The Mysterious Bell – Chapter 115
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"तोड़ दिया?"
"तोड़ दिया।" उस्ताद ने कहा। "उसने घंटी को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्सा उसने अपने पास रखा, जो अब रणवीर के पास है। और दूसरा हिस्सा उसने इलियास को दे दिया, ये कहकर कि तू इसे संभाल, मैं इसे बाज़ार में नहीं लाऊँगा। इलियास ने घंटी ली और दिल्ली चला गया। और मैं —" उन्होंने रुककर अपने हाथ देखे — "मैं चुप रहा। मैंने विजय से नहीं लड़ा। मैंने इलियास को रोका नहीं। मैंने बस अपनी दुकान बंद कर दी और यहाँ बैठ गया।"
"उस्ताद—"
"पचास साल, अंकुश। पचास साल मैंने इस दुकान में सुई चलाई और हर बार सोचा कि मैंने क्या किया। और अब तू आया है, तेरे हाथ में वो घंटी है, और इलियास वापस आ गया है। और मुझे लगता है कि ये सब व्यर्थ नहीं है।"
वो उठे। उन्होंने दराज़ से एक पुराना पीतल का डिब्बा निकाला — छोटा, जंग लगा, ढक्कन पर फूल खुदा हुआ। उन्होंने उसे खोला। उसमें एक छोटी सी घंटी थी। बहुत छोटी। फूल वाली।
"ये मेरी घंटी है," उन्होंने कहा। "इलियास वाली नहीं। ये मेरी अपनी थी। ये बोलती नहीं है। ये सिर्फ़ सुनती है। जब तेरी घंटी बोलती है, ये सुनती है। और आज रात, जब मैंने इसे उठाया, तो ये गरम थी।"
उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर रख दी।
"ये मैं तुझे दे रहा हूँ।"
"उस्ताद, ये आपकी—"
"ये तेरी है।" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी, बस एक पुराना फ़ैसला था। "मैंने पचास साल इसे संभाला। अब तू संभाल। और अंकुश," उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "अगर इलियास से मिले, तो उससे कहना कि मैंने उसके लिए एक जोड़ा कुर्ता सिला है। पचास साल से मेज़ पर रखा है। और मैं उसे पहनकर उसका इंतज़ार कर रहा हूँ।"
मैंने वो छोटी घंटी अपनी जेब में रखी। वो बड़ी घंटी के ठीक बगल में थी, और मुझे लगा जैसे दोनों एक-दूसरे को पहचान रही हों।
"एक बात और," उस्ताद ने कहा। "तूने आज नबी और श्यामलाल को जोड़ा। अच्छा किया। पर एक ग़लती की।"
"क्या?"
"तूने उनके बीच सिक्का रखा। सही था। पर तूने ये नहीं सोचा कि जब तक वो दोनों खुद न बोलें, सिक्का चुप रहेगा। अंकुश, तंत्र तेरे हाथ में है, पर बात उनके मुँह से निकलनी चाहिए। तू सिर्फ़ दरवाज़ा खोलता है। अंदर वो जाते हैं।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"जब अगली बार कोई टूटा रिश्ता सामने आए, तो पहले पूछ — तुम दोनों में से कौन पहले बोलेगा? और जो पहले बोले, उसे सबके सामने बोलने देना। तेरा काम सिर्फ़ इतना है कि तू उन्हें एक ही मेज़ पर बैठा दे।"
वो फिर मशीन के पास गए। उन्होंने कैंची उठाई और कपड़े का एक टुकड़ा काटने लगे, जैसे बात खत्म हो गई हो।
मैंने दरवाज़ा खोला।
"उस्ताद," मैंने पलटकर कहा। "आपने कहा था कि घर का सच मेरे अपने मुँह और हाथ से निकलेगा। वो क्या सच है?"
उस्ताद ने कैंची रोक दी। उन्होंने बिना देखे कहा, "वो सच ये है कि तू अपने बाप से डरता है। और वो सच ये है कि तेरे बाप खुद अपने आप से डरते हैं। और ये दोनों डर एक ही दरवाज़े पर खड़े हैं। उस दरवाज़े को एक बार पूरा खोलना पड़ेगा। खिड़की से नहीं। दरवाज़े से।"
मैं बाहर निकला।
गली में अंधेरा उतर चुका था, और शबनम आपा गुमटी के बल्ब की तरफ़ देख रही थीं, जो आज हल्का-हल्का काँप रहा था।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। मैंने दोनों घंटियाँ मेज़ पर रखीं — बड़ी और छोटी। बड़ी घंटी चुप थी, पर छोटी घंटी से एक हल्की-सी गरमाहट आ रही थी, जैसे किसी ने उसे अभी छुआ हो।
फिर मैंने बड़ी घंटी को उठाया और धीरे से कहा, "अब बताओ। मेरे घर में सबसे ज़्यादा सच क्या है जो मेरे पास है?"
घंटी ने कहा, "तू ये जानता है कि तेरे पापा ने अंगूठा लगाया था। तुझे ये भी पता है कि तेरे दादा ने दुकान गिरवी रखी थी। तुझे ये भी पता है कि इलियास ने काग़ज़ क्यों नहीं दिया। और सबसे बड़ी बात — तुझे ये पता है कि तेरे पापा कोई कमज़ोर आदमी नहीं है, वो बस डरा हुआ है।"
"तो फिर सच क्या है?"
"सच ये है कि तू भी डरा हुआ है। तू जानता है कि अगर तेरे पापा ने अंगूठा लगाया, तो उन्होंने यह भी सोचा होगा कि तेरा क्या होगा। तू सिर्फ़ ये नहीं सोचता कि वो कितने दुखी हैं। तू ये भी सोचता है कि वो तुझे बचा नहीं पाए। और तू ये नहीं सोचता कि तू खुद भी उन्हें बचा नहीं पाया।"
मैंने घंटी को वापस जेब में रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मुझे ये एहसास हुआ कि कमरे में बैठा बल्ब भी मुझे देख रहा है।
बाहर गली में किसी की आवाज़ आई — मीरा की। वो शबनम आपा से कुछ पूछ रही थी। फिर मेरी दुकान के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैंने दरवाज़ा खोला। मीरा खड़ी थी। उसके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था, कोई कैमरा नहीं था। बस खाली हाथ थे।
"मैंने टेप रिकॉर्डर बंद कर दिया," उसने कहा। "सिर्फ़ तेरे उस्ताद की वजह से नहीं। मैं आज शाम यहाँ रुकी और मैंने तुम्हें देखा। तुमने उन दोनों को जोड़ा — नबी और श्यामलाल को। और तुमने उनके सामने झूठ नहीं बोला। तुमने काग़ज़ नहीं दिखाया, तुमने कोई करतब नहीं किया। तुमने बस कटोरे रखे।"
"तो?"
"तो मैं कल सुबह दस बजे आऊँगी।" उसने कहा। "और मैं सिर्फ़ काग़ज़ी सच लूँगी। और अगर तेरे पापा बोलने से डरें, तो तुम उन्हें मेरे सामने मत लाना। पहले उन्हें अपने आप से मिलवा देना। फिर मुझसे।"
वो पलटी। दो कदम चली। फिर रुकी।
"अंकुश," उसने कहा। "वो मेरा आज का आख़िरी सवाल नहीं है। पर मैं जानना चाहती हूँ — तेरी घंटी, वो वाकई बोलती है?"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी, जैसे चुप।
"कभी-कभी," मैंने कहा।
वो हँसी। पहली बार, छोटी-सी हँसी।
"मुझे लगा तू कहेगा कि वो चमत्कार है।"
"वो चमत्कार नहीं है, मीरा। वो सिर्फ़ ये याद दिलाती है कि लोग एक-दूसरे से बात क्यों नहीं करते।"
मीरा चली गई। मैंने दरवाज़ा बंद किया और मेज़ पर रखा काग़ज़ उठाया — वो पीला काग़ज़ जिस पर मेरे दादा का अंगूठा था। मैंने उसे उजाले में रखा और पढ़ा।
उस पर लिखा था — दुकान गिरवी, तारीख़, और नीचे एकदम छोटे अक्षरों में — "इसका हिसाब मेरे बेटे शंकर से माँगना।"
मेरा सीना भारी हो गया।
फिर मैंने घंटी को हथेली पर रखा और कहा, "मेरा घर इतना चुप क्यों है?"
घंटी ने जवाब दिया — "क्योंकि तेरा घर अब भी उस रात को ढो रहा है जिस रात तेरे दादा ने घंटी इलियास को दी थी, और तेरा बाप उस रात को ढो रहा है जिस रात उसने अंगूठा लगाया था। दो रातें, एक छत। और बीच में एक बेटा जो दोनों से हँसकर बात करता है, पर किसी से सच नहीं कहता।"
"तो क्या करूँ?"
"जब कल सुबह दस बजे सब बैठें, तो पहले तू अपना सच कह। पापा से पहले।"
"मैं क्या कहूँ?"
"यही कि तू डरता है। कि तू अकेले सब ठीक करना चाहता है। कि तू दुकान की साइन तक पढ़कर रोया था, पर किसी को नहीं बताया। यही तेरा सच है।"
मैंने घंटी को जेब में रखा और कुर्सी पर बैठ गया। दुकान के बाहर गली जैसे सो रही थी। शबनम आपा गुमटी का बल्ब बुझा रही थीं। पीपल की छाया दीवार पर झूल रही थी।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी — धीमी, पर साफ़।
"क्या?" मैंने कहा।
"बढ़," घंटी ने कहा।
"कितना?"
"साठ से सत्तर। क्योंकि तूने आज पहली बार उस्ताद से उसकी अपनी बात कहलवाई। उसने तुझे छोटी घंटी दी, और ये मिरासी में कम नहीं होता।"
"अब क्या?"
"अब जा और सो। कल सुबह जो होगा, वो अब तक के सबसे भारी जोड़ों में से एक होगा। और अंकुश —"
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