The Mysterious Bell1160 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1160

7 min read November 5, 2026

पर किसी ने इस क्रम को मेरे खिलाफ़ तैयार कर लिया था। मुझे उस वक़्त यह नहीं पता था। तुम सोच रहे होगे कि सुबह उठकर पहला काम तय था, तो उल्टा क्या होगा?

सुनो।

मैंने पाँच बजे शटर उठाया।

शटर आधा उठा था कि बाहर से आवाज़ आई — "बेटा।"

किशनलाल काका थे। उनके पीछे तीन औरतें थीं — एक बुढ़िया जिसके हाथ में कटोरा था, एक जवान औरत जिसके हाथ में बच्चा, और एक औरत जो कुछ नहीं कह रही थी, बस सिर झुकाए खड़ी थी।

मैंने शटर पूरा उठाया।

"काका, इतनी सुबह?"

किशनलाल ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर पीछे मुड़कर तीनों औरतों को देखा। औरतें कुछ दूर खड़ी रहीं।

फिर काका ने धीरे से कहा, "रात में कोई घर-घर गया है।"

"कौन?"

"दो सफ़ेद कुर्ते वाले।"

मैंने अपनी उँगलियाँ जेब में घुसा दीं। घंटी जेब में थी। ठंडी।

"क्या कह गए?"

किशनलाल ने एक लंबी साँस ली — जैसे कहानी सुनाते वक़्त लोग लेते हैं, जब वो खुद उस कहानी से थके हुए हों।

"कह गए कि उस दुकान का जोड़ काला जादू है। जो वहाँ गया, उसका घर टूटा। नसीमा बाई की दुकान का हिसाब बिगड़ा — पता है तुम्हें? पिछले हफ़्ते उसका बेटा साजिद दो हज़ार का काग़ज़ ले आया था, और कल उसका उतना ही हिसाब गड़बड़ाया। औरतें सुनकर डर गईं।"

"काका, ये सब—"

"मैं जानता हूँ, बेटा," काका ने कह दिया। "मैं जानता हूँ कि ये सब झूठ है। पर जो झूठ घर-घर जाता है, वो सच से तेज़ हो जाता है।"

तभी पीछे खड़ी बुढ़िया आगे आई। उसके हाथ में कटोरा था।

"बेटा," उसने कहा, "मैं सिर्फ़ इतना पूछने आई हूँ — तूने मेरे घर का कुछ नहीं लिया। सही?"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"अम्मी," मैंने धीरे से कहा, "मैंने आपके घर का नहीं, घर का नहीं — दुनिया का कुछ नहीं लिया।"

"तो फिर मेरे पोते का बुखार क्यों आया?"

वो कटोरा उठाए खड़ी थी। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैं उससे बहस नहीं करना चाहता था। और मैं उससे सहमत भी नहीं हो सकता था।

मैंने कहा, "अम्मी, पोते को डॉक्टर को दिखाइए।"

"अब डॉक्टर कहाँ ले जाऊँ?" वो फूट पड़ी। "अस्पताल का वार्ड बंद है! सील लगी है! मेरा पोता वहीं जाता था!"

मैं चुप हो गया।

किशनलाल ने उसका हाथ पकड़ा और पीछे ले गए। जवान औरत आगे आई, जिसके हाथ में बच्चा था — वो कुछ नहीं बोली। बस बच्चे को सीने से लगाया और चली गई।

तीसरी औरत ने आख़िरी में मेरी तरफ़ देखा। फिर एक शब्द कहा, "तेरे पास जाने से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है, अंकुश।"

और मैं वहीं खड़ा रह गया।

देखो, कोई झूठ यह नहीं कहता कि "तेरे पास काला जादू है।" झूठ यह कहता है — "तेरे पास जाने से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है।"

और यह वाक्य मेरे सीने में उतना ही लगा जितना सच लगता है।

मैं अंदर गया।

काजल ने आज पहली बार चाय नहीं बनाई थी। वो चूल्हे के पास खड़ी थी, पर हाथ खाली थे। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "भैया, आज गली में कोई नहीं आएगा।"

"तू कैसे जानती है?"

"क्योंकि मैं अभी बाहर गई थी — सुबह पानी लेने। नल पर कोई नहीं था। और तीन घरों के दरवाज़े ऐसे बंद थे जैसे किसी ने रात में ही बंद कर दिए हों।"

"और सानिया की अम्मी का?"

"उनके दरवाज़े पर बाल्टी रखी थी। मतलब वो नल तक नहीं आई।"

मैंने सिर हिलाया।

और तभी मुझे याद आया — कल मैंने तय किया था, आज सुबह डॉक्टर इसरानी के पास रजिस्टर देखने जाना है। नौ बजे। मैंने काजल से कहा, "मैं डॉक्टर इसरानी के पास जा रहा हूँ।"

पर मैं नहीं गया।

क्योंकि उससे पहले शहर ने मुझे जाने नहीं दिया।

आठ बजे मैं स्कूल पहुँचा।

स्कूल के गेट पर आज लोहे का ताला नहीं था। पर अंदर आँगन में कुर्सियाँ लगी थीं। बारह-पंद्रह अभिभावक बैठे थे। कुछ मर्द थे, कुछ औरतें।

मैं दीवार के पीछे रुका। मुझे किसी ने बुलाया नहीं था। पर मैंने सुना।

प्रिंसिपल खड़े थे और हाथ में एक काग़ज़ था। किसी ने कहा, "यह सुबह की प्रार्थना से पहले कर लेंगे।"

फिर कोई औरत बोली — मैं आवाज़ पहचान गया, सानिया की अम्मी थीं — "मैं साफ़ कहना चाहती हूँ। मेरी बेटी उस गली से नहीं जाएगी। उस दुकान के सामने से तो कभी नहीं।"

गुड्डू के पापा ने कहा, "अम्मी, रास्ता तो वही है।"

"तो रास्ता बदल देंगे। पीछे की गली से।"

"वो गली काई वाली है।"

"जूतों पर काई लगेगी," सानिया की अम्मी ने कहा। "काला जादू नहीं लगेगा।"

मैंने दीवार पर हाथ रख दिया। मुझे लगा कि अगर मैं दीवार न सहारा लूँ, तो गिर जाऊँगा।

सुनीता दीदी ने कहा — मैंने उनकी आवाज़ पहचानी, जो आजकल स्कूल में बर्तन धोती हैं — "बच्चों को रोकने से क्या होगा?"

"सुनीता दीदी," किसी औरत ने कहा, "आप अपने राहुल की बात करें।"

"मैं अपने राहुल की ही बात कर रही हूँ," सुनीता ने कहा। "वो तीन महीने से स्कूल नहीं आया। अगर वो आता, तो आपसे पूछकर आता? आपसे रास्ता पूछकर?"

गली में सन्नाटा छा गया। सुनीता दीदी ज्यादा नहीं बोलीं।

फिर कोई सफ़ेद कुर्ते वाला बोला — मैंने पहली बार उसकी आवाज़ सुनी, मीठी थी, "बात सिर्फ़ सुरक्षा की है।"

मैं गेट से पीछे हट गया।

पर जाते-जाते सानिया को देख लिया।

वो गेट के अंदर खड़ी थी, बस्ता हाथ में। उसने मुझे देखा। मैंने उसकी तरफ़ मुस्कुराने की कोशिश की। वो नहीं मुस्कुराई। वो सिर्फ़ देखती रही — जैसे किसी अजनबी को देखते हैं, जिसने कुछ कहा हो और भुला दिया हो। और फिर अपनी अम्मी के पीछे हो गई।

मैं गुमटी की तरफ़ मुड़ा।

शबनम आपा की गुमटी पर वही काग़ज़ चिपका था — अस्थायी रूप से काम बंद। पर चूल्हा जल रहा था। तीन स्टूल बाहर थे। पर कोई नहीं बैठा था।

मैं अंदर गया।

शबनम आपा बर्तन धो रही थीं। पानी ठंडा था — भाप नहीं उठ रही थी। रज़िया पीछे बैठी थी, चूल्हे की तरफ़ पीठ किए।

"चाय?" मैंने कहा।

शबनम ने सिर उठाया। "बैठ।"

मैं स्टूल पर बैठ गया।

एक कप चाय आई। फिर दूसरी। फिर शबनम अपने लिए बैठ गईं।

"कितने ग्राहक?" मैंने पूछा।

"आज सुबह दो," उन्होंने कहा। "दोनों बारह-तेरह साल के बच्चे थे। दोनों ने एक घूँट में चाय पी और भाग गए। जैसे किसी ने उन्हें यहाँ आने को कहा था और वापस बुला लिया।"

"आपा, काग़ज़ उतार दें?"

उन्होंने सिर हिलाया। "उतारकर क्या करूँ? काग़ज़ वो नहीं है जो शटर पर लगा है। काग़ज़ वो है जो लोगों के दिमाग़ में लगा है। यहाँ से हटा, वहाँ से नहीं हटेगा।"

"तो बंद कर दें?"

"नहीं," उन्होंने तुरंत कहा। "चूल्हा जलेगा। तीन दिन जलेगा। फिर तीन दिन। फिर जब तक कोई आए — एक भी आए — यह जलेगा।"

"अगर कोई न आए?"

"तो आएगा," उन्होंने कहा। "मुझे पता है। क्योंकि इस गली में भूख लगती है। भूख अफ़वाह नहीं सुनती।"

रज़िया ने पीछे से कुछ कहा। मैं समझा नहीं।

शबनम ने पीछे देखा। "क्या बोली?"

"कुछ नहीं।"

"बोल ना।"

"मैंने कहा," रज़िया ने कहा — आवाज़ दबी हुई थी पर साफ़ — "कि जो आदमी गली में डर बो रहा है, उससे हमें लड़ना चाहिए। अंकुश से नहीं।"

मैंने अपना कप उठाया। एक घूँट लिया। चाय बहुत अच्छी थी। पर मेरे गले से नहीं उतर रही थी।

शबनम ने कहा, "अंकुश।"

"हूँ।"

"उस्ताद के पास जा। उसकी दुकान पर भी कुछ चल रहा है।"

मैं उठा। चाय के पैसे मेज़ पर रखे। शबनम ने उठाकर मेरे हाथ में वापस पकड़ा दिए।

"यह तेरे पैसे नहीं, इस गली के पैसे हैं," उन्होंने कहा। "जिस दिन तू यहाँ आना बंद कर देगा, उस दिन यह चूल्हा बुझेगा। और मुझे लगता है तू आज जाने की सोच रहा है।"

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