The Mysterious Bell – Chapter 114
जब मैं गुमटी की तरफ़ बढ़ा, तो पीछे से काका हरनाम की आवाज़ आई, "अंकुश!"
मैं रुका।
"कल आना। दुकान पर। मेरे पास तेरे लिए एक और लोटा है। और उसमें तेरा भी नाम खुदवाऊँगा।"
मैंने हाथ उठाया और मुस्कुरा दिया। चल दिया।
शबनम आपा की गुमटी पर पहुँचा तो शाम हो चुकी थी। कड़ाही में तेल चटक रहा था, समोसे की महक पूरी गली में फैल रही थी। ऊपर आसमान में पीली रोशनी थी जो धीरे-धीरे नीली हो रही थी।
चारों बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — गुमटी के सामने पत्थर पर बैठे थे। सानिया के हाथ में लाल कवर वाली कॉपी थी, जिसमें वो ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखती थी। गुड्डू के हाथ में एक टूटा पेंसिल था, जिसे वो उँगली पर घुमा रहा था। रफ़ीक़ गुमटी की छत पर लगे पुराने टायर की तरफ़ देख रहा था। और चिंटू — चिंटू अपने घुटने पर पट्टी बाँध रहा था।
मुझे देखकर चिंटू उठा। "उस्ताद! उस्ताद! हमने कुछ ढूँढा है!"
"क्या ढूँढा?"
सानिया ने कॉपी खोली। पन्ना पलटा। "बड़े साहब के दफ़्तर के बाहर दो आदमी रोज़ सुबह आठ बजे आते हैं। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में फ़ाइल। और वो गली की तरफ़ नहीं, पीछे के पुराने बिजलीघर की तरफ़ जाते हैं।"
गुड्डू बोला, "मैंने एक बार देखा। वो बिजलीघर के दरवाज़े पर दो बार खटखटाते हैं, फिर अंदर जाते हैं। दरवाज़ा बाहर से बंद रहता है, पर अंदर कोई है। मुझे लगता है कोई बैठा है।"
रफ़ीक़ ने कहा, "और उस्ताद, एक बात है। बबलू भैया ने कल रात किसी से फ़ोन पर कहा — 'उन्हें बोल दो, घंटी वाला लड़का बहुत हो गया। उसका काम तमाम करो।'"
मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया।
"किससे कहा?"
"पता नहीं। पर बबलू का चेहरा डरा हुआ था। और बबलू डरता नहीं है, उस्ताद। बबलू किसी से नहीं डरता।"
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा। जेब में घंटी ठंडी थी। उसने कुछ नहीं कहा। जब घंटी चुप रहती थी, तो मतलब वो खुद सुन रही होती थी। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने चश्मे के ऊपर से देखता है।
शबनम आपा ने चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ले। चार बच्चों ने मिलकर ये इकट्ठा किया है। और ये चारों कल से तेरी दुकान पर काम करेंगे। मैंने कह दिया।"
"आपा—"
"बहाने मत बना। तू अकेला सब नहीं करेगा। और ये चारों बेकार बैठे हैं। इनके हाथ में कुछ देना है।"
मैंने चारों को देखा।
सानिया ने कहा, "उस्ताद, हम डरते नहीं हैं। सच में। हमने एक बार ट्रकों के नीचे साइकिल डाली थी।"
"क्या?"
गुड्डू हँसा। "नहीं उस्ताद, ऐसा कुछ नहीं। सानिया मज़ाक कर रही है। हम सिर्फ़ देखते हैं। छुपकर। पीछे से।"
मैंने चाय पी। गर्म। बहुत अच्छी।
"ठीक है," मैंने कहा। "कल सुबह सात बजे। दुकान पर। पहला काम — मेरे औज़ारों की सफ़ाई। दूसरा काम — जो भी बाहर से आए, उसका नाम और काम पूछना। बिना डरे। और तीसरा काम—"
मैं रुका। चारों ने कान खड़े किए।
"तीसरा काम — किसी को कुछ नहीं बताना। जो दुकान में हो, दुकान में रहे। जो आपा की गुमटी पर हो, गुमटी पर रहे।"
सानिया ने हाथ बढ़ाया। "पक्का।"
मैंने उससे हाथ मिलाया। फिर गुड्डू से। फिर रफ़ीक़ से। फिर चिंटू से। चिंटू का हाथ छोटा था, पर पकड़ मज़बूत थी — जैसे किसी पुराने मिस्त्री का हाथ। मैंने उसकी तरफ़ देखा तो वो मुस्कुरा दिया।
शबनम आपा ने देखा और मुस्कुराई। "अब जा। तेरी माँ इंतज़ार कर रही होगी।"
मैं उठा। रास्ते में सोच रहा था कि मैंने अभी क्या किया। चार बच्चों को अपने साथ जोड़ लिया। मैं, जो खुद अकेले सब करने की ज़िद में जी रहा था। जिसे लगता था कि मदद माँगना कमज़ोरी है। और अब देखो — दो साल के टिंकू की जगह चार बच्चे, और मुझे कुछ अजीब-सा अच्छा लग रहा था।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी। ज़ोर से।
मैं रुक गया।
गुमटी के सामने वाली गली में एक आदमी खड़ा था। सत्तर के ऊपर, सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल।
उस्ताद अली बक्श।
वो अपनी दुकान से बाहर आए थे। उनका हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर था, जैसे अभी भी सिलाई कर रहे हों — पर मशीन बंद थी। उनकी आँखें मेरी जेब पर थीं। सीधी। बिना पलक झपकाए।
"घंटी," उन्होंने कहा। सिर्फ़ एक शब्द। धीमा। भारी। जैसे कोई पत्थर कुएँ में गिरा हो।
मैं सीधा खड़ा रहा।
उस्ताद ने एक कदम बढ़ाया। फिर रुके। फिर पलटकर अपनी दुकान की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। जैसे दो रास्तों के बीच खड़े हों। जैसे उन्हें खुद नहीं पता हो कि अंदर जाएँ या बाहर आएँ।
"अंकुश।"
"जी उस्ताद।"
"कौन बजा रहा था?"
"कुछ नहीं उस्ताद। हवा।"
"हवा।" उन्होंने चश्मे के ऊपर से देखा। "हवा से घंटी बजती है, अंकुश। पर हवा से घंटी बोलती नहीं है। और मैंने अभी बोलते सुना है।"
मैं चुप रहा।
उस्ताद ने चारों बच्चों को देखा, जो अब चुप बैठे थे। शबनम आपा ने चिमटी उठाई और समोसे की कड़ाही में डाल दी, पर उनकी आँखें भी उस्ताद पर थीं।
उस्ताद एक और कदम बढ़े। फिर रुके। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, रुमाल से पोंछा, और वापस पहना।
"अंदर आ।"
"उस्ताद—"
"अंदर आ, अंकुश। दुकान में। अभी।"
मैं उनके पीछे-पीछे गया। उस्ताद ने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर जाने का इशारा किया। मैं अंदर गया तो सिलाई मशीन की टिक-टिक बंद हो गई थी। मशीन के ऊपर कपड़ा रखा था, आधा सिला हुआ। सुई ऊपर थी, जैसे किसी ने काम बीच में छोड़ दिया हो। पास में पेंसिल रखी थी। एक तरफ़ दराज़ खुली थी।
उस्ताद ने दरवाज़ा बंद किया।
फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
"क्या लिया तू उसमें?"
"क्या लियामैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा और उस्ताद की तरफ़ देखा। उनका चश्मा अब भी नाक पर फिसला हुआ था, और उनके हाथ सिलाई मशीन के हैंडल पर टिके थे — जैसे वो मशीन से बात कर रहे हों।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपने मुझे अभी तक नहीं बताया कि इस काग़ज़ का मतलब क्या है।"
उस्ताद ने चश्मा उतारा। रुमाल से पोंछा। फिर बोले, "इसका मतलब ये है कि तेरे दादा ने दुकान बेची नहीं थी। उन्होंने गिरवी रखी थी। और गिरवी रखने वाला आदमी मुझे जानता था। मैं उस वक़्त जवान था, अंकुश। मेरी दाढ़ी काली थी और मेरे पास भी एक घंटी थी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — जैसे कोई बहुत पुराना ज़ख्म अचानक खुल गया हो।
"उस्ताद, आपके पास भी घंटी थी?"
"हाँ। और वो घंटी मेरे भाई इलियास के पास थी।"
मैं सीधा बैठ गया।
"इलियास आपका भाई है?"
उस्ताद ने सिर हिलाया। एक बार। बस एक बार। जैसे ये बात कहने में उन्हें पूरी ताक़त लगी हो।
"पचास साल पहले, अंकुश, हम तीन थे। मैं, इलियास और विजय। विजय भारद्वाज। रणवीर का बाप।" उन्होंने रुककर साँस ली। "हम तीनों ने मिलकर ये घंटी चलाई थी। एक ही घंटी, तीन हाथ। हम गली-गली घूमकर टूटे रिश्ते जोड़ते थे। कोई हमें जानता नहीं था। हम बस कहते थे — हम दर्ज़ी हैं, हम साइकिल वाले हैं, हम कुछ भी हैं। और लोग हमें बुलाते थे।"
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"फिर एक दिन विजय ने कहा कि ये घंटी हमें अमीर बना सकती है। हम इसे बाज़ार में ले चलें। लोग इसके लिए पैसे देंगे। मैंने मना किया। इलियास ने मना किया। पर विजय नहीं माना।"
"फिर क्या हुआ?"
"फिर एक रात विजय ने घंटी चुरा ली। उसने उसे बाज़ार में दिखाया। उसने लोगों को बताया कि ये घंटी चमत्कार करती है। और शहर भर से लोग आए। कुछ लोगों के रिश्ते जुड़े, कुछ के टूटे। और जो टूटे, उन्होंने विजय को कोसा। विजय ने कहा कि घंटी में दोष है, वो अधूरी है। उसने घंटी को तोड़ दिया।"
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