The Mysterious Bell – Chapter 116
"हाँ?"
"कल जब तेरे पापा बोलेंगे, तब तू पहले नहीं बोलना। उन्हें पूरा होने देना। पहली बार।"
॥
रात के ग्यारह बज चुके थे। मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में चारपाई पर पड़ा था, पर नींद कहीं दूर थी।
छत का पुराना बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में कोई पुरानी लोरी गा रहा हो। दीवार पर सालों की ग्रीस के निशान जमे थे, जो मैंने कभी साफ़ नहीं किए, क्योंकि मुझे लगता था कि ये भी दुकान का हिस्सा हैं। मेज़ पर पीला काग़ज़ रखा था — दादा का। जिस पर नीली स्याही में लिखा था, दुकान गिरवी, एक तारीख़, और नीचे एकदम छोटे अक्षरों में — इसका हिसाब मेरे बेटे शंकर से माँगना।
मैंने करवट बदली। जेब में घंटी थी, ठंडी। छोटी फूल वाली घंटी — जो उस्ताद ने आज दी थी — तकिये के नीचे रखी थी, जैसे कोई बच्चा अपना सबसे कीमती खिलौना छुपा लेता है, कि कहीं कोई छीन न ले।
"तू सोता क्यों नहीं," मैंने घंटी से कहा। धीमे, क्योंकि कमरे के बाहर गली जैसे सो रही थी।
"तू सोता क्यों नहीं," घंटी ने वही बात लौटा दी। मुझे लगा कि आज उसका मूड भी भारी है।
"मैं सोच रहा हूँ, कल दस बजे पापा क्या बोलेंगे।"
"जो वो बोलेंगे, वो तेरे कानों ने पहले कभी नहीं सुना होगा। इसीलिए तू डर रहा है। डर ठीक है। डर के बिना लोग सच नहीं बोलते।"
"और तूने कल जो कहा था — साठ से सत्तर की बढ़त — उसका हिसाब क्या हुआ? मुझे अब तक पूरा अंक नहीं पता।"
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली, "अब तक जोड़ा — एक सौ अठासी। बाकी तेरे दिमाग़ के फेर में था।"
"एक सौ अठासी," मैंने धीरे से दोहराया। जैसे कोई बच्चा अपनी जेब में रखे पैसे गिनता है और यक़ीन नहीं कर पाता कि इतने ज़्यादा हैं।
"कल सुबह एक और आएगा," घंटी ने कहा। "सो जा।"
"कौन सा?"
पर वो चुप हो गई। बस हल्की-सी ठंडक हुई, और फिर वो भी ख़त्म।
मैं कब सो गया, पता नहीं चला। सुबह पाँच बजे माँ के चूल्हे की खड़खड़ मेरे कानों तक आई, चार गलियाँ छोड़कर भी। यादव के घर में चूल्हा पाँच बजे जलता है, चाहे घर में कोई बीमार हो, चाहे कोई लड़ाई हो, चाहे कोई सच खुलने वाला हो। माँ कहती हैं — चूल्हा नहीं जलेगा तो सच बोलने की ताक़त कहाँ से आएगी।
मैं उठा, मुँह धोया, शटर आधा उठाया। गली में कुहासा था और शबनम आपा की गुमटी से चाय की गर्म भाप उठ रही थी, जैसे गली सुबह-सुबह आँखें मल रही हो।
छह बजे सामने की दुकान का ताला खुला। उस्ताद अली बक्श बाहर आए। मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में कैंची। उन्होंने मुझे देखा, बस सिर हिलाया, और सिलाई मशीन पर बैठ गए। टिक-टिक शुरू हो गई। मुझे लगा पूरी गली की नब्ज़ चलने लगी है।
सात बजे से पहले मेरी दुकान के बाहर चार जोड़ी चप्पलें आ गईं।
सानिया सबसे आगे थी, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और सबसे पीछे चिंटू, जो चलते-चलते अपने घुटने पर बँधी पट्टी देख रहा था।
"उस्ताद," सानिया ने कहा, "हम सात बजे आ गए। आपने कहा था काम देंगे।"
मैं मुस्कुराया। "आ जाओ। पहला काम — ये ट्रंक। इसमें पेच, नट, बोल्ट सब मिले-जुले पड़े हैं। मुझे साइज़ के हिसाब से अलग चाहिए। बड़े वाले एक तरफ़, छोटे दूसरी तरफ़।"
"बस इतना?" गुड्डू ने कहा, जैसे उसे धोखा मिला हो।
"बस इतना नहीं," मैंने कहा। "जो गलत साइज़ वाले बोल्ट सही जगह नहीं लगते, वो या तो छेद बड़ा कर देते हैं या गाड़ी में ढीले रह जाते हैं। और ढीला बोल्ट सबसे ख़तरनाक चीज़ है। पहली गड्ढे में पता चलता है, और तब तक देर हो चुकी होती है। तुम लोग आज से मेरी दुकान के हिसाब रखने वाले हो।"
सानिया की आँखें चमकीं। चारों ट्रंक के पास बैठ गए, जैसे कोई खज़ाना मिला हो। रफ़ीक़ ने बड़े बोल्ट वाला डिब्बा उठाया और छोटों में डाल दिया, तो चिंटू ने उसका हाथ पकड़ लिया — "अरे नहीं, ये बड़ा है, इसका घर दूसरी तरफ़ है।"
मैं उन्हें देखता रहा और मुझे अचानक याद आया कि तेरह साल की उम्र में मैं भी ऐसा ही बैठा था, दादा के औज़ारों के सामने, और मुझे लगता था कि मैं दुनिया का सबसे बड़ा काम कर रहा हूँ।
आठ बजे मैंने कहा, "चलो, चाय पिलाता हूँ।"
चारों एक साथ चिल्लाए। हम शबनम आपा की गुमटी पर गए।
"अरे," शबनम आपा ने चिमटी उठाकर कहा, "आज पूरी फ़ौज आ गई।"
"आपा," सानिया ने कहा, "हम अंकुश उस्ताद के साथ काम करते हैं।"
"अच्छा?" आपा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो अब तेरे पास चेले भी हैं।"
"छह महीने पहले मेरे पास कुछ नहीं था," मैंने कहा। "अब चार चेले हैं, एक ट्रंक, और एक घंटी।"
आपा हँसीं। उन्होंने पाँच कप चाय डाली, और चारों के आगे समोसे का प्लेट रख दिया। "ये मेरी तरफ़ से," उन्होंने कहा। "गली के बच्चे जब काम करने लगें, तो चाय मेरी।"
सानिया ने तुरंत अपनी लाल कॉपी खोली। "आपा, मैंने ये कॉपी रखी है। इसमें ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखी है। कल छह ट्रक आए थे। पीली पट्टी पर भारद्वाज लिखा था। और एक ट्रक ने अस्पताल की दीवार के पास मिट्टी डाली, पर वो मिट्टी लाल थी, बाकी सब पीली।"
मैंने चाय का कप नीचे रख दिया। "लाल मिट्टी?"
"हाँ। जैसे खुदाई की मिट्टी।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, पीपल के नीचे दो बूढ़े आते हैं। एक सुबह आता है, एक शाम। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं, पर बोलते नहीं। बत्तीस साल से।"
"कौन?" मैंने पूछा।
"बाबा क़ादिर," चिंटू ने कहा, और मुँह में समोसा ठूँस लिया।
"और लाला बद्रीप्रसाद," गुड्डू ने कहा।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। उनके हाथ की चिमटी रुक गई।
"क़ादिर और बद्री," आपा ने धीरे से कहा, जैसे कोई पुराना नाम याद कर रही हों। "हलवाई के दो साझेदार। बाज़ार में उनकी दुकान थी — क़ादिर और बद्री की हलवाई। पेड़े, बर्फ़ी, और एक ऐसा कलाकंद कि लोग दूर से आते थे।"
"तो फिर?" मैंने पूछा।
"तो फिर एक रात," आपा ने कहा, "एक बड़ा ऑर्डर आया। शादी का। पाँच सौ पेड़े। और सुबह जब लोगों को बाँटा गया, तो वो पेड़े बासी थे। या कम थे। या… मुझे पूरा नहीं पता। बस इतना पता है कि उस दिन के बाद दुकान बंद हो गई। और दोनों ने बत्तीस साल से एक-दूसरे से बात नहीं की।"
"किसने किस पर इल्ज़ाम लगाया?" मैंने पूछा।
"यही तो नहीं पता," आपा ने कहा। "किसी ने किसी से पूछा ही नहीं। दोनों ने बस एक-दूसरे को देखना बंद कर दिया। और गली ने भी पूछना बंद कर दिया। यही गली की सबसे बड़ी बीमारी है, अंकुश — हम पूछना बंद कर देते हैं।"
मैंने चाय ख़त्म की और खड़ा हो गया।
"तुम चारों," मैंने कहा, "मुझे एक काम चाहिए। बाबा क़ादिर के घर जाओ। उनकी अलमारी में एक लोहे का बाट रखा है, कपड़े में लिपटा। और लाला बद्री के आँगन में एक पुराना काँटा टँगा है, ज़ंग लगा। मुझे दोनों चाहिए। कहना कि अंकुश मिस्त्री ने भेजा है, वो काँटा ठीक करेगा।"
"और अगर वो न दें?" सानिया ने पूछा।
"तो वापस आ जाओ। किसी से झगड़ना नहीं। और हाँ — जो भी दें, दोनों हाथ से लेना। कभी भी किसी बूढ़े के हाथ से चीज़ खींचकर मत लेना। हम मरम्मत करते हैं, लूट नहीं।"
चारों भाग गए।
मैं घर की तरफ़ चला। आठ बजकर पंद्रह। सभा दस बजे थी। माँ अब तक अस्पताल से लौट आई होंगी या काजल के साथ निकल गई होंगी।
घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर पापा फ़र्श पर बैठे थे। सामने टूटा पंखा खुला पड़ा था — तार टूटा हुआ, ब्लेड हिलते हुए। उन्होंने आधी रात से उसी पंखे को देखा था, मुझे लगता है। कह रहे थे कि ठीक करूँगा, पर कुछ नहीं किया।
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