The Mysterious Bell – Chapter 1161
मैंने कुछ नहीं कहा। वो मुझसे ज़्यादा जानती थी।
मैं उस्ताद अली बक्श की दुकान पहुँचा।
शटर आधा उठा था। मशीन पर सफ़ेद कपड़ा ढका था। किनारे से गाँठ भी लगी थी — करीने से। उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। उनके हाथ में एक पुरानी सुई थी — टूटी हुई।
मैं अंदर गया।
"उस्ताद।"
"आ गया।" उन्होंने सिर उठाया। "आपा ने भेजा।"
"कैसे पता?"
"आपा जब चूल्हा जलाए रखती है," उन्होंने कहा, "तो उसे पता होता है किसको कहाँ भेजना है।"
"ताले की बात सच है?"
"कल शाम दो सफ़ेद कुर्ते वाले आए। मोटी फ़ाइल थी। कहा — तेरी दुकान का काग़ज़ असली नहीं है। दो दिन में दुकान खाली कर दो। वरना ताला।"
"आपने क्या कहा?"
"मैंने कहा," उस्ताद ने सुई हवा में उठाई, "चाबी बनाने वाले को बुला लूँगा।"
"उस्ताद—"
"और फिर मैंने मशीन पर कपड़ा ओढ़ दिया।"
"क्यों?"
उन्होंने सुई डिब्बे में डाली। डिब्बा बंद किया। किनारे रखा।
"क्योंकि जब तक मशीन खुली रहेगी," उन्होंने कहा, "वो चलने की बात करेगी। और आज वो चलना नहीं चाहती।"
"उस्ताद, मशीन तो आपकी है—"
"मशीन नहीं है," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पहली सिलाई से पहले जो चीज़ होती है, वो सुई है। और आज सुई काँप रही है।"
"सुई काँप रही है?"
"मैंने आज दो टाँके लगाने चाहे," उन्होंने कहा। "दोनों बार धागा तीन बार टूटा। फिर मैंने कपड़ा ओढ़ दिया।"
"तो आप डर गए?"
वो रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — लंबा, सीधा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं पचास साल से सुई चला रहा हूँ। मैंने एक बार सुई से अपनी उँगली स"मैंने एक बार सुई से अपनी उँगली सिल दी थी।"
उस्ताद ने कहा और मैं चुप हो गया।
"पचास साल में एक बार," उन्होंने कहा। "तब मैं जवान था। सुई फँसी थी, मैंने ज़ोर लगाया, धागा खिंचा और सुई सीधी मेरे अंगूठे में घुस गई। खून निकला। मैंने पोंछा और फिर सिलाई की।"
"दर्द नहीं हुआ?"
"हुआ।" उन्होंने अपना अंगूठा देखा। "पर उस दिन मैंने एक बात सीखी। सुई तेज़ होती है, अंकुश। बहुत तेज़। वो कपड़ा चीर सकती है, उँगली चीर सकती है। पर कपड़ा सुई से नहीं जुड़ता। कपड़ा धागे से जुड़ता है।"
वो रुके।
"धागा कच्चा हो तो सुई कितनी भी अच्छी हो, टाँका नहीं टिकता। मैंने आज तीन बार धागा बदला। तीनों बार टूटा। तो मैंने कपड़ा ओढ़ दिया। क्योंकि आज धागा नहीं है।"
"उस्ताद, धागा तो बाज़ार में मिलता है।"
"बाज़ार में धागा मिलता है," उन्होंने कहा, "भरोसा नहीं मिलता।"
मैं उनके सामने बैठ गया। स्टूल खींचा। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो मशीन को देख रहे थे — ढकी हुई, चुप, सफ़ेद कपड़े के नीचे।
"घंटी सुई है," उन्होंने कहा। "गली का भरोसा धागा है। तू सुई को साफ़ करता रह, चमकाता रह, बजाता रह। धागा टूटा है तो टाँका नहीं लगेगा।"
"तो धागा कौन जोड़ेगा?"
"जिससे टूटा था।"
"वो तो पता ही नहीं कौन है।"
उन्होंने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।
"पता है," उन्होंने कहा। "बस तू उसे अपने जैसा समझ रहा है।"
"मतलब?"
"तू सोचता है कि गली में जो डर गया है, वो बुरा है।" उन्होंने सुई की तरह सीधी बात कही। "नहीं। डरा हुआ आदमी बुरा नहीं होता। डरा हुआ आदमी थका होता है। और थके आदमी को एक ही चीज़ चाहिए — कोई एक इंसान जो उससे बिना हिसाब किताब के बात करे।"
मैंने उनकी मशीन की तरफ़ देखा।
"कल तक ये खुलेगी?"
"जिस दिन तेरी गली खुलेगी," उन्होंने कहा, "उस दिन ये खुलेगी।"
मैं उठा। जाते वक़्त रुका।
"उस्ताद, वो दो सफ़ेद कुर्ते वाले। फ़ाइल वाला। उसने कुछ और कहा था?"
उस्ताद ने सोचा। फिर बोले, "कहते वक़्त काग़ज़ हिला रहा था। और उसके हाथ में एक और काग़ज़ था — मुड़ा हुआ, छोटा। उस पर एक नाम लिखा था। मैंने पढ़ा नहीं। पर नाम लाल स्याही में था।"
"लाल स्याही?"
"हाँ।"
मैं बाहर निकला। धूप तेज़ थी, पर गली में छाया ज़्यादा थी।
मीरा स्कूल के गेट पर खड़ी थी। फोन हाथ में। मुझे देखकर हाथ उठाया — नमस्ते नहीं, "रुक" वाला इशारा।
"कहाँ थे?"
"उस्ताद के पास।"
"स्कूल वालों ने सूची बना ली है।"
"कौन सी सूची?"
"अभिभावक सभा।" उसने फोन पॉकेट में डाला। "दो सफ़ेद कुर्ते वाले सुबह सात बजे आए थे। काग़ज़ बाँटकर बोले — जो बच्चा उस गली के रास्ते आता है, उसका नाम अलग सूची में। जो नहीं आता, उसका नाम अलग।"
"अलग क्यों?"
"क्योंकि जो नहीं आता, उसे कुछ मिलेगा।" मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "नई कॉपी, कलम, स्कूल की फ़ीस में छूट। और जो आता है — उसे सिर्फ़ एक बात मिलेगी। कि उसका नाम सूची में है।"
"किसके हाथ में?"
"पता नहीं। सूची किसी को दिखाई नहीं जा रही।"
मैंने स्कूल का गेट देखा। लोहे की जाली। अंदर आँगन खाली था। छत पर कोई पतंग नहीं उड़ रही थी। आम दिन इतनी सुबह दो-तीन पतंगें तो होती ही थीं।
"बच्चे?"
"छत बंद है," मीरा ने कहा। "प्रिंसिपल ने लिख दिया — मरम्मत तक कोई छत पर नहीं जाएगा।"
"मरम्मत कब से शुरू हुई?"
"यही तो।" उसने मुझे देखा। "मरम्मत शुरू ही नहीं हुई।"
हम दोनों गेट के पास खड़े रहे। सुनीता दीदी सामने से निकलीं — सिर पर बर्तन का टब, हाथ में झाड़ू। उन्होंने मुझे देखा।
देखा और नज़र नीची कर ली।
रुकीं नहीं।
"सुनीता दीदी।"
वो एक कदम रुकीं।
"राहुल आज स्कूल आया?"
वो और नहीं रुकीं। बस इतना कहा, आगे देखती हुई, "कल से नहीं आ रहा।"
"क्यों?"
वो चलने लगीं।
फिर रुकीं। मुड़ीं। और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी उनमें नहीं देखी थी — गुस्सा नहीं। शर्म।
"वो काग़ज़ मेरे हाथ में दिया गया था," उन्होंने धीरे कहा। "दो हज़ार रुपये दिए गए थे।" उनका गला रुँधा। "मैंने लिया। तेरे ऊपर इल्ज़ाम लगाने के लिए।"
मैं चुप रहा।
"मेरे राहुल की फ़ीस देनी थी," उन्होंने कहा। "पर मैंने नहीं सोचा कि वो इल्ज़ाम इस गली को इस तरह तोड़ेगा। अब राहुल कहता है — अम्मी, तुमने झूठ बोला। दो हफ़्ते से वो मुझसे ठीक से नहीं बोलता।"
"दीदी—"
"मुझे मत कहो कुछ।" उन्होंने हाथ उठाया। "मैं खुद नहीं पूछूँगी। मैं खुद तेरे मुँह से एक बार सुन लूँगी, अपने घर में। जिस दिन हिम्मत हो।"
और वो चली गईं।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"यह क्या था?"
"यह," मैंने कहा, "यह पहला दरवाज़ा है।"
"क्या?"
"कुछ नहीं।"
उस वक़्त मुझे पता नहीं था कि मैं सही कह रहा हूँ।
सानिया की अम्मी गेट के अंदर से निकलीं। हाथ में थैला। पीछे सानिया — सिर झुकाए। मैंने सानिया को देखा। वो मुझे देखकर भी नहीं देख रही थी।
"सानिया।"
अम्मी रुकीं। सानिया ने सिर थोड़ा उठाया।
"स्कूल जा रही है," अम्मी ने कहा। सपाट आवाज़। "तू अपना काम कर।"
"अम्मी जी, आपसे एक बात—"
"मुझसे नहीं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "सुबह से चार आदमी आए हैं। सब एक ही बात कह गए — तेरे पास जाने वाले का घर टूटता है। मेरी बेटी रात भर बुखार में तड़पी, तू जानता है?"
"अम्मी जी, वो बुखार—"
"मुझे नहीं पता बुखार क्या था।" उनकी आवाज़ काँपी। "मुझे यह पता है कि जिस दिन से तू दुकान खोली है, उस दिन से मैं रात में सोने से पहले अपने बच्चे का माथा छूकर सोती हूँ। यह पहले नहीं था।"
सानिया ने धीरे कहा, "अम्मी—"
"चुप।"
वो चल दीं।
सानिया मेरी तरफ़ देखती हुई चली — एक पल। और उस एक पल में उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था। डर था। और डर के पीछे कुछ ऐसा जो कहना चाहता था पर कह नहीं सकता था।
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