहाँ पहुँचा।
तीन दस्तक दीं।
अंदर हल्की हरकत हुई। फिर चुप्पी। फिर पैरों की आहट। दरवाज़ा थोड़ा खुला — एक हाथ भर। ज़ुबैदा का आधा चेहरा दिखा। आँखें सूजी हुईं। सफ़ेद दुपट्टा सिर पर लिपटा हुआ, एक कोना दाँतों के पास दबा हुआ।
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं, गली की तरफ़ देखा। पहले दाएँ। फिर बाएँ। फिर मेरी तरफ़।
"तू आ गया," उन्होंने कहा।
"चाय लाया हूँ," मैंने कहा।
"मैंने कुछ माँगा नहीं था।"
"पूछा भी नहीं था," मैंने कहा। "मैं वैसे ही लाया हूँ।"
दरवाज़ा थोड़ा और खुला। सानिया की खाँसी अंदर से आई — छोटी, दबी हुई, जैसे बच्चा तकिये में मुँह दबाकर खाँसता है ताकि किसी को सुनाई न दे। मेरा हाथ केतली पर कस गया।
"उसकी दवा?" मैंने पूछा।
"दो पत्ते बचे हैं," उन्होंने कहा। "अस्पताल का वार्ड बंद है, अंकुश। नई परची कहाँ से लाऊँ?"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि उन्होंने हाथ उठाकर रोक दिया।
"सुन," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "तू मेरे दरवाज़े पर आया, ये ठीक है। तू मेरा नाम जानता है, ये भी ठीक है। पर तू मेरा नाम सबके सामने नहीं लेगा। किसी सभा में नहीं। किसी काग़ज़ पर नहीं। किसी कैमरे के सामने नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि दो बजे वो दो आदमी आते हैं," उन्होंने कहा। आवाज़ काँपी — नहीं, काँपी नहीं, सिकुड़ी। "सफ़ेद कुर्ते में। एक बैग रखता है, दूसरा दरवाज़े की तरफ़ देखता रहता है। वो कहते हैं — हमारे साहब ने कहा है कि तेरे आदमी का नाम साइट से कट जाएगा। छह महीने की मज़दूरी भूखी रह जाएगी। मेरा आदमी रोज़ सुबह पाँच बजे निकलता है, अंकुश। वो सीमेंट ढोता है। उसकी कमर में पहले से ही दर्द है। अगर नाम कट गया तो वो घर में बैठकर क्या करेगा? मेरी तरफ़ देखेगा? और मैं क्या कहूँगी?"
उन्होंने साँस ली। सानिया ने अंदर फिर खाँसा।
"और मेरी बेटी का स्कूल में नाम है," उन्होंने कहा। "वो सूची वहाँ बन रही है, मुझे पता है। मैं अनपढ़ नहीं हूँ, अंकुश। मैं जानती हूँ कि सूची कैसे बनती है और कैसे कटती है।"
मैंने केतली नीचे रखी। फिर गिलास निकाला। कपड़े से खोला। चाय डाली।
भाप उठी। अदरक की गंध उनके चेहरे तक गई। उनकी नाक हल्की सी फड़की — जैसे किसी चीज़ की याद आई हो।
"मैं तुम्हारा नाम नहीं लूँगा," मैंने कहा।
वो रुकीं।
"सच?"
"सच," मैंने कहा। "पर एक बात कहूँगा। तुम्हारा नाम किसी काग़ज़ की मुहर नहीं है, ज़ुबैदा आपा। ये तुम्हारे माँ-बाप ने रखा था, तुम्हारे आदमी ने सुना था, और सानिया ने पहली बार बोला था। इसे कोई साइट नहीं काट सकती। साइट काग़ज़ काटती है। नाम नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर।
फिर उन्होंने कहा, "तू बड़ी-बड़ी बातें करता है। तेरे पापा ऐसी बातें नहीं करते थे।"
"पापा करते थे," मैंने कहा। "बस कहते नहीं थे।"
उनके चेहरे पर कुछ हुआ। छोटा सा। फिर मिट गया।
मैंने गिलास चौखट पर रखा — दरवाज़े के बाहर, पत्थर पर, उस जगह जहाँ कोई आता-जाता न पड़े।
"ये रख रहा हूँ," मैंने कहा। "अगर पीना हो तो पी लेना। अगर नहीं पीना हो, तो बहा देना। पर गिलास अंदर मत ले जाना — क्योंकि जो गिलास बाहर रखा रहता है, वो किसी और के लिए भी रखा रहता है।"
"किसके लिए?"
"उसके लिए जो कल आएगा।"
वो कुछ नहीं बोलीं।
मैं मुड़ा।
तीन कदम चला था कि उन्होंने कहा, "अंकुश।"
मैं रुका। पलटा नहीं।
"रात में मुझे नींद नहीं आती," उन्होंने कहा। "मैं सोचती हूँ — काश मैं तेरे साथ खड़ी हो जाती। फिर मैं अपने आदमी की कमर सोचती हूँ और सानिया की खाँसी सोचती हूँ। और मैं चुप हो जाती हूँ।"
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