The Mysterious Bell – Chapter 1162
मीरा ने धीरे कहा, "उसके हाथ में एक काग़ज़ था।"
"क्या?"
"सानिया के हाथ में। जब वो गेट से बाहर आ रही थी। छोटा काग़ज़, मुड़ा हुआ। मैंने देखा।"
"सूची?"
"पता नहीं।"
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। वहाँ अब सिर्फ़ पत्थर की चबूतरी थी। मेज़ नहीं। बोर्ड नहीं। कुर्सी नहीं। टूलबॉक्स नहीं। ज़मीन पर धूल में एक चौकोर साफ़ निशान — जहाँ मेज़ रखी थी।
ऐसा लगा जैसे ज़मीन याद रखे हुए है।
ग्यारह बजे मैं गुमटी पर गया।
दो ग्राहक बैठे थे। दोनों मुझे जानते थे। मुझे देखकर एक उठ गया — half उठकर फिर बैठ गया, जैसे उसे याद आया कि उठना है या नहीं। दूसरे ने चाय का कप ऐसे पकड़ा जैसे कोई कीमती चीज़ हो।
शबनम आपा चूल्हे पर झुकी थीं। मैं गया तो उन्होंने सिर नहीं उठाया।
"बैठ।"
मैं बैठ गया।
"चाय?"
"हाँ।"
उन्होंने चाय उतारी। कप मेरे आगे रखा। फिर खुद भी सामने आकर बैठ गईं। पीतल की थाली बगल में रखी।
"सुबह से कितने आए?" मैंने पूछा।
"पाँच।"
"पाँच?"
"पाँच।" उन्होंने सामने देखा। "आम दिन चालीस आते हैं, अंकुश। आज पाँच। और उनमें से भी तीन ने सिर्फ़ पूछा कि तू यहाँ बैठा है क्या। चाय लिए बिना चले गए।"
"आपा—"
"मत कह।" उन्होंने कप उठाया। "मैं चूल्हा बंद नहीं करूँगी और ये काग़ज़ नहीं उतारूँगी। पर तू एक बात सुन।"
"कहिए।"
"जो ग्राहक आज नहीं आया," उन्होंने कहा, "वो भूखा नहीं है। वो डरा हुआ है। और डरा हुआ आदमी रोज़ नहीं आता, पर पूरा नहीं भूलता। मैं बीस साल से यह चूल्हा जला रही हूँ। मुझे पता है, शहर में भूख से ज़्यादा डर भगाता है।"
पीछे से रज़िया का कपड़ा खिसका। वो बर्तन धो रही थीं। टब का पानी ज़ोर से गिरा।
"रज़िया।"
"क्या?"
"अंदर से चाय लेकर आ।"
"मेरा पैर दुख रहा है।"
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप उठकर खुद चाय लेने लगीं।
मैं बोला, "आपा, मैं ले आता हूँ।"
"तू बैठ।" उन्होंने पीछे देखा। "यहाँ जो पानी गिर रहा है, वो पैर का दर्द नहीं है।"
वो चाय लेने गईं।
मैंने थाली में देखा। उसमें एक काग़ज़ पड़ा था — मुड़ा हुआ। नोटिस नहीं। छोटा।
मैंने उठाया। खोला।
उस पर टाइप किया हुआ एक ही लाइन था। और नीचे कुछ नहीं। न मुहर, न तारीख़, न नाम।
"इस गुमटी में आने वाले हर आदमी के घर में पिछले दो महीने में कुछ टूटा है।"
मैंने काग़ज़ थाली में वापस रख दिया।
शबनम आपा आईं। उन्होंने देखा। थाली में देखा। कुछ नहीं बोलीं। चाय रखी। फिर वो भी बैठ गईं।
"कब मिला?"
"सुबह।" उन्होंने कप पकड़ा। "ग्यारह बजे। चाय उतारते वक़्त मेज़ के नीचे रखा था।"
"किसने रखा?"
"जो मेरी गुमटी में चाय पीकर जाता है," उन्होंने कहा, "उसके पैर मेरी मेज़ के नीचे तक आते हैं, अंकुश। मैं उन पैरों को नहीं पहचानती, क्योंकि उन्होंने मेरी आँखों में नहीं देखा।"
"आपने किसी को काग़ज़ रखते देखा नहीं?"
"मैंने किसी को कुछ रखते नहीं देखा।" उन्होंने अपनी आँखें सिकोड़ीं। "पर मैंने एक चीज़ देखी — जब मैं चाय लेकर अंदर गई थी, बाहर दो लोग बैठे थे। एक चला गया था, दूसरा जब चला तो मेरे चूल्हे की आग की तरफ़ देखकर मुस्कुराया।"
"कौन?"
"बात तू मान ले," उन्होंने कहा, "यह नाम जानने से तेरे हाथ में कुछ नहीं आएगा। जब वो मुस्कुराता है, तो जलती आग देखकर मुस्कुराता है। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि उसे लगता है आग उसके हाथ में है।"
दोपहर तीन बजे खबर आई।
टिंकू की माँ आई थीं। हाँफती हुई। उनके हाथ में मिट्टी का तेल का डिब्बा था और पैर में सिर्फ़ एक चप्पल — दूसरी गली में गिर आई थी।
"उस्ताद की दुकान पर—"
"क्या?"
"दो आदमी आए हैं।" उन्होंने डिब्बा ज़मीन पर रख दिया। "बोल रहे हैं कि तीस बजे ताले की तैयारी है।"
मैं उठा। मीरा पीछे थी — वो भी उठी। हम भागे।
उस्ताद की दुकान तक पहुँचे तो दो सफ़ेद कुर्ते वाले बाहर खड़े थे। एक के हाथ में मोटी फ़ाइल थी, दूसरे के हाथ में कुछ नहीं। दुकान का शटर पूरा उठा हुआ था और मशीन पर से सफ़ेद कपड़ा उतरा हुआ था।
उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। मशीन के सामने। हाथ में सुई नहीं थी। सिर्फ़ हाथ जोड़े हुए थे।
"उस्ताद?"
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
फ़ाइल वाले ने कहा, "आ गए।"
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं हुआ।" उसने फ़ाइल खोली। "काग़ज़ दिखा रहे हैं। दुकान का काग़ज़ इस जगह के लिए नहीं है। तीस दिन — और अब तीन दिन। दोपहर तीन बजे ताले की तैयारी।"
"अगर वो तीस दिन होते," उस्ताद ने कहा, "तो मैं चाबी बना लेता।"
"अब?"
"अब?" उस्ताद ने कहा। "अब सुई नहीं।"
फ़ाइल वाले ने देखा। मशीन पर सुई नहीं थी। सिर्फ़ सुई का होल।
"सुई कहाँ है?"
"मैंने रख दी है," उस्ताद ने कहा। "जगह ऐसी है जहाँ काग़ज़ नहीं पहुँचता।"
वो कुछ नहीं बोला। फ़ाइल बंद की और मुड़ गया।
"उस्ताद—"
"अंकुश," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू बैठ।"
"मैं बैठूँगा नहीं।"
"मैंने कहा, बैठ।"
उनकी आवाज़ ऐसी थी कि मैं बैठ गया। मीरा बाहर रुकी।
वो उठे। मशीन के पास गए। मशीन के ऊपर हाथ रखा — सफ़ेद कपड़े पर। जो अब मशीन पर नहीं था, मशीन के बगल में मेज़ पर पड़ा था।
"जब मैं तेरी उम्र का था," उन्होंने कहा, "मेरे पास दो चीज़ें थीं — मशीन और भाई। मशीन चली गई थी आग में। भाई भी। दोनों गए। मैंने मशीन वापस बनाई, दो साल लगे। भाई वापस नहीं आया।"
"उस्ताद—"
"आज मेरी मशीन पर तीस दिन का काग़ज़ आया। मैं मशीन नहीं छोड़ूँगा।" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "पर आज मुझे यह भी समझ आ गया — मशीन दुकान में नहीं रहती। मशीन उन हाथों में रहती है जो इसे चलाते हैं। दुकान जाए तो जाए। पर सुई तेरे पास है।"
"सुई मेरे पास कब आई?"
"अभी आई है।" उन्होंने जेब से कुछ निकाला और मेरी हथेली पर रख दिया।
एक सुई। बहुत पुरानी। थोड़ी मुड़ी। अंगूठे के नाखून जितनी छोटी।
"यह—"
"यह वो है," उन्होंने कहा, "जिससे मैंने अपनी उँगली सिली थी।"
चार बजे से पहले किशनलाल काका की दुकान पर पानी का झगड़ा शुरू हो गया।
मैं वहाँ सिर्फ़ इसलिए गया था कि काका का बिक्री का काग़ज़ खोलवाना था। कुछ दिन से मैं उन्हें मना रहा था, वो टाल रहे थे। आज मैंने सोचा कि एक बार सीधा बैठूँगा।
पहुँचा तो दुकान के बाहर पाँच-छह लोग थे।
सानिया के अब्बा एक हाथ में बाल्टी पकड़े खड़े थे। गुड्डू के पापा दूसरी तरफ़।
बाल्टी पूरी भरी हुई थी। पानी किनारे से गिर रहा था। दोनों तरफ़ ज़मीन गीली थी।
"यह बाल्टी मेरी है," सानिया के अब्बा कह रहे थे।
"बाल्टी पर किसी का नाम नहीं होता," गुड्डू के पापा ने कहा।
"मेरी बीवी ने इसी बाल्टी से आज चार बार पानी भरा।"
"तो तेरे हाथ में कैसे आई?"
"मैंने अपनी बाल्टी किसी को दी नहीं।"
"मैंने उठाई—"
"अब उठाई है तो रख।"
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। बाल्टी बीच में। और लोग चुप खड़े थे — कोई बीच में नहीं आ रहा था। दो हफ़्ते पहले यही गली होती तो चार लोग बीच में आ जाते, कोई हँसता, कोई कहता "अरे ऐसा क्या है"।
आज कोई नहीं।
आज सिर्फ़ आँखें थीं।
मैं आगे गया।
"भाई साहब?"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा। और दोनों के चेहरे पर वही भाव आया — वही जो सुबह सानिया की अम्मी के चेहरे पर था।
"तू आ गया," सानिया के अब्बा ने कहा।
"मैं बात करने आया हूँ—"
"बात?" उन्होंने बाल्टी नीचे रखी। "तेरे आने से पहले हम दोनों रोज़ नल पर मिलते थे। रोज़। पाँच साल से। मैंने इससे दोस्ती नहीं की थी, पर रोज़ एक-दूसरे को 'काका' कहते थे।"
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