The Mysterious Bell – Chapter 1165
मैं चौखट पर खड़ा रहा। मैंने अंदर पैर नहीं रखा।
वो लौटीं। स्टील का गिलास। पानी।
उन्होंने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया — और फिर हाथ रोक लिया।
"अगर मैं ये दे दूँ," उन्होंने कहा, "तो मेरे आदमी को क्या कहूँगी?"
"सच कह दीजिए," मैंने कहा। "कि एक लड़का रात में आया था, उसने मेरा नाम बोला, और मैंने उसे पानी पिला दिया।"
"और अगर वो नाराज़ हो?"
"तो मैं आपके आदमी से बात कर लूँगा," मैंने कहा। "पर आप झूठ मत बोलिए। इस गली में झूठ बहुत हो गया है।"
उन्होंने गिलास मेरे हाथ में रख दिया।
पानी ठंडा था। मैंने पिया। पूरा।
गिलास लौटाते वक़्त मेरी जेब से कोई चीज़ खड़खड़ाई। घंटी।
इतनी देर से वो चुप थी, बर्फ़ जैसी, बेजान — और जैसे ही उनका हाथ मेरे हाथ के पास आया, गिलास लेने, घंटी ने एक आवाज़ की।
बहुत छोटी। बहुत धीमी।
जैसे कोई दूर से कहे — ठीक है।
ज़ुबैदा ने गिलास पकड़ा और ठिठक गईं।
"ये आवाज़?" उन्होंने कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "ये मेरी साइकिल की घंटी है। पुरानी है। कभी-कभी अपने आप बज जाती है।"
उन्होंने मुझे देखा। मैंने वो झूठ नहीं बढ़ाया। मैं चुप रहा।
फिर वो दरवाज़ा बंद करने लगीं।
और रुकीं।
"अंकुश।"
"जी।"
"वो सफ़ेद कुर्ते वाले," उन्होंने धीरे कहा, "कल रात भी आए थे। दो बजे। मेरे दरवाज़े पर। कहा कि जो काग़ज़ तुमने पढ़ा, वो अभी भी मेरे पास रहेगा। और जिस दिन मैं इसे किसी को बताऊँगी, उस दिन मेरे आदमी का नाम साइट से कट जाएगा।"
मेरा हाथ जेब पर गया।
"तो वो नाम उन्होंने आपको दिया था?"
"वो मेरा अपना नाम है," उन्होंने कहा, और इस बार आवाज़ में ज़रा भी काँप नहीं थी। "पर उन्होंने उसे काग़ज़ पर लिखकर ऐसा बना दिया जैसे मैं कुछ उधार ले रही हूँ।"
फिर उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया।
कुंडी गिरी। अंदर बत्ती बुझी।
और मैं गली में लौटा — घंटी हथेली में। ठंडी थी, पर सुबह जितनी नहीं।
मैंने चलते-चलते कॉपी खोली, और पेंसिल से लिखा —
"उसका नाम ज़ुबैदा है। और उसने मुझे पानी पिलाया। घंटी ने सुना। बस।"
सुबह सात बजे सफ़ेद कुर्ते वाले पहले स्कूल पहुँचे।
किशनलाल काका ने बताया कि उनके हाथ में मोटा रजिस्टर था और वो एक-एक अभिभावक का नाम पूछ रहे थे।
"क्या पूछ रहे थे?"
"यही," काका ने कहा, दाल की बोरी पर बैठे-बैठे, आँखें नीची किए हुए। "कि तुम्हारा बच्चा अंकुश की दुकान के पास से जाता है? और अगर जाता है तो कल से बंद कर दो।"
"क्यों?"
"क्योंकि," काका ने कहा, और उनका हाथ चने के लोटे पर काँपा, "कह रहे थे कि अंकुश के पास जाने वाले का घर टूटता है। उसके हाथ में काला जादू है। और उसकी घंटी उस शहर से बोलती है जहाँ मुर्दे जाते हैं।"
मैं हँसा। सिर्फ़ इसलिए कि अगर न हँसता, तो कुछ और होता।
"काका," मैंने कहा, "आपने क्या कहा?"
काका ने सिर उठाया। बहुत देर तक मुझे देखा।
"मैंने कुछ नहीं कहा, बेटा," उन्होंने धीरे कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। जिस आदमी के पास पैसा है और काग़ज़ है, उसके सामने मैं चुप हो जाता हूँ। मैं बूढ़ा हूँ। मेरी दुकान का काग़ज़ बोरी के नीचे रखा है — जलाया नहीं। बस इतना काफ़ी है।"
मैं दुकान से निकला। स्कूल गेट तक गया।
वहाँ सानिया के अब्बा खड़े थे। और गुड्डू के पापा खड़े थे। और चिंटू की अम्मी, और रफ़ीक़ की अम्मी। चारों के हाथ में काग़ज़।
सानिया के अब्बा ने मुझे देखा और मुँह फेर लिया।
"सुनिए," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि बच्चों को मेरी दुकान से रोकने की ज़रूरत नहीं है। मैं उन्हें साइकिल ठीक करना सिखाता हूँ। उन्हें मज़दूरी नहीं देता, पैसा नहीं लेता।"
"तुम्हारे पास कोई नहीं आएगा," सानिया के अब्बा ने कहा, मेरी तरफ़ देखे बिना।
"अब्बा," सानिया ने पीछे से कहा। बस एक शब्द। वो भी धीरे। "अब्बा, वो उस्ताद के यहाँ से भी…"
"चुप," उसने कहा। "तू घर चल।"
सानिया ने मेरी तरफ़ देखा।
और उसकी नज़र में वो नहीं था जो पहले था। वो नज़र सवाल नहीं थी, नराज़गी नहीं थी — वो ऐसी थी जैसे कोई बच्चा किसी को आख़िरी बार देख रहा हो, चुपचाप, बिना कहे।
फिर वो मुड़ी और चली गई।
मैं स्कूल से गुमटी की तरफ़ गया।
शबनम आपा की गुमटी पर काग़ज़ अब भी चिपका था — अस्थायी रूप से काम बंद।
पर चूल्हा जल रहा था। धुआँ उठ रहा था। और मेज़ पर सिर्फ़ दो कटोरे रखे थे।
"इतना कम?" मैंने पूछा।
"आज तीन ग्राहक आए," उन्होंने कहा, चिमटी चलाते हुए, मेरी तरफ़ देखे बिना। "एक ने चाय ली, दो ने सिर्फ़ पूछा कि तेरी दुकान अभी चल रही है क्या। और एक बारह साल की लड़की आई थी, जो रोज़ आती थी। उसने मुझे देखकर चाय मँगाई, फिर तुम्हें दुकान के बाहर खड़ा देखा, और कहकर चली गई कि आंटी आज मत बनाइए।"
"आपा…"
"मैंने चूल्हा नहीं बुझाया," उन्होंने कहा, और इस बार सीधा मुझे देखा। "समझे? इस गुमटी में चूल्हा उस दिन बुझेगा जिस दिन मेरी लाश उठेगी। चाय नहीं बिक रही, खैर। पानी पीने वाले तो आते हैं। पानी पर किसी का ठेका नहीं है।"
रज़िया पीछे बर्तन धो रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुँह फेर लिया।
"रज़िया," शबनम आपा ने कहा।
"मैं कुछ नहीं बोली," रज़िया ने कहा।
"नहीं बोली, इसलिए बोल।"
रज़िया ने बर्तन पटक दिया।
"बोलूँ क्या?" वो बोली। "कि सारी गली डर गई है? कि सुबह जो मेरे पास चाय लेने आते थे, वो आज मुँह फेरकर निकल गए? कि मुझे बीस साल का सामान बाँधकर जाना पड़ेगा या नहीं? ये सब किसकी वजह से है? मैं तुझे दोष नहीं दे रही, अंकुश। पर मैं जानती हूँ कि जो फ़ाइलें घूम रही हैं, उनमें तेरा नाम है। और जिसके नाम वाली फ़ाइल आती है, उसके आसपास सब फटता है।"
"रज़िया।" शबनम आपा की आवाज़ सख़्त हुई।
"सच बोल रही हूँ," रज़िया ने कहा, और उसकी आँखें भर आईं। "मैं पंद्रह साल बाद लौटी हूँ। मैं दोबारा जाना नहीं चाहती।"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि उसकी बात में वो ज़हर नहीं था जो गुस्से में होता है। उसमें डर था।
और डर से लड़ना, मुझे अब तक नहीं आता था।
दोपहर में उस्ताद अली बक्श की दुकान की खबर आई।
भोला भाई ने बताया कि सुबह दस बजे दो सफ़ेद कुर्ते वाले आए, मोटी फ़ाइल लिए। उन्होंने शटर पर बिना मुहर काग़ज़ पहले ही चिपका दिया था — "दो दिन में दुकान खाली"।
"उस्ताद ने क्या कहा?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं," भोला ने कहा। "बस अपनी मशीन पर से सफ़ेद कपड़ा उतारा, और फिर सिर्फ़ इतना कहा — 'मशीन दुकान में नहीं रहती। हाथों में रहती है।' और अपनी सुई निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दी।"
मैं उनकी दुकान पर गया।
शटर आधा था। मशीन पर फिर से सफ़ेद कपड़ा ढका हुआ था।
उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। हाथ में कुछ नहीं।
"उस्ताद।"
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
"फ़ाइल वाले के हाथ में एक नाम था," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "लाल स्याही में। मैंने पढ़ा नहीं। मुझे लगा, जो नाम लाल स्याही में लिखा जाता है, वो पढ़ने के लिए नहीं होता।"
"कोई अंदाज़ा?"
उस्ताद ने धीरे सिर हिलाया।
"जब पचास साल पहले मेरी दुकान जली थी," उन्होंने कहा, "उस रात भी किसी के हाथ में लाल स्याही में एक नाम था। उस दिन से मुझे लगता था कि मैंने अपनी दुकान बचा ली। आज पता चला, मैंने सिर्फ़ समय बचाया था।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तू डरा हुआ है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है।"
"प्रश्न क्यों?"
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