The Mysterious Bell – Chapter 117
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने सिर उठाया। आँखें सूजी हुई थीं। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, टेप की एक परत खुल गई थी।
"रोटी रखी है," उन्होंने कहा। "माँ ने रखी है। तू खा ले।"
"आपने खाई?"
चुप्पी।
मैंने पानी का गिलास भरकर उनके आगे रख दिया। फिर उनके बगल में बैठ गया। दोनों चुप। बस पंखे का खुला तार दीवार पर पड़ा था, जैसे कोई उँगली।
"पापा," मैंने कहा, "दस बजे मैं आपको नहीं बोलने दूँगा कि क्या बोलना है। आप जो बोलेंगे, बोलेंगे।"
उन्होंने पानी उठाया। एक घूँट पिया। फिर बोले, "तूने बोर्ड साफ़ किया।"
"हाँ।"
"क्या लिखा था उस पर?"
"शंकर यादव और बेटे।"
पापा ने गिलास नीचे रख दिया। उनका हाथ काँप रहा था, और उन्होंने उसे दूसरे हाथ से दबा लिया। "मैंने वो बोर्ड अपने हाथ से टाँगा था," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले। और जिस दिन अंगूठा लगाया, उस दिन उसी बोर्ड के नीचे खड़े होकर मैंने सोचा था कि मैं इस लायक़ नहीं हूँ।"
मैं कुछ नहीं बोला। घंटी ने कहा था, पहले सुनना।
"अच्छा," उन्होंने कहा, "जा। तेरे पास काम है। तेरी घंटी बोल रही है, है ना?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। मैंने कभी नहीं कहा था कि घंटी बोलती है। पर उन्होंने अपने हाथ में झाड़ू पकड़ी हुई थी और वो काँप रही थी, इसलिए मैंने कोई सवाल नहीं किया।
"बोल रही है," मैंने कहा। "पीपल के नीचे।"
उन्होंने सिर हिलाया। "फिर जा। और अंकुश —"
"हाँ।"
"टूटे हुए को जोड़ने से पहले कभी यह मत सोचना कि कौन सही है। यह मत सोचना कि किसने ग़लती की। सिर्फ़ यह देख कि कौन चुप है। क्योंकि जो चुप है वो अंदर से बोल रहा है, बस किसी ने पूछा नहीं।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। वो पहली बार नहीं छूटा।
मैं पीपल के नीचे पहुँचा तो सुबह की धूप छनकर आ रही थी। चारों बच्चे पहले से वहाँ थे, और उनके हाथ में कुछ था — सानिया के हाथ में कपड़े में लिपटा बाट, और गुड्डू के हाथ में लंबा ज़ंग लगा काँटा, जिसके दोनों पलड़े सूखी हुई दाल की पत्तियों से भरे थे।
चबूतरी पर इस सुबह सिर्फ़ दो लोग थे। एक सिरे पर बाबा क़ादिर बैठे थे — लंबा सफ़ेद कुर्ता, टोपी सामने खिसकी, हाथ में तस्बीह। दूसरे सिरे पर लाला बद्रीप्रसाद — पीली धोती, गमछा, लाठी बगल में रखी।
बीच में खाली जगह थी। जिस पर कोई नहीं बैठता था। बत्तीस साल से।
मैंने काँटा उठाया और बीच की खाली जगह पर रख दिया। फिर उसके बगल में बाट रखा।
दोनों बुज़ुर्गों ने देखा। और दोनों के चेहरे पर वही भाव आया, जो किसी की कब्र पर उसका अपना नाम देखकर आता है।
"ये काँटा लाला जी के आँगन से आया है," मैंने कहा। "और ये बाट बाबा क़ादिर की अलमारी से। दोनों अलग-अलग रखे बत्तीस साल से। और बत्तीस साल तक कोई चीज़ सही नहीं तोली गई — न मिठाई, न रिश्ता, न ग़लती।"
क़ादिर बाबा ने तस्बीह रोक दी। "बेटा, तू कौन है?"
"मैं अंकुश हूँ। साइकिल मिस्त्री।" मैंने कहा। "मैं मरम्मत करता हूँ। बस। और मेरा एक नियम है — मैं किसी की ज़ुबान नहीं बोलता। मैं सिर्फ़ वो जोड़ता हूँ जो टूटा है। बाकी बात आप दोनों को ख़ुद बोलनी होगी।"
लाला बद्री ने लाठी उठाई। "हमें कुछ नहीं बोलना।"
"तो ये काँटा उठा लीजिए," मैंने कहा। "और घर ले जाइए। पर पहले ये बाट अपने पलड़े पर रखिए और देखिए कि तोलता है या नहीं। क्योंकि बिना बाट का काँटा झूठ बोलता है, लाला जी। और बिना काँटे का बाट किसी काम का नहीं। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। जैसे एक ही दुकान के दो साझेदार।"
गली में सन्नाटा था। शबनम आपा गुमटी से झाँक रही थीं। उस्ताद की सिलाई मशीन रुक गई थी।
क़ादिर बाबा ने धीरे से कहा, "मैं बोलूँगा।"
लाला बद्री ने उनकी तरफ़ देखा। पहली बार बत्तीस साल में, सीधे आँखों में।
"मैं बोलूँगा," क़ादिर बाबा ने फिर कहा, आवाज़ काँप रही थी। "क्योंकि मैं बत्तीस साल से इसे अंदर दबाकर मर रहा हूँ।"
वो खड़े हुए। काँपते हुए काँटे तक आए। "उस रात," उन्होंने कहा, "मैं दुकान पर अकेला था। तू बोला था कि तेरी बीवी को बुखार है, तू घर जा। मैंने कहा, जा, मैं सँभाल लूँगा। पर तेरी बीवी की दवा भी ख़त्म हो गई थी स्टोर से। तो मैं दुकान बंद करके दवा लेने गया। पीछे से। तुझे बताए बिना।"
लाला बद्री का मुँह खुला रह गया।
"क्यों नहीं बताया?" उन्होंने कहा, आवाज़ फटी हुई।
"क्योंकि मैंने सोचा था कि तू कहेगा कि मैंने दुकान खाली छोड़ दी।" क़ादिर बाबा ने कहा। "और जब मैं लौटा, तो पता चला कि उसी बीच तेरा लड़का आया था, मिठाई लेने, और उसने काँटे पर से पेड़ों की टोकरी उठा ली थी। उसने सोचा कि तौली हुई है, पर वो आधी थी। और शादी में चालीस किलो कम निकली।"
"तूने मुझे क्यों नहीं बताया?" लाला बद्री ने कहा — और अब उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, सिर्फ़ दर्द था।
"क्योंकि तूने उस दिन कह दिया था," क़ादिर बाबा ने धीरे से कहा, "कि तू मेरा हिस्सा खा गया। और मुझे लगा कि अगर मैं कहूँगा कि मैं तेरी बीवी की दवा लेने गया था, तो तुझे लगेगा कि मैं तेरे ऊपर एहसान जता रहा हूँ। इसलिए मैं चुप रह गया। और चुप्पी बत्तीस साल लंबी निकल गई।"
लाला बद्री ने लाठी ज़मीन पर टिका दी। उनका गमछा हाथ से छूट गया। "और मैंने," उन्होंने कहा, — "मैंने कभी पूछा नहीं। तू रात को दुकान से कहाँ गया था। मैंने बस यह मान लिया कि तू गया तो अपने घर। और मैंने यह मान लिया कि मैं ठगा गया।"
"और मुझे भी कभी यह पूछना नहीं चाहिए था कि तुझे मेरी बात पर शक क्यों हुआ," क़ादिर बाबा ने कहा। "मुझे पूछना चाहिए था — लाला, तुझे क्या लगा? और वहीं बात ख़त्म हो जाती। पर मैंने सवाल नहीं पूछा। मैंने घाव को बंद कर दिया, बिना साफ़ किए। और वो अंदर से सड़ता रहा।"
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। बत्तीस साल की दूरी के बाद, बीच की खाली जगह भर गई थी।
लाला बद्री ने काँटा उठाया। क़ादिर बाबा ने बाट उठाया। उन्होंने बाट काँटे के पलड़े पर रखा। मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया — ज़ंग लगा काँटा अचानक झूलने लगा, जैसे उसमें जान आ गई हो। पलड़ा नीचे झुका, फिर सीधा हो गया, फिर बराबर पर आकर रुक गया। दोनों तरफ़ बराबर। पूरी तरह बराबर।
क़ादिर बाबा ने काँटे को सीने से लगा लिया। लाला बद्री ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"माफ़ कर," क़ादिर बाबा ने कहा।
"तू माफ़ कर," लाला बद्री ने कहा। "मैंने बत्तीस साल सिर्फ़ इसलिए बर्बाद किए कि मैंने एक सवाल नहीं पूछा।"
तभी मेरी जेब में घंटी बजी। ज़ोर से, पहली बार इतनी तेज़, जैसे पूरी गली को जगाना चाहती हो।
चारों बच्चे चौंककर पीछे हट गए। चिंटू ने मेरा कुर्ता पकड़ लिया। शबनम आपा गुमटी से बाहर निकल आईं।
और उसी वक़्त सामने की दुकान का दरवाज़ा खुला।
उस्ताद अली बक्श बाहर आए। चश्मा, कैंची, और हाथ में एक कपड़ा जो उन्होंने काटना छोड़ दिया था। वो दरवाज़े के बाहर रुक गए। सिर्फ़ रुके रहे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी जेब की तरफ़, फिर पीपल की तरफ़। फिर उनका हाथ काँपा — वो वही हाथ जिसमें पेंसिल थी।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। मीरा की तरह कुछ नहीं कहा। बस एक बार ज़ोर से साँस ली, और दुकान के अंदर चले गए। पर जाते वक़्त उन्होंने दरवाज़े का बोर्ड उल्टा कर दिया — जिस पर लिखा था कि दुकान खुली है।
मुझे समझ नहीं आया। मैंने उन्हें पहले ऐसा कभी नहीं देखा।
घंटी फिर बजी। "लगभग चालीस," उसने कहा। "किसी की दुआ है। कुल अब दो सौ अठाईस।"
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