The Mysterious Bell – Chapter 112
और फिर रुक गए।
और मेरी जेब से आवाज़ आई, पहली बार दो शब्दों में, जैसे कोई बहुत दूर से बुला रहा हो —
"अब समझा।"
॥
"अब समझा।"
बस दो शब्द। और मेरे हाथ से चाय का गिलास काँप गया।
इलियास बाबा ने अपनी रुकी हुई घड़ी की तरफ़ देखा। जैसे वो घड़ी भी उन दो शब्दों को सुन रही हो और अपना हिसाब माँग रही हो।
मैंने गिलास मेज़ पर रखा। शबनम आपा की गुमटी में अचानक इतनी चुप्पी हो गई कि समोसे के तवे की आवाज़ दूर की किसी गली से आती लगी।
मैंने कहा, "बाबा, आप उस्ताद अली बक्श के भाई हैं।"
इलियास बाबा ने चाय की चुस्की ली। फिर बोले, "तेरी घंटी ने यह नहीं कहा। तूने खुद पहचाना।"
"पहचाना नहीं। अंदाज़ा लगाया।"
"अंदाज़ा ही तो पहचान होती है, बेटा। बाकी सब तो लोगों का कहा हुआ होता है।"
मैं चुप हो गया। शबनम आपा ने चुपचाप एक और गिलास मेरी तरफ़ सरका दिया। बिना कुछ पूछे। मैंने सिर हिलाया, धन्यवाद की जगह।
इलियास बाबा ने वो पीला काग़ज़ मेरे सामने रखा। उस पर नीली स्याही में लिखा था और नीचे लाल अंगूठा। मैंने उसे उँगली से छुआ। काग़ज़ सूखा था, पर मुझे लगा जैसे अभी भी गीला है।
"बाबा, एक बात साफ़ कर दीजिए। आप पच्चीस साल से यह काग़ज़ लेकर क्यों नहीं आए?"
उन्होंने उँगली उठाई। "पहले यह बता कि तेरे घर में पिछले एक हफ़्ते से क्या हो रहा है।"
"घर में मेरे पापा ने कबूल किया कि उन्होंने अंगूठा लगाया था। माँ ने कबूल किया कि वो पाँच साल से जानती थीं। मैंने कबूल किया कि मैं आज तक खुद को बच्चा समझता रहा।"
इलियास बाबा ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखें बहुत धीमी थीं, जैसे कोई पुराना कुआँ हो जिसमें बरसों से रस्सी नहीं गई।
उन्होंने कहा, "तो तेरा घर अब बोल रहा है।"
"बोल तो रहा है। पर बात पूरी नहीं हो रही।"
"पूरी नहीं होगी। घर की बात कभी पूरी नहीं होती, बेटा। वो बस शुरू हो जाती है। और शुरू होने के लिए ही तो किसी को बोलना पड़ता है।"
मैंने उस काग़ज़ को दोनों हाथों से समेटा और जेब में रखा। मेरी दूसरी जेब में बड़ी घंटी थी, जो अब ठंडी हो चुकी थी, जैसे कुछ कहकर थक गई हो।
"बाबा, कल सुबह दस बजे दुकान पर सभा है। पापा बोलेंगे। उस्ताद बोलेंगे। आप आएँगे?"
इलियास बाबा ने अपनी रुकी घड़ी की तरफ़ देखा।
"मैं सभा में नहीं बोलूँगा।"
मेरा दिल धड़का। "तो काग़ज़?"
"काग़ज़ मैं रख दूँगा। मेज़ पर। सबके सामने। जिसे पढ़ना हो, पढ़े।" उन्होंने चाय ख़त्म की और गिलास रखा। "मैं पच्चीस साल से बोलता आया हूँ, अंकुश। बस सुनने वाला नहीं था। अब सुनने वाले आ गए हैं, तो मेरी ज़ुबान की ज़रूरत नहीं। काग़ज़ काफ़ी है।"
वो उठे। उनकी घड़ी ज़ोर से एक बार टिकी — जैसे सालों बाद किसी ने उसे छेड़ दिया हो — और फिर रुक गई।
जाते-जाते उन्होंने कहा, "हाँ, एक बात। तेरी घंटी ने अभी मेरा नाम लिया। मैंने सुना।"
"और?"
"और मैं पच्चीस साल से इस आवाज़ से डरता आया हूँ। क्योंकि यह घंटी बजती नहीं, गिनती करती है। और जिस दिन इसकी गिनती पूरी हो जाएगी, उस दिन यह गली में उस आदमी का नाम बोलेगी जो सबसे ज़्यादा चुप है।"
वो गुमटी के पीछे मुड़ गए, जहाँ शबनम आपा का छोटा कमरा है। मैं वहीं बैठा रहा, और मेरे अंदर एक हिसाब चलता रहा।
बयालीस अंक। तीन धागे बाकी। पापा का डरा हुआ चेहरा। मीरा का कैमरा। सफ़ेद गाड़ी। अस्पताल की दीवार के पास खोदा जा रहा गड्ढा। और अब एक और नाम — इलियास।
मैं उठा और अपनी दुकान की तरफ़ चला। रास्ते में पीपल के नीचे से गुज़रा, तो देखा कि चबूतरी के दोनों सिरों पर दो बुज़ुर्ग बैठे थे। दोनों ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ भी नहीं देखा।
उस वक़्त मुझे क्या पता था कि अगली सुबह मेरा पूरा दिन इन्हीं दोनों का होगा।
सुबह मैंने दुकान जल्दी खोली। बोर्ड पर अब धूल नहीं थी, और "शंकर यादव और बेटे" साफ़ दिख रहा था। मैंने उसे देखकर हाथ जोड़े, जैसे मंदिर में करते हैं। फिर अपने आप पर हँसा और पोंछा लेकर ट्यूब में हाथ डाल दिए।
लगभग ग्यारह बजे चारों जासूस आए।
सानिया आगे, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसके पीछे गुड्डू, जो चलते-चलते ट्रकों की गिनती कर रहा था। उसके पीछे रफ़ीक़, जो अपनी जेब से कुछ निकालकर छुपा रहा था। और सबसे पीछे चिंटू, जिसकी नाक बह रही थी और जो उसे आस्तीन से पोंछ रहा था।
सानिया ने कॉपी खोली और सीधे बोली, "उस्ताद, हमने काम कर लिया।"
"कौन सा काम?"
"जो आपने नहीं दिया।"
मैं रिंच हाथ में लिए खड़ा रह गया। "अच्छा। सुनाओ।"
सानिया ने काग़ज़ पलटा। "पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग हैं। एक बाबा हाशिम, एक काका हरनाम। दोनों रोज़ शाम चार बजे आते हैं। दोनों एक ही वक़्त पर आते हैं, पर एक-दूसरे को देखते नहीं।"
गुड्डू बोला, "मैंने गिना है। इकतालीस दिन से मैंने गिना है। एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब कोई एक आया हो और दूसरा न आया हो।"
रफ़ीक़ ने जेब से एक टुकड़ा निकाला। "यह बाबा हाशिम की लाठी के नीचे से गिरा था। इस पर कुछ लिखा है।"
मैंने देखा। लोहे की छोटी पत्ती थी, जिस पर खुदा था "हा"।
चिंटू ने अपनी नाक पोंछी और बोला, "और काका हरनाम के लोटे के नीचे भी कुछ खुदा है। वो लोटा कभी नहीं धोता, उस्ताद। कभी नहीं।"
मैंने रिंच रख दी।
"सानिया, कहाँ से लाई हो यह सब?"
सानिया ने गर्व से कहा, "हमने सुना था कि दोनों बुज़ुर्ग पहले साझेदार थे। तो हमने शबनम आपा से पूछा।"
"और आपा ने बता दिया?"
"आपा ने डाँटा। फिर चुप हुई। फिर गुमटी के पीछे से एक लकड़ी का बोर्ड निकालकर दिया और कहा — ले जाओ, अब इसे मेरे पीछे मत छुपाओ।"
मेरा दिल ज़ोर से बजा।
"बोर्ड कहाँ है?"
"गुमटी में। आपा ने कहा कि लेने तुम खुद आना। किसी बच्चे के हाथ में नहीं दूँगी।"
मैंने कपड़े से हाथ पोंछे और सीधे गुमटी पहुँचा।
शबनम आपा तवे पर समोसे रख रही थीं। मुझे देखकर बिना रुके बोलीं, "बोर्ड पीछे है। उसी दीवार के साथ। और हाँ, चार बजे से पहले मुझसे कुछ मत पूछना। चार बजे मैं खुद वहाँ रहूँगी।"
"आपा—"
"अंकुश, वो दोनों मेरे पापा के दोस्त थे। मेरे पापा ने यह गुमटी खोलने के लिए उन्हीं से उधार लिया था। और जब उनकी दुकान बंद हुई, तो मेरे पापा ने यह बोर्ड उतारकर रख लिया था। कहा था — जिस दिन ये दोनों फिर बोलेंगे, उस दिन यह बोर्ड फिर टँगेगा।" उन्होंने चिमटी उठाई। "इकतालीस साल हो गए। मेरे पापा भी नहीं रहे। बोर्ड अब भी पड़ा है।"
मैं पीछे गया। दीवार से टिका बोर्ड धूल और मकड़ी के जाल से ढका था। मैंने उसे खींचकर बाहर लाया और कपड़े से रगड़ा।
धूल हटी, तो नीली स्याही और पीली लकड़ी में लिखा उभरा —
"हाशिम और हरनाम। साइकिल के पुर्ज़े। पुराना बाज़ार।"
मैंने उसे देखा और मुझे अपना बोर्ड याद आ गया। "शंकर यादव और बेटे"। दो नाम, एक दुकान, और बीच में एक सवाल।
मैं बोर्ड उठाकर पीपल की तरफ़ चला।
चार बजे से दस मिनट पहले मैंने वो बोर्ड पीपल के तने से टिका दिया। ज़मीन पर रखा, ऊपर की तरफ़ उसका लिखा हुआ हिस्सा। फिर मैं दूर जाकर अपनी दुकान के सामने खड़ा हो गया, जैसे कुछ न किया हो।
चार बजे बाबा हाशिम आए। लाठी के सहारे, धीरे-धीरे कदम। कान में रुई थी, और उनके होंठ हमेशा हिलते रहते थे, जैसे अंदर ही अंदर कोई हिसाब कर रहे हों।
उन्होंने बोर्ड देखा।
और वहीं रुक गए।
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