The Mysterious Bell – Chapter 1163
गुड्डू के पापा ने कहा, "आज ये भी कहता है कि मैंने इसकी बाल्टी उठाई।"
"मैंने उठाई तो नहीं कहा—"
"तू बीच में मत आ।"
"मैं बीच में नहीं—"
"तेरे बिना यह झगड़ा ही नहीं होता," सानिया के अब्बा ने कहा।
वो चुप हो गए और खुद उस वाक्य से झटके में आए।
गुड्डू के पापा ने कहा, "सही कह रहा है। पहले ऐसा नहीं था। पहले हम नल पर मिलते, पानी भरते, दो बातें करते। अब हम सिर्फ़ यह देखते हैं कि कौन पहले यहाँ पहुँचता है।"
"तो मेरी ग़लती क्या है?"
"तेरी ग़लती?" सानिया के अब्बा ने कहा। "तेरी ग़लती यह है कि तू हमें खुद से बात करने की जगह देता है। तेरा बोर्ड हमें बुलाता था। तेरी दुकान हमें बुलाती थी। और अब हम जब एक जगह इकट्ठे बैठते हैं तो हमें लगता है कि हमसे कुछ छीना गया है।"
मैंने देखा कि गली के लोग सुन रहे थे। कोई सुन रहा था जो पहले नहीं सुनता था।
और मुझे समझ आया — यह लड़ाई बाल्टी की नहीं थी।
"बाल्टी मेरी है," सानिया के अब्बा ने कहा, और आवाज़ भारी हो गई।
"रख," मैंने कहा।
"क्या?"
"बाल्टी रख दीजिए।" मैं आगे बढ़ा। "और नल यहाँ से बीस कदम है। एक बाल्टी भरने में दो मिनट लगते हैं। लगाईए।"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं बाल्टी नहीं बाँट रहा," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि आज नल पर पहले कोई पहुँचे, यह देखना बंद करो। नल में पानी पाँच साल से है, दस साल से है, सौ साल से है। उसने अपना हिसाब नहीं बदला।"
सन्नाटा।
फिर सानिया के अब्बा ने कहा, "तू अच्छी बातें करता है।"
"मुझे यही सिखाया गया था।"
"अच्छी बातें सुनने में अच्छी होती हैं," उन्होंने कहा। "पर मेरी बेटी रात भर बुखार में तड़पी। मुझे अच्छी बात नहीं चाहिए। मुझे यह चाहिए कि जो मेरी बेटी को खराब कर रहा है, वो थम जाए।"
और उन्होंने वो कह दिया जो सारी गली कह रही थी।
"तू अपनी दुकान बंद कर दे। तीन दिन के लिए। बस तीन दिन। हम सब साँस ले लें।"
मैं उस वक़्त कुछ नहीं बोला।
पर उस वक़्त मुझे पता चला कि दुकान बंद करना कितना आसान है और कितना मुश्किल।
एक शब्द में हो जाता — और हमेशा के लिए नहीं होता।
छह बजे खाकी जीप आई।
दो सिपाही उतरे। एक वो ही जो पहले आया था। दूसरा नया — पतला, हाथ पीछे बँधे।
दरोगा नहीं था।
पीपल के नीचे पहुँचकर उन्होंने वो चौकोर ज़मीन देखी जहाँ मेज़ रखी थी। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तुमने यहाँ कुछ रखा है? आज?"
"नहीं।"
"कुछ लगाने की कोशिश?"
"नहीं।"
"अच्छा है।" उसने जेब से काग़ज़ निकाला। "कल से इस जगह पर कोई बोर्ड, कोई मेज़, कोई सभा, कोई जमावड़ा नहीं। तीन दिन की रोक है। और तीन दिन बाद दरोगा जी खुद आएँगे।"
"मैंने कुछ नहीं किया।"
"मैंने भी कुछ नहीं किया," उसने कहा। "मुझे काग़ज़ दिया गया। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि जो ऊपर से आता है, वो काग़ज़ पर आता है।"
वो मुड़ने लगा। फिर रुका।
"सुन," उसने धीरे कहा, आवाज़ नीची करके, "आज रात कुछ मत करना। न बोर्ड, न चाय, न बात।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। सीधा।
"क्योंकि आज काग़ज़ आया है कि अगर तीन दिन में गली में कुछ हुआ, तो उसे सिर्फ़ तेरे नाम पर लिखा जाएगा।" उसने साँस ली। "और मैं तुझे बताने आया हूँ। मुझे नहीं बताना चाहिए था। मैं अपनी नींद के लिए बता रहा हूँ। समझ गया?"
मैंने सिर हिलाया।
"काग़ज़ की नक़ल माँगूँ?"
"माँगेगा," उसने कहा, "तो मिलेगी नहीं।"
वो गया।
जीप चली गई।
और गली चुप हो गई।
वो चुप्पी कुछ और थी, मीरा।
मैंने उसे धीरे कहा, "तेरा कैमरा?"
"बंद है।"
"क्यों?"
"क्या रिकॉर्ड करूँ?" उसने कहा। "कि कोई नहीं आ रहा?"
शाम सात बजे मैंने घर जाने की सोची। फिर नहीं गया।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठा रहा। बत्ती जल रही थी — वो पुरानी, गुनगुनाती हुई।
आज वो गुनगुनाती नहीं थी। सिर्फ़ जल रही थी।
मैंने घंटी निकाली।
जेब से। हथेली पर रखी।
आज सुबह से वो ठंडी थी। पर आज शाम — ठंडी नहीं। बर्फ़ जैसी।
मैंने बजाई।
टन।
बस टन।
धातु की आवाज़। सिर्फ़ धातु।
मैंने फिर बजाई।
टन।
मैंने तीसरी बार बजाई। चौथी बार। पाँचवीं बार।
टन। टन। टन। टन।
मैंने घंटी कान के पास ले जाकर हिलाई। दोनों हाथों में पकड़कर हिलाई। मेज़ पर रखकर उँगली से बजाई।
कुछ नहीं।
मैंने उसे माथे से लगाया।
ठंडी।
एक पल मुझे ऐसा लगा कि घंटी ने भीतर से साँस ली — जैसे कल रात ली थी। बहुत दूर से।
पर नहीं।
सिर्फ़ मेरा ही साँस लेना था।
मैं कुर्सी पर बैठ गया।
"ऐसा मत कर," मैंने कहा। आवाज़ धीमी थी।
"मैंने कहा था, कल चुप रहना। पर इतना चुप मत रहना कि मुझे तेरी आवाज़ भूल जाए।"
घंटी चुप।
"सुन, मैंने आज कुछ नहीं किया। मैंने सुबह शटर खोला, दोपहर में बाल्टी के बीच में पड़ा, शाम को बोर्ड नहीं लगाया। मैंने सबको मना कर दिया। मैंने कोई जोड़ नहीं किया। तो तू बोल। एक शब्द भी बोल दे।"
घंटी चुप।
"बोल।"
कुछ नहीं।
"बोल—"
मेरी आवाज़ टूट गई।
आठ बजे मैं दुकान के बाहर आया। गली में एक भी बत्ती नहीं जल रही थी। दूर गुमटी की तरफ़ से भी नहीं।
आम दिन आठ बजे शबनम की गुमटी पर लाइट होती, दो लोग बैठे होते, चिंटू की अम्मी चिल्लाती होती, सायकिल की घंटी बजती होती।
आज कुछ नहीं।
हवा भी नहीं।
मैं खड़ा रहा। पाँच मिनट।
फिर मैंने घंटी उठाई और ज़ोर से हवा में बजाई।
टन।
आवाज़ गली में गई। दीवारों से टकराई। और लौटी — टन, टन, टन — हल्की होकर।
और फिर सन्नाटा।
किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। किसी ने खिड़की नहीं खोली। कोई बच्चा नहीं चिल्लाया — "अंकुश भैया की घंटी!"
कुछ नहीं।
मैं ज़मीन पर बैठ गया। शटर के नीचे।
और तब — पीछे से आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैं उठा।
डॉक्टर इसरानी थे। हाथ में स्टील का डिब्बा। चप्पलों में। बिना स्टेथोस्कोप।
"बैठा क्यों है ज़मीन पर?"
"ठंडी है?"
"ज़मीन?"
"घंटी।" मैंने हथेली खोली।
उन्होंने देखा। फिर मेरे पास बैठ गए। डिब्बा बीच में रखा।
"चाय लाया हूँ।"
"डॉक्टर, आज—"
"पहले चाय।" उन्होंने ढक्कन खोला। भाप निकली। "और फिर मैं तुझसे एक बात कहूँगा।"
मैंने चाय पी। गरम थी। सुबह से मैंने कुछ नहीं खाया था।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू घंटी बजा रहा है।"
"हाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि—" मैं रुका। "क्योंकि वो चुप है।"
"तो ठीक है।"
"क्या?"
"वो चुप है," उन्होंने कहा, "क्योंकि गली चुप है। यह तेरी ग़लती नहीं। यह नियम है। जिस दिन मोहल्ला चुप हो जाए, घंटी भी चुप हो जाती है।"
"तो मैं क्या करूँ? उसे छोड़ दूँ?"
"तू उसे छोड़।" उन्होंने चाय पी। "पर उसे छोड़ने का मतलब यह नहीं कि तू गली भी छोड़ दे।"
"मुझे समझ नहीं आ रहा।"
"तू घंटी से पूछ रहा है," उन्होंने कहा। "घंटी से जवाब नहीं आ रहा, क्योंकि घंटी जिनके भरोसे से चलती है, वो लोग आज बोल नहीं रहे। घंटी उनकी आवाज़ नहीं ढूँढ पा रही, क्योंकि उन्होंने अपनी आवाज़ बंद कर दी है।"
"तो?"
"तो तू उनके पास जा," उन्होंने कहा। "जिन्होंने अपनी आवाज़ बंद की है।"
"सबने बंद कर दी है।"
"नहीं," उन्होंने कहा। "सबने नहीं की। कुछ लोगों ने चुप्पी ओढ़ी है। चुप्पी और चुप होना अलग बात है।"
"फ़र्क़?"
"चुप होना — जब बोलने की ज़रूरत नहीं होती," उन्होंने कहा। "चुप्पी ओढ़ना — जब बोलने की हिम्मत नहीं होती।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno