The Mysterious Bell113 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 113

7 min read November 5, 2026

दो कदम और चले, फिर फिर रुके। मैंने देखा कि उनका हाथ लाठी पर कस गया।

तभी काका हरनाम आए। पीली धोती, सिर पर टोपी, हाथ में पीतल का पुराना लोटा। उन्होंने भी बोर्ड देखा और वहीं जम गए।

दोनों बीच में बोर्ड था, और दोनों के बीच में इकतालीस साल।

मैं धीरे-धीरे पास गया। मैंने कुछ नहीं कहा। मैं बस बोर्ड के पास खड़ा हो गया और अपनी जेब में हाथ डाल दिया।

घंटी ठंडी थी। चुप थी।

काका हरनाम ने पहले बोला। आवाज़ में वो भारीपन था जो सिर्फ़ बूढ़े लोगों की आवाज़ में आता है, जब वो कुछ ऐसा बोलते हैं जो बरसों दबा था।

"यह बोर्ड तो जल गया था।"

बाबा हाशिम ने कान की रुई को छुआ, जैसे सुना हो और यक़ीन न आया हो।

"क्या कहा?"

"मैंने कहा, यह बोर्ड जल गया था। मैंने खुद जलाया था।"

बाबा हाशिम ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और बहुत धीरे बोले, "तूने जलाया था?"

"हाँ। उस रात। जिस रात दुकान बंद की।"

"मैंने भी उस रात कुछ जलाया था।" बाबा हाशिम ने कहा। "मैंने अपनी कॉपी जलाई थी।"

दोनों चुप हो गए।

मैंने साँस ली और बीच में बोला, "बाबा, काका, मैं अंकुश हूँ। इस गली में साइकिल ठीक करता हूँ। मुझे कुछ पूछना है।"

काका हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा, फिर टोपी ठीक की। "तू शंकर का बेटा है?"

"हाँ।"

"तेरे पापा बैठते थे यहाँ? पीपल के नीचे? बच्चा था तब?"

"हाँ, बैठता था।"

"हूँ।" उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में कुछ नरम पड़ गया। "शंकर बैठता था। चुपचाप। कुछ नहीं बोलता था। बस हम दोनों को देखता रहता था।"

बाबा हाशिम ने कहा, "वो अब भी चुप है।"

मेरा गला भर आया। मैंने जल्दी से कहा, "बाबा, इकतालीस साल पहले क्या हुआ था?"

दोनों चुप।

मैंने कहा, "मैं जानता हूँ कि मुझे पूछने का हक़ नहीं है। यह आप दोनों का ज़ख़्म है। पर इस गली में जो हो रहा है, वो देखिए। रोज़ कोई न कोई बूढ़ा उठकर यहाँ आता है और अपनी चुप्पी का हिसाब देता है। मुझे नहीं पता कि यह सही है या ग़लत। मुझे बस इतना पता है कि चुप्पी अब और नहीं चलेगी।"

काका हरनाम ने लोटा ज़मीन पर रखा।

"हम साझेदार थे।" उन्होंने कहा। "पुर्ज़ों की दुकान थी। दोनों के नाम से। गल्ला एक था। हिसाब एक था। चाय हाशिम लाता था, समोसे मैं लाता था। दस साल ऐसे ही निकल गए।"

बाबा हाशिम ने सिर हिलाया। "दस साल।"

काका हरनाम बोले, "फिर एक दिन गल्ले में पैसे कम मिले। दो सौ उन्नीस रुपये कम। मैंने गिना, दोबारा गिना, तीन बार गिना। कम थे।"

"और तूने मुझसे पूछा नहीं।" बाबा हाशिम ने कहा। यह सवाल नहीं था। यह बयान था।

"नहीं पूछा।"

"क्यों?"

काका हरनाम ने अपनी टोपी के नीचे से पसीना पोंछा। "क्योंकि मैं डरता था कि तू हाँ कह देगा।"

चबूतरी पर बैठे दो-तीन और बुज़ुर्ग चुप हो गए। दूर स्कूल की छत से एक पतंग उड़ रही थी और किसी बच्चे की चिल्लाहट आ रही थी, पर यहाँ सब ठहर गया था।

बाबा हाशिम ने लाठी छोड़ दी और दोनों हाथों से अपना घुटना पकड़ लिया।

"मैंने उस दिन गल्ले से दो सौ उन्नीस रुपये निकाले थे।"

सन्नाटा।

"मेरी बीवी के पेट में दर्द उठा था। रात को। डॉक्टर के पास ले जाना था। दुकान बंद करके, घर जाकर, ताले में से अपने पैसे निकालने का वक़्त नहीं था। मैंने गल्ले से निकाले। सोचा, सुबह लौटा दूँगा।"

"और?"

"और सुबह लौटाने की बात कहते हुए मुझसे कही नहीं गई।" उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। "मैं शर्मिंदा था, हरनाम। मैं दस साल का साझेदार था, और मुझे अपनी बीवी के लिए दुकान के गल्ले से पैसे लेने पड़ रहे थे। मैंने सोचा, चुप रहूँगा, कल देखेंगे। और कल तूने मुझसे कुछ पूछा ही नहीं। और मैंने सोचा कि तू जान गया है, और तू मुझे इज़्ज़त दे रहा है।"

काका हरनाम ने आँखें ऊपर कीं।

"और मैंने सोचा कि तू जान गया है, और तू मुझे शक की नज़र से देख रहा है।"

दोनों ने एक-दूसरे को देखा। पहली बार। इकतालीस साल में पहली बार।

काका हरनाम की आवाज़ टूटी। "मैंने इकतालीस साल इंतज़ार किया कि तू पूछेगा। तू कह देगा — हरनाम, वो पैसे मैंने लिए थे। और मैं कहता — हाँ, हाशिम, क्यों नहीं लिए। पता नहीं क्यों मैं खुद कभी नहीं पूछा।"

"मैंने भी नहीं पूछा।"

"नहीं पूछा।"

"बस इसी चुप्पी ने हमारी दुकान ख़त्म कर दी।"

"नहीं।" काका हरनाम ने कहा। "इस चुप्पी ने हमें ख़त्म कर दिया। दुकान तो बहाना थी।"

तब बाबा हाशिम ने कुछ किया जो मैं भूलूँगा नहीं। उन्होंने अपनी जेब से एक छोटा, फटा, मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला और उसे सीधा किया। उसमें से एक दो-दो रुपये का सिक्का निकाला और काका हरनाम की तरफ़ बढ़ा दिया।

"दो रुपये बाकी थे। उस दिन मैंने गिनती में उन्नीस के साथ दो रुपये अपने पास रख लिए थे — चाय के लिए। भूल गया था। ये पूरे हो गए।"

काका हरनाम ने सिक्का नहीं लिया। उन्होंने लोटा उठाया और उसे पलट दिया। उसके नीचे लोहे की छोटी पत्ती जड़ी थी, जिस पर खुदा था — "शिम"।

"यह मैंने उसी दिन जड़वाई"यह मैंने उसी दिन जड़वाई थी," काका हरनाम ने कहा, "अपने लोटे के नीचे। ताकि मेरे होठों से कुछ न निकले, पर मेरा लोटा हर दिन बोले। हर बार पानी भरो, तो नीचे से आवाज़ आए — शिम।"

बाबा हाशिम ने वो पत्ती देखी। उनका हाथ काँपा। फिर उन्होंने अपना लोटा उठाया, उसमें पानी भरा और पीया। धीरे। बहुत धीरे। जैसे पानी नहीं, कोई पुरानी दुआ पी रहे हों।

"पानी में मेरे हिस्से का नाम है," उन्होंने कहा।

"पानी में तेरा नाम है," काका हरनाम ने कहा। "मेरे लोटे का पानी इकतालीस साल से तेरे नाम का है, हाशिम।"

दोनों चुप बैठ गए।

ये चुप्पी अलग थी। पहले वाली चुप्पी में चुभन थी, शक था, हिसाब था। इस चुप्पी में बस एक-दूसरे को देखना था। जैसे दो आदमी जो इकतालीस साल अंधेरे में चलते रहे और अब अचानक एक कमरे में आमने-सामने बैठ गए हों, और उन्हें समझ नहीं आ रहा हो कि पहले क्या कहें।

मैंने सोचा, मुझे कुछ नहीं कहना चाहिए।

घंटी मेरी जेब में ठंडी हो रही थी, फिर गर्म। गर्म, फिर ठंडी। जैसे कोई गिनती कर रहा हो। मैंने हाथ जेब पर रखा तो लगा जैसे घंटी अंदर से मुस्कुरा रही है।

तभी वो बजी। धीरे से। मेरे कान के पास। इतनी धीमी कि लगा किसी ने साँस ली हो।

"छत्तीस," उसने कहा।

मैंने मन में गिना। पहले बयालीस थे। छत्तीस जुड़ गए। कुल अठहत्तर।

मैंने बाबा हाशिम को देखा। उनके हाथ में अब भी वो दो रुपये का सिक्का था। काका हरनाम ने अपना हाथ उनके हाथ पर रखा और सिक्का उनकी हथेली में बंद कर दिया।

"ये तेरे पास रहेगा," काका हरनाम ने कहा। "मेरे पास तो छियालीस साल का पानी है। ये सिक्का तेरे पास रहेगा।"

"और तेरा लोटा?"

"लोटा दोनों का।"

बाबा हाशिम ने सिर हिलाया। फिर वो उठे। उनकी कमर झुकी थी, उम्र ने झुकाई थी। पर उस वक़्त वो सीधे खड़े थे। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

काका हरनाम ने भी हाथ बढ़ाया।

दोनों हाथ मिले। पहले धीरे। फिर ज़ोर से। फिर दोनों गले लग गए।

पीपल की पत्तियाँ ऊपर से गिरीं। चबूतरी पर बैठे और बुज़ुर्गों ने देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा। बस एक बूढ़े ने अपना रूमाल निकाला और आँखें पोंछीं। दूसरे बूढ़े ने उसका कंधा थपथपाया।

मैं वहाँ से खिसक लिया।

मेरे पैर हल्के थे। चार जोड़ हो चुके थे इस एक शाम में। पहले चबूतरी पर, फिर पीपल के नीचे, फिर भूरा कुत्ता, फिर खेलू और बेलू — और अब ये। अठहत्तर अंक। मैंने कभी सोचा नहीं था कि घंटी इतनी उदार हो सकती है।

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